khamenei Funeral : ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई का अंतिम संस्कार गुरुवार को उनके गृह नगर मशहद में संपन्न हो गया. उन्हें इमाम रजा दरगाह परिसर में सुपुर्द-ए-खाक किया गया. इसके साथ ही छह दिनों तक चले राजकीय शोक और अंतिम संस्कार कार्यक्रम का समापन हो गया, जिसमें ईरान और इराक के विभिन्न शहरों से लाखों लोगों ने हिस्सा लिया. रायटर्स के अनुसार उनकी अंतिम यात्रा में उनके बेटे अयातुल्ला मोजतबा खामेनेई सार्वजनिक रूप से नजर नहीं आए.
अमेरिका मुर्दाबाद के नारे लगे
खामेनेई का पार्थिव शरीर अंतिम संस्कार से पहले तेहरान, कोम और अन्य प्रमुख शहरों में श्रद्धांजलि के लिए रखा गया था. अंतिम दिन उनका ताबूत मशहद पहुंचा, जहां बड़ी संख्या में समर्थक मौजूद रहे. अंतिम यात्रा के दौरान अमेरिका मुर्दाबाद और इजरायल मुर्दाबाद जैसे नारे लगाए गए तथा कई लोगों ने खामेनेई को शहीद बताते हुए उनके नेतृत्व को श्रद्धांजलि दी.
अंतिम संस्कार को राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बताया गया
ईरानी सरकार ने अंतिम संस्कार को राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बताया है. अधिकारियों के अनुसार, लाखों लोगों की मौजूदगी इस्लामिक गणराज्य के प्रति समर्थन को दर्शाती है. हालांकि अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि अंतिम यात्रा में उमड़ी भीड़ के बावजूद देश के भीतर राजनीतिक और सामाजिक ध्रुवीकरण पहले से अधिक गहरा हो चुका है. आर्थिक संकट, महंगाई, अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध और हाल के वर्षों में सरकार विरोधी आंदोलनों पर हुई कार्रवाई ने समाज को दो हिस्सों में बांट दिया है.
अयातुल्ला मोजतबा खामेनेई सार्वजनिक रूप से नजर नहीं आए
अंतिम संस्कार के दौरान एक महत्वपूर्ण बात यह रही कि खामेनेई के बेटे और उत्तराधिकारी अयातुल्ला मोजतबा खामेनेईसार्वजनिक रूप से नजर नहीं आए. ईरानी मीडिया के अनुसार सुरक्षा कारणों और स्वास्थ्य संबंधी परिस्थितियों के चलते उन्होंने सार्वजनिक कार्यक्रमों में भाग नहीं लिया. उन्होंने केवल लिखित संदेश जारी कर समर्थकों का आभार व्यक्त किया. उनकी गैरमौजूदगी ने नए नेतृत्व और सत्ता हस्तांतरण को लेकर चर्चाओं को और तेज कर दिया है.
खामेनेई की मौत के बाद ईरान ऐसे समय में नए राजनीतिक दौर में प्रवेश कर रहा है, जब देश एक ओर अमेरिका और इजरायल के साथ बढ़ते तनाव का सामना कर रहा है. राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि खामेनेई के अंतिम संस्कार के साथ एक युग का अंत हो गया है, लेकिन असली चुनौती अब नए नेतृत्व के सामने है. उसे एक ओर सत्ता समर्थक कट्टरपंथी गुटों को साथ रखना होगा, तो दूसरी ओर आर्थिक सुधारों और सामाजिक असंतोष से भी निपटना होगा। आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि नया नेतृत्व ईरान की विदेश नीति, परमाणु कार्यक्रम और घरेलू शासन व्यवस्था को किस दिशा में ले जाता है.
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