भारत और बांग्लादेश के रिश्ते इस समय एक ऐसे कूटनीतिक मोड़ पर हैं, जहां दोनों देश एक-दूसरे से दूर भी नहीं जा सकते और पुराने भरोसे के साथ आगे भी नहीं बढ़ पा रहे हैं.
हाल के महीनों में दोनों तरफ से fresh start और constructive engagement की भाषा जरूर सुनाई दे रही है, लेकिन रिश्तों पर शेख हसीना का मुद्दा अब भी भारी है.
हसीना के भारत में रहने और उनके प्रत्यर्पण की बांग्लादेश की मांग ने रिश्ते को सबसे कठिन सवाल के सामने खड़ा कर दिया है.
भारत के लिए चुनौती यह है कि वह एक पूर्व प्रधानमंत्री के साथ न्याय और मानवीय व्यवहार सुनिश्चित करे, लेकिन साथ ही यह भी देखे कि यह विवाद ढाका को भारत-विरोधी रणनीतिक खेमे की ओर और न धकेले.
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हसीना से आगे देखना जरूरी
भारत-बांग्लादेश संबंधों को केवल 'Hasina prism' से देखना बड़ी रणनीतिक भूल होगी.
नई बांग्लादेशी सरकार अपनी विदेश नीति को फिर से परिभाषित करने की कोशिश कर रही है. प्रधानमंत्री तारिक रहमान के नेतृत्व में ढाका ने अपनी शुरुआती विदेश यात्राओं में मलेशिया और चीन को प्राथमिकता दी. चीन के साथ संबंधों को 'Community with a Shared Future' के स्तर तक ले जाने और BCIM connectivity corridor जैसे प्रस्तावों पर चर्चा ने नई दिल्ली की चिंताएं बढ़ाई हैं.
मोंगला पोर्ट के आसपास चीनी गतिविधियों और पाकिस्तान तथा तुर्की के साथ बढ़ते संपर्क भी भारत के लिए महत्वपूर्ण संकेत हैं.
लेकिन इसे केवल anti-India policy मानना भी सही नहीं होगा.
बांग्लादेश की नई सोच को 'Bangladesh First' के रूप में समझना ज्यादा उचित है- यानी जो देश उसके राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ाने में मदद करेगा, ढाका उसके साथ काम करेगा.
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असली रिश्ते का सवाल: पानी, व्यापार और सुरक्षा
हसीना का मुद्दा महत्वपूर्ण है, लेकिन भारत-बांग्लादेश संबंध इससे कहीं बड़े हैं.
गंगा जल संधि दिसंबर 2026 में समाप्त होने वाली है. 54 साझा नदियों वाले दोनों देशों के लिए यह आने वाले समय की सबसे बड़ी कूटनीतिक चुनौतियों में से एक है.
इसके अलावा तीस्ता जल समझौता, मोंगला और मीरसराय के आर्थिक क्षेत्र, सीमा सुरक्षा, व्यापार और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा जैसे मुद्दे भी रिश्ते के भविष्य को प्रभावित करेंगे.
हाल के महीनों में भारत ने बांग्लादेश के लिए पर्यटक वीजा सेवाएं फिर शुरू की हैं और ऊर्जा संकट के दौरान डीजल तथा 1,160 MW बिजली की आपूर्ति जारी रखी है. ऐसे कदम बताते हैं कि दोनों देशों के बीच व्यावहारिक सहयोग की गुंजाइश अभी भी बनी हुई है.
चीन-पाकिस्तान फैक्टर से आगे क्या?
नई दिल्ली के लिए सबसे बड़ा रणनीतिक जोखिम यह होगा कि हसीना प्रत्यर्पण विवाद धीरे-धीरे भारत-बांग्लादेश के पूरे रिश्ते को प्रभावित करने लगे.
भारत को अपनी सुरक्षा चिंताओं पर स्पष्ट रहना होगा, खासकर इस बात पर कि बांग्लादेश की जमीन का इस्तेमाल भारत-विरोधी गतिविधियों के लिए न हो.
वहीं बांग्लादेश को भी यह समझना होगा कि हर द्विपक्षीय मुद्दे को हसीना के प्रत्यर्पण से जोड़ना उसके अपने आर्थिक और सुरक्षा हितों के लिए नुकसानदेह हो सकता है.
दोनों देशों के बीच आर्थिक और भौगोलिक संबंध इतने गहरे हैं कि किसी तीसरे देश के साथ रणनीतिक साझेदारी इन संबंधों का विकल्प नहीं बन सकती.
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अब जरूरी है एक राजनीतिक पहल
इस समय दोनों देशों को किसी प्रतीकात्मक बयान से ज्यादा सीधी राजनीतिक बातचीत की जरूरत है.
एक उच्चस्तरीय भारत यात्रा या द्विपक्षीय शिखर वार्ता इस दिशा में बड़ा कदम हो सकती है. लेकिन ऐसी बैठक तभी सफल होगी जब उसमें हसीना के मुद्दे के साथ-साथ पानी, व्यापार, ऊर्जा, कनेक्टिविटी, सीमा सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता पर भी ठोस बातचीत हो.
भारत और बांग्लादेश के रिश्ते अब केवल पड़ोसी देशों के रिश्ते नहीं हैं. ये दोनों देशों की अर्थव्यवस्था, सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता से जुड़े हुए हैं.
इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि हसीना के मुद्दे पर कौन जीतेगा.
असली सवाल यह है कि क्या दोनों देश इस कठिन दौर को पार कर एक नए, अधिक व्यावहारिक और पारस्परिक हितों पर आधारित रिश्ते की शुरुआत कर पाएंगे?
यही भारत-बांग्लादेश संबंधों की अगली बड़ी परीक्षा होगी.
