नई दिल्ली में 12-13 सितंबर को हुआ 18वां BRICS Summit कई मायनों में पुराने BRICS से अलग था. अब यह सिर्फ ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका का समूह नहीं है. BRICS का विस्तार हो चुका है और इसमें ईरान, UAE, मिस्र, इथियोपिया और इंडोनेशिया जैसे देश शामिल हैं. भारत सरकार के अनुसार मौजूदा 11 सदस्यीय BRICS दुनिया की करीब 49.5% आबादी, 40% वैश्विक GDP और 26% वैश्विक व्यापार का प्रतिनिधित्व करता है.
लेकिन सवाल यह है-
क्या BRICS वास्तव में एक नया वैश्विक शक्ति-केंद्र बन रहा है, या अभी भी अलग-अलग हितों वाले देशों का एक बड़ा diplomatic platform है?
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1. दिल्ली में सबसे बड़ी चुनौती: जब BRICS के भीतर ही टकराव हो
इस summit की सबसे दिलचस्प परत पश्चिम एशिया से जुड़ी रही.
BRICS में अब ईरान और UAE दोनों सदस्य हैं. ऐसे समय में जब अमेरिका-ईरान संघर्ष और पश्चिम एशिया का तनाव जारी है, दोनों देशों के हित और दृष्टिकोण हमेशा एक जैसे नहीं हो सकते.
नई दिल्ली घोषणा में BRICS नेताओं ने पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव पर गंभीर चिंता जताई और सभी पक्षों से अधिकतम संयम बरतने की अपील की. साथ ही विवादों को बातचीत, consultation और diplomacy से सुलझाने की बात कही गई.
यही भारत की पहली बड़ी diplomatic परीक्षा थी.
BRICS जितना बड़ा होता जा रहा है, consensus बनाना उतना ही मुश्किल होता जा रहा है.
2. मोदी की असली लाइन: दुनिया बदल गई, संस्थाएं नहीं
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने BRICS मंच से global governance institutions में reform की जरूरत पर जोर दिया.
भारत की 2026 BRICS Presidency का मूल theme था-
'Building for Resilience, Innovation, Cooperation and Sustainability.'
इसका अर्थ केवल आर्थिक सहयोग नहीं था. भारत ने BRICS को Global South की आवाज, development और practical solutions के मंच के रूप में पेश करने की कोशिश की.
नई दिल्ली घोषणा में WTO reform, multilateral trading system को मजबूत करने और unilateral tariff तथा non-tariff measures पर चिंता जताई गई.
यहां भारत का संदेश महत्वपूर्ण है.
नई दिल्ली anti-West bloc बनाने की भाषा से बचती रही है.
भारत का जोर ज्यादा इस बात पर है कि-
Global South सिर्फ rule-taker नहीं, rule-shaper बने.
यही अंतर भारत की BRICS diplomacy को चीन की रणनीति से अलग करता है.
3. Xi Jinping की ‘Greater BRICS’ रणनीति: चीन क्या चाहता है?
दिल्ली summit में चीन के राष्ट्रपति Xi Jinping ने BRICS को ज्यादा integrated economic और technological platform बनाने पर जोर दिया.
Xi ने AI, trade, finance और political cooperation में नई पहल की बात की और ‘Greater BRICS’ को मजबूत economic coalition के रूप में आगे बढ़ाने का संदेश दिया.
यह भारत के लिए एक महत्वपूर्ण development है.
क्योंकि BRICS के विस्तार के साथ चीन के पास एक बड़ा diplomatic और economic network तैयार हो रहा है.
AI से लेकर payment systems और trade तक-
क्या BRICS भविष्य में Western-led institutions का alternative बन सकता है?
अभी इसका जवाब ‘हां’ कहना जल्दबाजी होगी.
लेकिन चीन जरूर चाहता है कि BRICS सिर्फ annual summit न रहे, बल्कि एक long-term economic ecosystem बने.
4. Putin के लिए BRICS क्यों जरूरी है?
नई दिल्ली summit में Vladimir Putin की मौजूदगी भी सिर्फ protocol नहीं थी.
यूक्रेन युद्ध और पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद रूस की diplomatic space पहले की तुलना में काफी सीमित हुई है.
ऐसे में भारत, चीन और Global South के दूसरे बड़े देशों के साथ एक ही मंच पर बैठना Moscow के लिए महत्वपूर्ण diplomatic signal है.
लेकिन यहां भी एक फर्क समझना जरूरी है.
BRICS ने रूस को international isolation से बाहर निकालने का कोई formal mechanism नहीं बनाया.
यानी Putin को मंच मिला, visibility मिली और Global South के साथ engagement का अवसर मिला- लेकिन BRICS ने रूस की Ukraine policy को collective endorsement नहीं दिया.
यही BRICS की सीमा भी है.
5. भारत-अमेरिका tariff story ने BRICS की चमक पर दूसरा सवाल खड़ा किया
दिल्ली में BRICS summit के दौरान एक दूसरी कहानी भी चल रही थी- भारत और अमेरिका के बीच trade और Russian oil को लेकर बातचीत.
अमेरिका ने पहले Russian oil खरीद को लेकर भारत पर अतिरिक्त tariff लगाया था. बाद में फरवरी 2026 में अमेरिका-भारत joint statement में 18% reciprocal tariff rate की व्यवस्था सामने आई.
वहीं अगस्त 2026 में अमेरिका की तरफ से Russian energy खरीदने वाले देशों पर संभावित 100% tariff का खतरा भी सामने आया था.
इसका geopolitical अर्थ क्या है?
भारत BRICS मंच पर multipolar world और fair global trade की बात करता है.
लेकिन जब वास्तविक trade pressure आता है, तो New Delhi को Washington के साथ bilateral negotiation भी करनी पड़ती है.
यही वह जगह है जहां BRICS की वास्तविक सीमा दिखाई देती है.
BRICS एक मंच है. भारत की foreign policy उससे कहीं बड़ी है.
6. BRICS सिर्फ geopolitics नहीं, अब technology और health का भी मंच
अगर BRICS को सिर्फ अमेरिका-विरोधी या de-dollarisation platform की तरह देखा जाए तो तस्वीर अधूरी रह जाएगी.
भारत की Presidency में कई practical initiatives पर जोर दिया गया.
इनमें प्रमुख हैं-
- Infectious diseases के लिए Integrated Early Warning System
- BRICS Startup Innovation Fund का प्रस्ताव
- BRICS Incubator Network
- Digital Agriculture Network
- AI और geospatial technology को agriculture से जोड़ना
- BRICS MSME Cooperation Portal
- urban mobility में सहयोग
- smart grids और energy storage के लिए Digital Centre of Excellence
- agro-ecology और regenerative agriculture पर cooperation
- indigenous knowledge के जरिए climate adaptation
इन पहलों का बड़ा उद्देश्य यही है कि BRICS को सिर्फ बयान जारी करने वाले मंच से निकालकर solutions-oriented platform बनाया जाए. भारत की Presidency का official theme भी इसी practical approach पर आधारित था.
7. तो क्या BRICS अमेरिका का विकल्प बन गया?
नहीं- कम से कम अभी नहीं.
BRICS के भीतर ही कई competing interests हैं.
भारत और चीन के बीच सीमा विवाद है.
ईरान और UAE के West Asia को लेकर अलग strategic calculations हैं.
रूस की प्राथमिकताएं यूरोप और Ukraine से जुड़ी हैं.
भारत अमेरिका के साथ Indo-Pacific, technology, defence और trade में गहरे रिश्ते रखता है.
फिर भी BRICS का महत्व कम नहीं होता.
क्योंकि इसकी असली शक्ति शायद किसी एक मुद्दे पर consensus में नहीं, बल्कि इस तथ्य में है कि-
इतने अलग-अलग देश एक ही कमरे में बैठकर global rules पर बातचीत कर रहे हैं.
और यही बदलती दुनिया की सबसे बड़ी कहानी है.
8. ‘BRICS Without Illusions’: भारत के लिए असली फायदा क्या?
भारत को BRICS से तीन बड़े strategic फायदे मिलते हैं.
पहला—Global South की आवाज
भारत उन देशों के साथ खड़ा हो सकता है जो IMF, UN और global governance institutions में ज्यादा प्रतिनिधित्व चाहते हैं.
दूसरा—Strategic autonomy
भारत को किसी एक geopolitical camp में पूरी तरह जाने की जरूरत नहीं पड़ती।
एक तरफ Washington है, दूसरी तरफ Moscow और Beijing—और बीच में New Delhi अपनी space बनाए रखता है.
तीसरा—China को उसी मंच पर engage करना
BRICS भारत को चीन से बातचीत का एक अतिरिक्त institutional channel देता है.
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि भारत और चीन के strategic differences खत्म हो गए.
BRICS summit की तस्वीर और वास्तविक geopolitics—दो अलग चीजें हैं.
BRICS की सबसे ईमानदार तस्वीर क्या है?
18वें BRICS Summit ने एक महत्वपूर्ण विरोधाभास सामने रखा है.
BRICS बड़ा हो रहा है. लेकिन बड़ा होना और एकजुट होना एक ही बात नहीं है.
यह एक alternative global order का embryo हो सकता है.
यह Global South की collective bargaining power भी बढ़ा सकता है.
लेकिन फिलहाल यह NATO जैसा military alliance नहीं है और न ही European Union जैसा integrated political-economic bloc.
इसकी असली ताकत है—
conversation, coordination और collective signaling.
और भारत के लिए शायद यही सबसे उपयोगी है.
दिल्ली summit में मोदी ने जिस तरह Global South, multilateral reform और practical cooperation पर जोर दिया, उससे भारत ने यह संकेत दिया है कि वह BRICS को किसी एक देश के anti-Western project में बदलने के बजाय एक अधिक representative global order के मंच के रूप में देखना चाहता है.
यह लेख प्रियांशी त्रिपाठी (डायरेक्टर, Geostate.Org) ने लिखा है.
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