पाकिस्तान की राजनीति में अक्सर एक शब्द सुनाई देता है- ‘State within a State’, यानी राज्य के भीतर एक और राज्य.
यह शब्द उन संस्थाओं या शक्ति-केंद्रों के लिए इस्तेमाल होता है, जो औपचारिक सरकारी ढांचे के बाहर रहते हुए भी फैसलों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं.
पाकिस्तान के संदर्भ में यह चर्चा सबसे ज्यादा ISI और सैन्य प्रतिष्ठान के इर्द-गिर्द होती है. लेकिन सवाल है कि एक खुफिया एजेंसी, जिसे शुरुआत में बाहरी सुरक्षा के लिए बनाया गया था, वह धीरे-धीरे इतनी प्रभावशाली कैसे बन गई?
शुरुआत: 1948 में हुआ ISI का गठन
पाकिस्तान बनने के तुरंत बाद भारत और पाकिस्तान के बीच 1947-48 में युद्ध हुआ.
इस युद्ध ने पाकिस्तान की खुफिया व्यवस्था की कमजोरियां सामने ला दीं.
इसी पृष्ठभूमि में 1948 में ISI की स्थापना हुई.
इसका उद्देश्य सेना, नौसेना और वायुसेना की खुफिया सूचनाओं के बीच बेहतर तालमेल बनाना था. शुरुआत में इसका मुख्य ध्यान सैन्य खुफिया और भारत से जुड़े सुरक्षा मामलों पर था.
यानी शुरुआत में ISI कोई राजनीतिक संस्था नहीं थी. उसका काम था- जानकारी जुटाना, उसका विश्लेषण करना और सुरक्षा से जुड़े फैसलों में मदद करना.
लेकिन पाकिस्तान की राजनीतिक व्यवस्था जल्द ही बदलने लगी.
1958: जब राजनीति में सेना की एंट्री हुई
1958 में जनरल अयूब खान के सैन्य शासन ने पाकिस्तान की राजनीति की दिशा बदल दी.
मार्शल लॉ के दौर में संवैधानिक संस्थाएं कमजोर हुईं और खुफिया एजेंसियों की भूमिका भी बदलने लगी. अब खुफिया जानकारी सिर्फ सीमा और दुश्मन तक सीमित नहीं रही.
राजनेताओं पर नजर, विरोध की निगरानी और राजनीतिक गतिविधियों को प्रभावित करना भी सुरक्षा के दायरे में आने लगा.
यहीं से ISI के विकास का एक महत्वपूर्ण चरण शुरू हुआ.
एक खुफिया एजेंसी धीरे-धीरे राजनीतिक सत्ता के प्रबंधन का साधन भी बनने लगी.
अयूब खान से याह्या खान तक
अयूब खान (Ayub Khan) के दौर में राजनीतिक निगरानी बढ़ी.
1964 के राष्ट्रपति चुनाव में खुफिया तंत्र के इस्तेमाल के आरोपों ने यह संकेत दिया कि एजेंसी अब राजनीतिक परिणामों को प्रभावित करने की क्षमता हासिल कर रही थी.
इसके बाद याह्या खान (Yahya Khan) के दौर में यह भूमिका और गहरी हुई.
पूर्वी पाकिस्तान में अवामी लीग और क्षेत्रीय आकांक्षाओं पर निगरानी बढ़ी. 1971 के संकट में खुफिया और सैन्य तंत्र की भूमिका ने अंततः पाकिस्तान के विभाजन की त्रासदी को भी प्रभावित किया.
यह पाकिस्तान के इतिहास का एक बड़ा सबक था- जब सुरक्षा की भाषा में राजनीतिक असहमति को देखा जाता है, तो लोकतांत्रिक संकट और गहरा सकता है.
जिया-उल-हक: ISI के लिए सबसे बड़ा मोड़
ISI की ताकत बढ़ने में जनरल जिया-उल-हक का दौर निर्णायक माना जाता है.
1979 के बाद सोवियत संघ के अफगानिस्तान में प्रवेश से पाकिस्तान अमेरिका और पश्चिमी देशों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो गया. अफगान युद्ध में ISI को हथियार, धन और अंतरराष्ट्रीय सहयोग हासिल हुआ.
ISI इस दौरान गुप्त अभियानों, हथियारों की आपूर्ति और मुजाहिदीन नेटवर्क के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने लगी.
इस दौर ने एजेंसी को सिर्फ संसाधन ही नहीं दिए, बल्कि एक नई रणनीतिक संस्कृति भी दी- covert operations, proxy warfare और गैर-राज्य समूहों के इस्तेमाल की क्षमता.
अफगान युद्ध खत्म होने के बाद भी यह नेटवर्क पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ.
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अफगान युद्ध के बाद ध्यान अंदर की ओर
1989 में सोवियत सेना के अफगानिस्तान से निकलने के बाद उम्मीद की जा सकती थी कि ISI की भूमिका सीमित हो जाएगी.
लेकिन ऐसा नहीं हुआ.
आरोपों के अनुसार, एजेंसी का ध्यान अब पाकिस्तान की घरेलू राजनीति और क्षेत्रीय रणनीति की ओर भी बढ़ा. राजनीतिक दलों को प्रभावित करना, चुनावी गठजोड़ बनाना और विरोधी ताकतों को कमजोर करना इस दौर की राजनीति का हिस्सा बन गया.
1990 का चुनाव और ‘असगर खान केस’
ISI की राजनीतिक भूमिका पर सबसे चर्चित मामलों में से एक 1990 के आम चुनाव से जुड़ा है.
पाकिस्तान में बाद की न्यायिक कार्यवाही में आरोप सामने आए कि कुछ राजनीतिक दलों और नेताओं को चुनाव प्रभावित करने के लिए गुप्त रूप से धन दिया गया.
इसी मामले ने आगे चलकर Asghar Khan case का रूप लिया. यह प्रकरण इस बात का उदाहरण बना कि खुफिया तंत्र और चुनावी राजनीति के बीच संबंध कितना गहरा हो चुका था।
यहां से एक बड़ा सवाल सामने आया-
अगर चुनाव जनता की पसंद से होते हैं, तो खुफिया एजेंसी को चुनावी परिणामों को प्रभावित करने का अधिकार किसने दिया?
सिर्फ राजनीति नहीं, धार्मिक नेटवर्क भी
जिया के दौर में पाकिस्तान की राजनीति में इस्लामीकरण तेज हुआ.
ISI पर धार्मिक संगठनों और बाद में विभिन्न militant networks के साथ काम करने के आरोप भी लगे. अफगान युद्ध के दौरान पाकिस्तान में बड़े पैमाने पर लड़ाकों को प्रशिक्षण और हथियार उपलब्ध कराने की व्यवस्था विकसित हुई.
उस समय इसका मुख्य लक्ष्य सोवियत सेना के खिलाफ अफगान युद्ध था.
लेकिन इतिहास की विडंबना यह रही कि बाहर के युद्ध के लिए बनाए गए कई नेटवर्क बाद में क्षेत्रीय और घरेलू अस्थिरता का कारण भी बने.
यही वह बिंदु है जहां पाकिस्तान की सुरक्षा नीति और उसकी आंतरिक राजनीति एक-दूसरे से जुड़ जाती हैं.
मुशर्रफ के दौर में ‘मैनेज्ड डेमोक्रेसी’
1999 में जनरल परवेज मुशर्रफ के सत्ता में आने के बाद भी खुफिया तंत्र की राजनीतिक भूमिका समाप्त नहीं हुई.
इसके बजाय उसका तरीका बदल गया.
राजनीतिक दलों को तोड़ना, नए राजनीतिक गठबंधन बनाना और सैन्य शासन के अनुकूल राजनीतिक नेतृत्व तैयार करना- ऐसे आरोप इस दौर में सामने आए.
PML-Q का गठन इसका एक प्रमुख उदाहरण माना जाता है.
बाहर से लोकतांत्रिक संस्थाएं मौजूद थीं, लेकिन सत्ता के वास्तविक संतुलन पर सेना और खुफिया प्रतिष्ठान का प्रभाव बना रहा.
इसीलिए पाकिस्तान के राजनीतिक मॉडल को कभी-कभी ‘Uniformed Democracy’ यानी वर्दी के साये वाली लोकतांत्रिक व्यवस्था कहा जाता है.
असली समस्या ISI नहीं, जवाबदेही की कमी है
किसी भी देश में खुफिया एजेंसी जरूरी होती है. भारत सहित दुनिया के लगभग सभी बड़े देशों में ऐसी संस्थाएं राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए काम करती हैं.
समस्या तब शुरू होती है जब खुफिया शक्ति पर लोकतांत्रिक निगरानी कमजोर हो जाए.
पाकिस्तान में लंबे समय से यही सवाल उठता रहा है- क्या ISI जैसी संस्थाएं निर्वाचित सरकार के प्रति पर्याप्त जवाबदेह हैं?
चार्टर ऑफ डेमोक्रेसी में बेनजीर भुट्टो और नवाज शरीफ ने यह मांग रखी थी कि ISI, Military Intelligence और अन्य सुरक्षा एजेंसियां निर्वाचित सरकार के प्रति जवाबदेह हों. लेकिन इस दिशा में प्रयास स्थायी संस्थागत बदलाव नहीं ला सके.
पाकिस्तान की कहानी का सबसे बड़ा विरोधाभास
पाकिस्तान की स्थापना एक ऐसे राजनीतिक विचार के साथ हुई थी, जिसमें एक अलग मुस्लिम राष्ट्र की कल्पना की गई थी.
लेकिन आज पाकिस्तान को समझने के लिए सिर्फ यह पूछना पर्याप्त नहीं है कि ‘पाकिस्तान क्या है?’
एक और सवाल ज्यादा महत्वपूर्ण है-
‘पाकिस्तान में वास्तविक सत्ता किसके पास है?’
संसद, सरकार और चुनाव लोकतांत्रिक ढांचे का हिस्सा हैं. लेकिन इनके समानांतर सुरक्षा प्रतिष्ठान का प्रभाव पाकिस्तान की राजनीति में लंबे समय से मौजूद रहा है.
ISI की कहानी इसी विरोधाभास को समझने की एक खिड़की है.
1948 में बनी एक सैन्य खुफिया संस्था से लेकर आज के ‘Deep State’ तक की यात्रा सिर्फ एक एजेंसी की कहानी नहीं है. यह पाकिस्तान में सत्ता, सुरक्षा, सेना और लोकतंत्र के बीच बदलते रिश्ते की कहानी है.
और शायद पाकिस्तान को समझने का सबसे महत्वपूर्ण सवाल भी यही है-
क्या कोई लोकतंत्र तब पूरी तरह लोकतंत्र हो सकता है, जब उसके सबसे शक्तिशाली संस्थानों में से एक जनता के सामने पूरी तरह जवाबदेह न हो?
