नई दिल्ली घोषणापत्र पर ब्रिक्स की सर्वसम्मति, भारत की कूटनीतिक सफलता की वैश्विक गूंज: डॉ. महीप का अकादमिक विश्लेषण

नई दिल्ली घोषणापत्र पर BRICS देशों की सर्वसम्मति भारत के लिए अहम उपलब्धि है. आतंकवाद, UN reform, व्यापार, AI, climate finance और Global South पर बनी सहमति अब एक बड़े सवाल के सामने है- क्या इन घोषणाओं को जमीन पर उतारा जा सकेगा?

12 सितम्बर 2026 की अपराह्न भारत मंडपम के पूर्ण-सत्र कक्ष में वही मौन उतरा, उस क्षण जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विस्तृत ब्रिक्स के एकत्र नेताओं के समक्ष नई दिल्ली घोषणापत्र रखा और सर्वसम्मति-कूटनीति की सहज भाषा में पूछा कि क्या यह पाठ कक्ष की स्वीकृति वहन करता है.

कोई हाथ आपत्ति में नहीं उठा. किसी प्रतिनिधिमंडल ने आपत्ति दर्ज कराने के लिए मंच नहीं मांगा. न कोई शर्त, न असहमति का कोई औपचारिक उल्लेख, न अंतिम क्षण का कोई संशोधन उस निस्तब्धता को भंग कर सका. एक मापे हुए क्षण के लिए कक्ष ने साँस रोक ली, और उस सन्नाटे में 140 अनुच्छेदों का दस्तावेज अंतरराष्ट्रीय संबंधों के अभिलेख में उस प्राचीनतम और सर्वाधिक कठिन विधि से अंकित हो गया जो बहुपक्षीय निकायों को ज्ञात है, अर्थात् एक भी 'ना' की अनुपस्थिति.

फिर वह मौन तालियों में फूट पड़ा, ऊष्ण और सुदीर्घ, और नेता मान्यता की उस मुद्रा में उठ खड़े हुए, मेज के आर-पार हाथ मिलाते, आलिंगन करते, राजनयिकों की उस अभ्यस्त ऊष्मा का प्रदर्शन करते हुए जो जानते हैं कि सहमति का एक छायाचित्र स्वयं में राजनय का एक उपकरण है.

दृश्य अपने आप में असाधारण था, और व्याख्या से पूर्व उसे नाम देना उचित है. भारत की अध्यक्षता के कमल-ज्योति चिह्न के तले, एक ही राजनयिक नक्षत्र-मंडल में, मेजबान और सर्वसम्मति के रचयिता के रूप में नरेंद्र मोदी खड़े थे, अपनी ही शैली में यह कहते हुए कि ब्रिक्स किसी के विरुद्ध नहीं, अपितु एक अधिक न्यायसंगत विश्व के पक्ष में है; व्लादिमीर पुतिन, पश्चिमी आर्थिक प्रतिबंधों के विरुद्ध अपना पक्ष रखने नई दिल्ली आए; और शी जिनपिंग, लगभग सात वर्षों में पहली बार भारत की भूमि पर, अपने दल के साथ चीनी दल-राज्य का भार वहन करते हुए.

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उनके चतुर्दिक् ईरान के मसूद पेज़ेश्कियान, दक्षिण अफ़्रीका के सिरिल रामाफोसा, मिस्र के अब्देल फतह अल-सीसी, इंडोनेशिया के प्रबोवो सुबियांतो, इथियोपिया के अबी अहमद, संयुक्त अरब अमीरात के लिए अबू धाबी के युवराज, और एक ऐसे ब्राज़ील का प्रतिनिधित्व करते विदेश मंत्री माउरो विएरा एकत्र थे जिसके राष्ट्रपति अपने चुनावी मौसम के कारण स्वदेश में रहे; जबकि अपनी सदस्यता की अंतिमता पर अब भी विचार करते सऊदी अरब के लिए राजकुमार फ़ैसल बिन फरहान उपस्थित थे.

यही वह विश्लेषणात्मक प्रश्न है जो नई दिल्ली घोषणापत्र हमारे समक्ष रखता है: भारत ने दस-सदस्यीय ब्रिक्स की, जिसमें एक 11वा सदस्य अपनी सदस्यता को अंतिम रूप देता हुआ जुड़ा है और जिसके परितः दस भागीदार राष्ट्र हैं, इस असाधारण सामरिक बहुलता को शांति, सुधार, विकास और साझा वैश्विक कर्तृत्व की एक परक्राम्य भाषा में कैसे परिणत किया?

इस आलेख का उत्तर यह है कि यह घोषणापत्र भारत की उस विशिष्ट क्षमता का प्रतिनिधित्व करता है जो बहुलता को अनुरूपता की मांग किए बिना व्यावहारिक सहयोग में बदल देती है. नई दिल्ली ने कोई साँचा नहीं थोपा, उसने वह राजनीतिक अवकाश रचा जिसके भीतर भिन्न राष्ट्रीय हित अपने अभिसरण-क्षेत्र पा सकें.

अतः जो दस्तावेज उभरा वह कोई साधारण विज्ञप्ति नहीं है. वह एक साथ वैश्विक दक्षिण के राजनीतिक कर्तृत्व की उद्घोषणा है, वैश्विक शासन के सुधार का एक कार्यक्रम है, विकास-केंद्रित सहयोग की एक रूपरेखा है, संवाद के माध्यम से शांति की सामूहिक याचना है, एक खुली और पूर्वानुमेय व्यापार-व्यवस्था की रक्षा है, और, कम महत्त्व का नहीं, एक बहुल अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में सभ्यतागत आत्मविश्वास का कथन है.

नई दिल्ली घोषणापत्र 12 सितम्बर 2026 को उन दस सदस्यों द्वारा अंगीकृत हुआ जिनकी सदस्यता पूर्ण है, अर्थात् ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ़्रीका, मिस्र, इथियोपिया, इंडोनेशिया, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात, और वह भी एक भी अभिलिखित आपत्ति के बिना। सऊदी अरब, जो आमंत्रित है और विदेश-मंत्री स्तर पर सहभागी है, अभी पूर्ण सदस्यता की पुष्टि नहीं कर सका है, और उस मतदान से पृथक् खड़ा है जिसमें वह किसी दिन सम्मिलित होगा। संवैधानिक लोकतंत्रों, सभ्यतागत दल-राज्यों, राजतंत्रों और एक प्रतिबंधित गणराज्य के समूह में 140 अनुच्छेदों के पाठ पर सर्वसम्मत स्वीकृति कोई औपचारिकता नहीं। यह शिखर की पहली सारभूत उपलब्धि है: इसका प्रमाण कि बहुलता, धैर्यपूर्ण कूटनीति से अनुशासित होकर, आज भी एक साझा स्वर उत्पन्न कर सकती है.
ब्रिक्स समिट के दौरान पौधा लगाते PM मोदी, व्लादिमीर पुतिन और शी जिनपिंग

भूगोल से साझा स्वामित्व तक: भारत की अध्यक्षता का व्याकरण

भारत की अध्यक्षता की बौद्धिक संरचना उसके ध्येय-वाक्य में संगुम्फित है, अर्थात् 'प्रत्यास्थता, नवाचार, सहयोग और संधारणीयता का निर्माण', और घोषणापत्र स्वयं छठे अनुच्छेद में अभिलिखित करता है कि यह ढाँचा 30 भारतीय नगरों में मंत्रियों, सांसदों, अभिकरण-प्रमुखों, अधिकारियों, विशेषज्ञों, उद्यमों और नागरिकों के स्तर पर चार सौ से अधिक बैठकों और संवादों के माध्यम से आगे बढ़ाया गया.

यह वास्तविक संस्थागत महत्त्व का आँकड़ा है, और इसे इसके परिमाण पर विस्मित होने के बजाय इसकी उपलब्धि के लिए पढ़ा जाना चाहिए. एक बहुपक्षीय अध्यक्षता की नाड़ियों को एक महाद्वीपीय संघ की लंबाई-चौड़ाई में वितरित करके, नई दिल्ली ने उसे एक कूटनीतिक पंचांग से एक राष्ट्रव्यापी प्रक्रिया में बदल दिया, अध्यक्षता को वह भौगोलिक गहराई, सार्वजनिक दृश्यता और संघीय, सभ्यतागत तथा जन-केंद्रित चरित्र प्रदान करते हुए जिसका प्रयास इससे पूर्व की अध्यक्षताओं ने विरले ही किया.

5वा अनुच्छेद ठीक इसी 'संतुलित, व्यावहारिक, क्रियान्वयन-योग्य, समावेशी, विकास-केंद्रित और जन-केंद्रित दृष्टिकोण' की सराहना करता है, और यह भाषा न आकस्मिक है न मात्र प्रशस्ति, क्योंकि इसमें यह भारतीय प्रतीति अंतर्निहित है कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग में वैधता अभिजन-कूटनीति और व्यापक सामाजिक सहभागिता के संगम पर अर्जित होती है.

बहुल व्यवस्था का व्याकरण: सर्वसम्मति

अपने दूसरे अनुच्छेद में घोषणापत्र पारस्परिक सम्मान और समझ, सार्वभौम समानता, एकजुटता, लोकतंत्र, खुलापन, समावेशिता, सहयोग और सर्वसम्मति की ब्रिक्स-भावना की पुनःपुष्टि करता है, और इस सूची की सोद्देश्यता पर ठहरना उचित है.

10 विषम सार्वभौम सत्ताओं के बीच सर्वसम्मति, जबकि एक 11वा अपने प्रवेश की शर्तों को अभी तौल रहा है, न स्वतः होती है न सतही; वह कूटनीतिक समायोजन का एक अनुशासित रूप है, जिसमें प्रत्येक सहभागी अत्यंतवादी भाषा का संतोष एक साझा स्थिति की स्थायिता के बदले त्याग देता है. ब्रिक्स अपनी वैधता ठीक इसी क्षमता से अर्जित करता है कि वह साझा आधार उत्पन्न करते हुए भी बहुलता को सुरक्षित रखे.

16वें अनुच्छेद में 1955 के बांडुंग सम्मेलन का, और उसके समानता, स्वाधीनता, अहस्तक्षेप तथा पारस्परिक हित के सिद्धांतों का स्मरण कोई प्राचीनता-मोह नहीं. यह समूह को वैश्विक दक्षिण की एकजुटता की उस वंश-परंपरा में आबद्ध करता है जो शीतयुद्ध के गुट-तर्क से पूर्ववर्ती है और सचेत रूप से उसका निषेध करती है, बांडुंग-भावना को एक अधिक न्यायसंगत, समावेशी और प्रतिनिधिक बहुपक्षीय व्यवस्था के संदर्भ-बिंदु के रूप में प्रस्तुत करते हुए। बहुलता, इस दृष्टि में, प्रबंधनीय दुर्बलता नहीं, अपितु कूटनीतिक प्रत्यास्थता का स्रोत है.

प्रतिनिधित्व के माध्यम से वैश्विक शासन का सुधार

घोषणापत्र का सर्वाधिक सुस्थिर तर्क वैश्विक शासन के सुधार से संबंधित है, और यहीं गरिमा की राजनीति और प्रभावशीलता की राजनीति अभिन्न हो जाती हैं.

ब्रिक्स की बीसवीं वर्षगांठ को अंकित करते हुए, 7वा अनुच्छेद एक अधिक न्यायसंगत, समतापूर्ण, चुस्त, प्रभावी, कुशल, उत्तरदायी, प्रतिनिधिक, वैध, लोकतांत्रिक और जवाबदेह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की माँग करता है, जिसमें संयुक्त राष्ट्र चार्टर उसकी अपरिहार्य आधारशिला है.

13वें अनुच्छेद में घोषणापत्र सुरक्षा परिषद सहित संयुक्त राष्ट्र के व्यापक सुधार के समर्थन को दुहराता है, अफ़्रीका की एज़ुल्विनी-सहमति तथा सिर्ते-घोषणा में निहित आकांक्षाओं को मान्यता देता है, और वास्तविक कूटनीतिक भार वाली भाषा में यह अभिलिखित करता है कि चीन और रूस, स्थायी सदस्यों के रूप में, संयुक्त राष्ट्र में, सुरक्षा परिषद सहित, अधिक भूमिका निभाने की ब्राज़ील और भारत की आकांक्षाओं के प्रति अपने समर्थन को दुहराते हैं.

भारतीय कूटनीति के लिए यह एक श्रमसाध्य पुनःपुष्टि है, और एक परिपक्व विश्लेषक इसे यथावत् पढ़ेगा: यह किसी विशिष्ट स्थायी सीट के समर्थन के बजाय एक स्थायी स्थिति का पुनःकथन है, और आलंकारिक सुधारवाद तथा ठोस रियायत के बीच का भेद वही अक्ष बना रहता है जिस पर भारत की अपनी महत्त्वाकांक्षा घूमती है. यहाँ एक ही रचनावादी अंतर्दृष्टि प्रवाहित है: वैश्विक दक्षिण अन्यत्र लिए गए निर्णयों का प्राप्तकर्ता नहीं, अपितु उन प्रतिमानों का सह-रचयिता माने जाने की आकांक्षा रखता है जो उसे आबद्ध करते हैं.

विनाश से पूर्व संवाद: भारत का शांति-प्रस्ताव

शांति घोषणापत्र का नैतिक केंद्र है, और वह एक ऐसे सूत्र में अभिव्यक्त है जो भारतीय राजनय का हस्ताक्षर बन चुका है.

23वा अनुच्छेद इस बात को रेखांकित करता है कि सभी देशों के बीच सुरक्षा अविभाज्य है और संवाद, परामर्श और कूटनीति के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय विवादों के शांतिपूर्ण समाधान के प्रति प्रतिबद्धता को दुहराता है, निवारक कूटनीति, मध्यस्थता और क्षेत्रीय संगठनों की भूमिका को अपरिहार्य उपकरणों के स्तर तक उठाते हुए. यह उस भारतीय प्रस्ताव की सैद्धांतिक अभिव्यक्ति है जिसे भारत ने असाधारण निरंतरता से रखा है: कि वर्तमान संवाद, कूटनीति और विकास का युग है, और युद्ध उन संसाधनों, उस आत्मविश्वास और उन मानवीय संभावनाओं को निगल जाता है जिन पर सामूहिक प्रगति निर्भर करती है. अंतहीन युद्ध को नहीं, संवाद की धैर्यपूर्ण शक्ति को हाँ, घोषणापत्र इन शब्दों का प्रयोग नहीं करता, किंतु उसकी समूची संरचना इसी प्रतीति पर खड़ी है.

24वा अनुच्छेद, वैश्विक सैन्य व्यय में गंभीर वृद्धि पर चिंता व्यक्त करता है, सैन्यीकरण को निर्धनों के विकास-भविष्य से की गई चोरी के रूप में देखते हुए; और पश्चिम एशिया पर, जहाँ शिखर एक विस्तृत होते संघर्ष की छाया में जुटा.

28वा अनुच्छेद. गहन चिंता व्यक्त करता है, अधिकतम संयम का आह्वान करता है, और सार्थक रूप से अपनी-अपनी राष्ट्रीय स्थितियों का स्मरण करते हुए वाक्यांश को सुरक्षित रखता है, एक ऐसा सूत्र जो भिन्नता को स्वीकार भी करता है और उसे नियंत्रित भी.

पाठ एक विभाजित कक्ष को प्रत्येक जीवंत संघर्ष पर एक साझा पंक्ति पर बाँधे रखता है: IAEA-संरक्षित “शांतिपूर्ण नाभिकीय सुविधाओं” पर आक्रमण की निंदा (अनु. 29); ग़ज़ा में युद्धविराम, मानवीय पहुँच और द्वि-राज्य समाधान की पुष्टि (अनु. 30–34); लेबनान का प्रस्ताव 1701 के अंतर्गत युद्धविराम और चार इंडोनेशियाई शांतिरक्षकों सहित UNIFIL-शहीदों का शोक (अनु. 35–36); सूडान के लिए “अफ़्रीकी समस्याओं के अफ़्रीकी समाधान” का आह्वान (अनु. 37); और सीरिया के लिए एक “समावेशी, सीरिया-नेतृत्वित और सीरिया-स्वामित्वित” प्रक्रिया का समर्थन (अनु. 38)। उपलब्धि इन स्थितियों में नहीं, अपितु एक ही सर्वसम्मत पाठ में उनके सह-अस्तित्व में है.

आतंकवाद-प्रतिरोध और एक निर्णायक भारतीय उपलब्धि

घोषणापत्र का 40वा अनुच्छेद भारत के लिए एक पृथक् कूटनीतिक विजय के रूप में पढ़ा जाना चाहिए, और इसे विजयोल्लास के बजाय स्पष्टता से कहा जाना चाहिए. एकत्र नेता 22 अप्रैल 2025 को जम्मू और कश्मीर में हुए उस आतंकी हमले की, जिसमें 26 लोग मारे गए और अनेक घायल हुए, प्रबलतम शब्दों में निंदा करते हैं, और एक व्यापक आतंकवाद-प्रतिरोध सिद्धांत की पुनःपुष्टि करते हैं: आतंकवादियों की सीमा-पार आवाजाही, आतंकी वित्तपोषण और सुरक्षित पनाहगाहों का विरोध.

यह सिद्धांत कि आतंकवाद को किसी धर्म, राष्ट्रीयता, सभ्यता या जातीय समूह से न जोड़ा जाए, शून्य सहिष्णुता की माँग और आतंकवाद के प्रतिकार में दोहरे मानदंडों की स्पष्ट अस्वीकृति, तथा सभी संयुक्त राष्ट्र-अभिहित आतंकवादियों और आतंकी संस्थाओं के विरुद्ध ठोस कार्रवाई का आह्वान.

एक विस्तृत और आंतरिक रूप से विविध ब्रिक्स से यह भाषा प्राप्त करना सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है. पहलगाम की क्रूरता का एक सर्वसम्मत दस्तावेज में, जिस पर चीन भी हस्ताक्षरी है, नामोल्लेख और निंदा कराना एक राष्ट्रीय सुरक्षा अनिवार्यता को अंतरराष्ट्रीय वैधता में बदल देना है. दोहरे मानदंडों की अस्वीकृति कोई अलंकार नहीं, यह भारत की उस चिरस्थायी स्थिति की सांकेतिक किंतु अस्पष्ट न रहने वाली उद्घोषणा है कि आतंकवाद की चयनित सहनशीलता राज्यों के उत्तरदायी आचरण से असंगत है.

पहलगाम आतंकी हमले के बाद जांच करते आर्मी जवान. फोटो- PTI.

न्याय की राजनीतिक अर्थव्यवस्था: व्यापार और वित्त

व्यापार पर घोषणापत्र एक गैर-विभेदकारी, खुली, समतापूर्ण, पारदर्शी, न्यायसंगत, समावेशी, पूर्वानुमेय और नियम-आधारित बहुपक्षीय व्यापार-व्यवस्था की सुस्थिर रक्षा करता है, जिसके केंद्र में विश्व व्यापार संगठन हो.

21वा अनुच्छेद, एकपक्षीय शुल्क और गैर-शुल्क उपायों के उभार पर गंभीर चिंता व्यक्त करता है, जबकि 22वा अनुच्छेद, एकपक्षीय दंडात्मक उपायों की, द्वितीयक प्रतिबंधों सहित, निंदा करता है. समकालीन भू-आर्थिक क्षण के किसी भी पाठक के लिए निहितार्थ स्पष्ट है: शुल्क और प्रतिबंध वाणिज्यिक नीति के बजाय भू-राजनीतिक दबाव के उपकरण बनते जा रहे हैं, और घोषणापत्र वैश्विक दक्षिण को इनके शस्त्रीकरण के विरुद्ध खड़ा करता है.

इन प्रावधानों में सर्वत्र सुपाठ्य भारतीय अधिमान व्यापार को दबाव के रंगमंच के बजाय उत्पादन, अवसर, प्रत्यास्थता और विकास को जोड़ने वाले सेतु के रूप में देखता है.

वित्तीय क्षेत्र में घोषणापत्र का उपचार परिकलित महत्त्वाकांक्षा का अध्ययन है. जैसे-जैसे न्यू डेवलपमेंट बैंक अपने द्वितीय स्वर्णिम दशक में प्रवेश करता है, पाठ स्थानीय-मुद्रा वित्तपोषण के विस्तार को प्रोत्साहित करता है, तथापि यहाँ जो निर्णायक भेद घोषणापत्र अनुशासन से बरतता है वह विविधीकरण और नाटकीय मुद्रा-प्रतिस्थापन के बीच है.

कहीं भी पाठ किसी साझा ब्रिक्स-मुद्रा की घोषणा नहीं करता; शब्दावली निरंतर विकल्प, अंतर-संचालनीयता, न्यून लेन-देन लागत और संस्थागत क्षमता की है. मौद्रिक क्षेत्र में सामरिक स्वायत्तता, घोषणापत्र अंतर्निहित रूप से तर्क देता है, एकल मुद्रा की अपरिपक्व खोज के बजाय अतिरिक्त विकल्पों के माध्यम से बढ़ती है, अर्थात् विवेक के रूप में विविधीकरण.

नवाचार और तकनीकी-भू-आर्थिक प्रत्यास्थता की संरचना

घोषणापत्र में प्रौद्योगिकी एक साथ विकास-गुणक और प्रतिमान-नेतृत्व का क्षेत्र है.

81वा अनुच्छेद स्वीकार करता है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता सबके लिए आर्थिक वृद्धि और संधारणीय विकास को प्रोत्साहित करने का अपार अवसर प्रस्तुत करती है, फरवरी 2026 के एआई इम्पैक्ट समिट के लिए भारत को बधाई देता है, और समूह को कृत्रिम बुद्धिमत्ता के वैश्विक शासन पर ब्रिक्स नेताओं के वक्तव्य के क्रियान्वयन के लिए प्रतिबद्ध करता है, वैश्विक दक्षिण के लिए समतापूर्ण पहुँच के साथ एक विश्वसनीय, सुरक्षित, समावेशी और भरोसेमंद एआई की दृष्टि को आबद्ध करते हुए, इन प्रावधानों को जो बाँधता है वह एक ऐसी अवधारणा है जिसे घोषणापत्र बिना नाम दिए साकार करता है.

तकनीकी-भू-आर्थिक प्रत्यास्थता, अर्थात् विकासशील देशों की वह क्षमता जो नवाचार, नियमन, संयोजन और मूल्य-सृजन करती है, बिना निर्भरता की नई संरचनाओं को पुनरुत्पादित किए.

67वें अनुच्छेद का विश्वसनीय, उत्तरदायी, विविधीकृत, प्रत्यास्थ, न्यायसंगत, संधारणीय और न्यायपूर्ण महत्त्वपूर्ण-खनिज आपूर्ति-शृंखलाओं पर बल इस महत्त्वाकांक्षा की सबसे तीक्ष्ण अभिव्यक्ति है, जो खनिजों के मात्र निष्कर्षण और प्रसंस्करण, विनिर्माण तथा बौद्धिक संपदा के माध्यम से मूल्य-अर्जन के बीच भेद करती है.

प्रौद्योगिकी-संप्रभुता और प्रौद्योगिकी-सहयोग, घोषणापत्र सुझाता है, परस्पर शत्रु होने की आवश्यकता नहीं रखते: भारत द्वारा विकसित डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, जिसे सतहत्तरवाँ अनुच्छेद प्रत्यास्थ, सुरक्षित, समावेशी और अंतर-संचालनीय कहकर सराहता है, उस साझा हित के प्रतिमान के रूप में प्रस्तुत है जो उसे अपनाने वाले सबकी स्वायत्तता को विस्तृत करता है.

मानव-केंद्रित प्रत्यास्थता, और संक्रमण का न्याय

घोषणापत्र का सर्वाधिक मौन क्रांतिकारी कदम शक्ति की अमूर्तताओं के बजाय मनुष्य को प्रत्यास्थता के केंद्र में रखना है.

इसकी मानव-सुरक्षा संरचना विस्तृत और ठोस है: सार्वभौम स्वास्थ्य-आवरण की प्रतिबद्धता और महामारियों के लिए एकीकृत पूर्व-चेतावनी प्रणाली (अनु. 50–51); भारत के निमहांस द्वारा समन्वित मानसिक-स्वास्थ्य उत्कृष्टता-केंद्रों का जाल और पारंपरिक चिकित्सा की औपचारिक स्वीकृति (अनु. 54, 56), जो भारत की अपनी चिकित्सा परंपरा में सभ्यतागत निवेश से अनुगुंजित है; और खाद्य-सुरक्षा पर ब्रिक्स ग्रेन एक्सचेंज तथा कृषक-केंद्रित एग्रीन जाल (अनु. 60–61).

133वा अनुच्छेद, महिला-नेतृत्वित विकास की दृष्टि में निहित, स्त्रियों को नेता, निर्णयकर्ता और आर्थिक वृद्धि की संचालक के रूप में मान्यता देता है. प्रत्यास्थता, इस पाठ में, राज्यों का नहीं, अपितु सक्षम समाजों का गुण है. संधारणीयता के स्तंभ पर घोषणापत्र एक नाज़ुक संतुलन साधता है.

64वा अनुच्छेद स्पष्टतः स्वीकार करता है कि जीवाश्म ईंधन विश्व के ऊर्जा-मिश्रण में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते रहेंगे, जबकि समान किंतु विभेदित उत्तरदायित्वों के सिद्धांत से शासित न्यायसंगत, सुव्यवस्थित, समतापूर्ण और समावेशी ऊर्जा-संक्रमणों के प्रति प्रतिबद्ध होता है. यही वह कूटनीतिक कुंजी है जो हाइड्रोकार्बन-निर्यातकों और जलवायु-भेद्य आयातकों दोनों को समेटे एक कक्ष को खोल देती है.

108वा अनुच्छेद, एकपक्षीय, दंडात्मक, विभेदकारी उपायों का विरोध करता है, कार्बन सीमा-समायोजन तंत्रों को वैश्विक दक्षिण के विकास-प्रयासों को क्षीण करने वाले उपकरणों के रूप में नामांकित करते हुए. अनुप्राणी प्रतीति यह है कि एक न्यायपूर्ण संक्रमण को विकास-अवसर का विस्तार भी करना होगा और पारिस्थितिक उत्तरदायित्व को सुदृढ़ भी.

उपलब्धि, और उसका मापदंड

नई दिल्ली घोषणापत्र को उसके आलोचक इस बात के लिए विश्लेषित करेंगे कि उसने क्या रोक रखा: कोई विशिष्ट स्थायी सीट, कोई साझा मुद्रा, इतने विविध समूह में निहित अंतर्विरोधों का कोई समाधान. ये अनुपस्थितियाँ वास्तविक हैं. किंतु घोषणापत्र को इससे मापना कि उसने क्या नहीं कहा, उपलब्धि की प्रकृति को न समझना है. दस्तावेज की उपलब्धि स्वयं सर्वसम्मति है, यह प्रमाण, कि एक उदीयमान भारत शक्तियों के सर्वाधिक असंभाव्य नक्षत्र-मंडल को, पुतिन और अबू धाबी के युवराज से लेकर शी और पेज़ेश्कियान तक, एक चुनावरत ब्राज़ील के प्रतिनिधि और एक असमंजस में खड़े सऊदी अरब के विदेश मंत्री तक, एकत्र कर सकता है और उन्हें एक साझा पाठ पर सहमत करके स्वदेश भेज सकता है. यह न किसी पश्चिम-विरोधी गठबंधन का अंकगणित है, न किसी वैचारिक शिविर की रचना, न किसी सैन्य गुट का संघटन. यह व्यापक सहभागिता, समतापूर्ण प्रतिनिधित्व और एक अधिक उत्तरदायी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की खोज करते एक सुधारवादी, विकास-केंद्रित मंच का धैर्यपूर्ण निर्माण है.

भारत ने भारत मंडपम में जो साधा, वह अनुरूपता की माँग किए बिना अभिसरण को संभव बनाना था, एक ऐसा अवकाश खुला रखना जिसमें सार्वभौम समानता, सामरिक स्वायत्तता, पारस्परिक सम्मान, परक्राम्य सर्वसम्मति और विकास-साझेदारी में से प्रत्येक अभिव्यक्ति पा सके, बिना किसी एक प्रतिनिधिमंडल से उसके विवेक की स्वतंत्रता के समर्पण की अपेक्षा किए. यह संस्थागत रूप में ढली बहुध्रुवीयता है, जो किसी वर्चस्ववादी के अनुशासन के बजाय बहुल स्वरों की सभ्यतागत वैधता पर आधारित है.

12 सितम्बर को तालियों से पूर्व जो मौन उतरा वह, अंततः, उसी उपलब्धि की ध्वनि थी: थोपी गई सहमति का मौन नहीं, अपितु एक ऐसे कक्ष का दुर्लभतर मौन जिसे ‘हाँ’ कहने के लिए पर्याप्त अवकाश दिया गया था. अब अध्यक्षता की बागडोर बीजिंग को सौंपने की बारी है. इस भारतीय क्षण का सच्चा मापदंड भारत मंडपम में अंगीकृत पाठ की वाग्मिता नहीं होगी, अपितु यह कि क्या उसके उपकरण 2027 की चीनी अध्यक्षता को अक्षुण्ण पार करते हैं: वे कार्यबल और ज्ञान-पोर्टल, वे भुगतान-पथ और जलवायु-मंच, वह आतंकवाद-प्रतिरोधी भाषा और वे सुधारवादी माँगें. सर्वसम्मति पहली उपलब्धि थी, निरंतरता निर्णय होगी.

यह लेख डॉ. महीप (निदेशक, इंडियन पर्सपेक्टिव ऑन ग्लोबल अफेयर्स) ने लिखा है.

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लेखक के बारे में

By अचल प्रियदर्शी

अचल प्रियदर्शी अंतरराष्ट्रीय संबंधों, इंडिक एवं इंडीजीनस अध्ययन के जानकार, Geopolitical Analyst, UPSC Educator और 33 पुस्तकों के लेखक हैं.

उन्होंने केंद्रीय मंत्री के राजनीतिक सहायक के तौर पर काम किया है, तथा ट्राइबल रिसर्च इंस्टीट्यूट (TRI)- रांची और झारखंड सरकार के वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग (DoFECC) के साथ भी कार्य किया है.

उन्होंने सैकड़ों UPSC अभ्यर्थियों का मार्गदर्शन किया है, और अंतरराष्ट्रीय संबंधों व समसामयिक विषयों पर उनके विश्लेषणात्मक लेख नियमित रूप से UPSC-केंद्रित पत्रिकाओं (जैसे Pratiyogita Darpan) में प्रकाशित होते रहे हैं.

साहित्य और जनजातीय इतिहास में उनके योगदान को मान्यता देते हुए उन्हें वर्ष 2025 में आयोजित जमशेदपुर लिटरेचर फेस्टिवल के उद्घाटन संस्करण में उनकी पुस्तक Tribal Bravehearts के लिए शब्द-शिल्पी सम्मान से सम्मानित किया गया. शैक्षणिक रूप से, उन्होंने हार्वर्ड डिविनिटी स्कूल से Religion, Peace and Conflict विषय में अध्ययन किया है.

ये उनकी कुछ लोकप्रिय किताबें हैं;

  1. Pakistan State, Armed Influenconomy (प्रभात प्रकाशन) (2026)

  2. Winning Bengal: Inside West Bengal’s Electoral War of 2026 (प्रभात प्रकाशन) (2026)

  3. बिहार जनादेश 2025 (प्रभात प्रकाशन) (2026)

  4. International Relations: UPSC & State Civil Services Examinations (Oakbridge Publishing) (2026)

  5. ब्रांड हेमंत (स्वतंत्र प्रकाशन) (2025)

  6. झारखण्ड की जनजाति समाज और समय का संकट (प्रकाशन संसथान) (2026)

  7. जनजातीय शूरवीर (प्रभात प्रकाशन) (2026)

  8. Know Your State: Jharkhand (अरिहंत प्रकाशन) (2025)

  9. उत्तर प्रदेश सामान्य ज्ञान (क्राउन पुब्लिकेशन्स) (2024)

  10. बिहार सामान्य ज्ञान (उपकार प्रकाशन) (2024)

  11. International Relations for UPSC Mains (Pratiyogita Darpan) (2024)

  12. Internal Security & Disaster Management for UPSC Mains (Pratiyogita Darpan) (2024)

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