कल्पना कीजिए कि आने वाले कुछ वर्षों में आपका डॉक्टर, बैंक, नौकरी, बीमा, अदालत और यहां तक कि सरकारी योजनाओं का बड़ा हिस्सा कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) तय करेगी.
लेकिन यदि इस AI को बनाने वालों में महिलाओं की हिस्सेदारी ही बहुत कम हो, यदि इसके डेटा में महिलाओं के अनुभव ही पर्याप्त दर्ज न हों, यदि इसके algorithm समाज के पुराने पूर्वाग्रहों को ही दोहराएं- तो क्या यह तकनीक वास्तव में सबके लिए न्यायपूर्ण होगी?
यही वह सवाल है जो अब केवल तकनीक का नहीं, बल्कि Foreign Policy, Global Diplomacy और भारत की अंतरराष्ट्रीय भूमिका का भी हिस्सा बन चुका है.
विदेश नीति विशेषज्ञ सामंथा कर्माकर कहती हैं,
आज AI केवल सॉफ्टवेयर नहीं है. यह भू-राजनीति, आर्थिक शक्ति, राष्ट्रीय सुरक्षा और वैश्विक प्रभाव का नया माध्यम बन चुका है. इसलिए AI की चर्चा केवल तकनीक तक सीमित नहीं रह सकती. इसमें यह भी तय होगा कि भविष्य के नियम कौन बनाएगा और उन नियमों में किनकी आवाज़ शामिल होगी.
AI की असली लड़ाई लैब में नहीं, विचारों में शुरू होती है
अक्सर लोग मानते हैं कि AI सरकारें बनाएंगी और सरकारें ही उसके नियम तय करेंगी.
लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अलग है.
नई तकनीकों के नियम सबसे पहले विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों, उद्योग, नीति मंचों, मीडिया और स्वतंत्र विशेषज्ञों के बीच होने वाली चर्चाओं से निकलते हैं. बाद में वही विचार अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और सरकारों की नीतियों का आधार बनते हैं.
इसीलिए आज दुनिया मान रही है कि AI का भविष्य केवल इंजीनियर नहीं, बल्कि समाजशास्त्री, कानून विशेषज्ञ, शिक्षाविद, महिला शोधकर्ता और नीति विश्लेषक भी तय करेंगे.
महिलाएं केवल उपभोक्ता नहीं, निर्माता भी बनें
AI पर सबसे बड़ी चिंता केवल यह नहीं कि महिलाओं की संख्या कम है.
असल चिंता यह है कि उनकी अनुपस्थिति तकनीक की गुणवत्ता को प्रभावित कर रही है.
OECD, UN Women और World Economic Forum जैसी संस्थाओं की रिपोर्ट बताती हैं कि AI अनुसंधान, तकनीकी शिक्षा और नेतृत्वकारी भूमिकाओं में महिलाओं की भागीदारी अभी भी सीमित है.
इसका असर सीधे AI के निर्णयों पर दिखाई देता है.
भर्ती प्रक्रियाओं में gender discrimination, स्वास्थ्य सेवाओं में गलत प्राथमिकताएं, वित्तीय सेवाओं में असमानता और प्रशासनिक निर्णयों में भेदभाव जैसी समस्याएं इसी असंतुलन से जुड़ी मानी जाती हैं.
सामंथा कर्माकर कहती हैं,
Inclusion केवल social-justice का प्रश्न नहीं है. बेहतर AI बनाने की तकनीकी आवश्यकता भी है. यदि अलग-अलग समाजों और अनुभवों की भागीदारी नहीं होगी तो AI भी अधूरा रहेगा.
दुनिया ने दिशा बदल दी है
कुछ वर्ष पहले तक AI की चर्चा केवल innovation और startup तक सीमित थी.
अब अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं इसे मानवाधिकार और लोकतांत्रिक मूल्यों से जोड़ रही हैं.
OECD के AI Principles हों या UNESCO की Recommendation on the Ethics of Artificial Intelligence, दोनों स्पष्ट रूप से कहते हैं कि भरोसेमंद AI वही होगा जिसमें पारदर्शिता, जवाबदेही, मानवाधिकार और लैंगिक समानता शामिल हो.
यानी अब समावेश कोई अतिरिक्त अध्याय नहीं, बल्कि AI शासन का मूल सिद्धांत बन चुका है.
भारत की तैयारी कितनी आगे है?
भारत ने भी इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं.
नीति आयोग ने AI for All का विजन दिया.
इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय जिम्मेदार AI, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और भरोसेमंद तकनीक पर लगातार काम कर रहा है.
विदेश मंत्रालय भी अब AI को भारत की विदेश नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा मान रहा है.
यूरोप, अमेरिका, इंडो-पैसिफिक और ग्लोबल साउथ के साथ भारत की तकनीकी साझेदारियां लगातार बढ़ रही हैं.
लेकिन सामंथा कर्माकर मानती हैं कि अभी एक महत्वपूर्ण कमी बाकी है.
भारत की AI साझेदारियां मजबूत हो रही हैं, लेकिन यदि उनमें विविध सामाजिक समूहों, महिला शोधकर्ताओं, विश्वविद्यालयों और नीति संस्थानों की आवाज़ और अधिक शामिल हो तो भारत वैश्विक AI नेतृत्व में और प्रभावशाली भूमिका निभा सकता है.
दक्षिण एशिया की अलग चुनौती
दक्षिण एशिया तेजी से डिजिटल हो रहा है.
लेकिन STEM शिक्षा, शोध अनुदान, स्टार्टअप नेतृत्व और तकनीकी निर्णयों में महिलाओं की भागीदारी अभी भी सीमित है.
दूसरी चुनौती यह है कि AI के अधिकांश नैतिक मॉडल यूरोप और उत्तर अमेरिका में विकसित हुए हैं.
भारत और दक्षिण एशिया की सामाजिक संरचना, भाषाई विविधता और विकास संबंधी आवश्यकताएं उनसे अलग हैं.
यही कारण है कि भारत यदि क्षेत्रीय सहयोग के माध्यम से AI पर अपनी सोच विकसित करता है तो वह केवल अपने लिए नहीं बल्कि पूरे ग्लोबल साउथ के लिए एक नया मॉडल प्रस्तुत कर सकता है.
भारत की बौद्धिक शक्ति सबसे बड़ी पूंजी
भारत के पास केवल आईटी उद्योग ही नहीं है.
देश के पास मजबूत विश्वविद्यालय, शोध संस्थान और नीति मंच भी हैं.
Observer Research Foundation (ORF), RIS, Carnegie India जैसे संस्थान पहले से तकनीक और विदेश नीति पर गंभीर विमर्श करते रहे हैं.
यदि ऐसे संस्थानों के माध्यम से AI नैतिकता, महिला नेतृत्व, डेटा विविधता और सार्वजनिक नीति पर दीर्घकालिक शोध को बढ़ावा मिले तो भारत वैश्विक AI बहस में नई बौद्धिक दिशा दे सकता है.
सामंथा कर्माकर कहती हैं,
AI की अगली प्रतिस्पर्धा केवल कम्प्यूटिंग पावर की नहीं होगी. यह विचारों, भरोसे और जिम्मेदार नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा होगी. भारत के पास इन तीनों क्षेत्रों में योगदान देने की क्षमता है.
समावेश ही भारत की सॉफ्ट पावर बन सकता है
भारत लंबे समय से लोकतंत्र, विविधता और विकास के साझा मॉडल की बात करता आया है.
AI के दौर में यही पहचान उसकी सबसे बड़ी कूटनीतिक ताकत बन सकती है.
यदि भारत ऐसी AI व्यवस्था विकसित करता है जिसमें महिलाएं, विभिन्न भाषाएं, ग्रामीण समाज, अनुसूचित समुदाय और अलग-अलग सामाजिक अनुभव बराबरी से शामिल हों, तो वह केवल तकनीक का निर्यात नहीं करेगा बल्कि विश्वसनीय शासन का मॉडल भी प्रस्तुत करेगा.
भविष्य की सबसे बड़ी परीक्षा
कृत्रिम बुद्धिमत्ता आने वाले वर्षों में दुनिया की राजनीति, अर्थव्यवस्था और समाज को नई दिशा देगी.
लेकिन इतिहास यह भी बताएगा कि इस तकनीक को किसने बनाया और किसके लिए बनाया.
भारत के सामने अवसर केवल AI महाशक्ति बनने का नहीं है.
वास्तविक अवसर यह है कि वह दुनिया को दिखाए कि तकनीकी प्रगति और सामाजिक न्याय एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं.
और शायद यही भविष्य की सबसे जिम्मेदार कूटनीति भी होगी- जहां तकनीक का विकास केवल तेज नहीं, बल्कि सबको साथ लेकर आगे बढ़े.
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