... तभी इबोला से लड़ाई संभवः सिद्धार्थ मुखर्जी

न्यूयॉर्क: पुलित्जर पुरस्कार प्राप्त भारतीय-अमेरिकी लेखक और कैंसर विशेषज्ञ सिद्धार्थ मुखर्जी ने इबोला को एक चतुर विषाणु बताते हुए कहा कि ‘‘हमें भी चतुर बनना होगा’’.इस बीमारी की पहचान इसके लक्षणों के उभरने से पूर्व ही करनी होगी. न्यू यॉर्क टाइम्स में रविवार को एक संपादकीय लेख में मुखर्जी ने कहा कि डलास निवासी एक […]

न्यूयॉर्क: पुलित्जर पुरस्कार प्राप्त भारतीय-अमेरिकी लेखक और कैंसर विशेषज्ञ सिद्धार्थ मुखर्जी ने इबोला को एक चतुर विषाणु बताते हुए कहा कि ‘‘हमें भी चतुर बनना होगा’’.इस बीमारी की पहचान इसके लक्षणों के उभरने से पूर्व ही करनी होगी.

न्यू यॉर्क टाइम्स में रविवार को एक संपादकीय लेख में मुखर्जी ने कहा कि डलास निवासी एक व्यक्ति थॉमस डंकन के मामले की पृष्ठभूमि में अमेरिका में विषाणु के प्रवेश और प्रसार को रोकने के लिए तीन रणनीतियों का प्रस्ताव किया गया है. डंकन की इबोला विषाणु के प्रभाव में आने से मौत हो गई थी.
इबोला के प्रसार को रोकने के लिए पहला सुझाव है कि इबोला प्रभावित देशों से यात्रा करने वाले लोगों पर कडे प्रतिबंध लगाए जाएं, दूसरा इबोला प्रभावित क्षेत्रों से आने वाले लोगों का परीक्षण किया जाए और तीसरा प्रस्ताव है कि सभी प्रभावित और संदिग्ध मरीजों की निगरानी की जाए और उनके संपर्क में आने वाले लोगों में से सभी को अलग थलग रखा जाए.
अपने संपादकीय में उन्होंने लिखा, ‘‘इबोला एक चतुर विषाणु है और उससे लडने के लिए हमें भी चतुर होने की जरुरत है.’’ मुखर्जी को 2011 में उनकी किताब ‘द एंपरर ऑफ ऑल मलाडाइस :ए बायोग्राफी ऑफ कैंसर’ के लिए पुलित्जर पुरस्कार मिला था. मुखर्जी ने एक चौथी रणनीति भी प्रस्तावित की है कि नवीन तरीकों को प्रयोग कर विषाणु की पहचान इस बीमारी के लक्षणों के उभरने से पूर्व ही करनी होगी.

प्रभात खबर डिजिटल प्रीमियम स्टोरी

लेखक के बारे में

By Prabhat Khabar Digital Desk

यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >