छठ का प्रसाद

नवीन कुमार साह भारत में, खास कर बिहार में बड़े हर्षोल्लास से मनायी जाने वाली ‘छठ पूजा’ की एक अनोखी परंपरा है- ‘अपने सगे-संबंधियों के यहां प्रसाद बांटने जाना.’ इसी बहाने हमें एक-दूसरे से मिलने और उनका हालचाल जानने का मौका मिल जाता है. पिछले साल मैं भी इसी परंपरा को निभाने अपनी बहन के […]

नवीन कुमार साह
भारत में, खास कर बिहार में बड़े हर्षोल्लास से मनायी जाने वाली ‘छठ पूजा’ की एक अनोखी परंपरा है- ‘अपने सगे-संबंधियों के यहां प्रसाद बांटने जाना.’ इसी बहाने हमें एक-दूसरे से मिलने और उनका हालचाल जानने का मौका मिल जाता है.
पिछले साल मैं भी इसी परंपरा को निभाने अपनी बहन के यहां जा रहा था. एक सुनसान जगह पर एक छोटी-सी झोपड़ी थी. उसके बाहर एक बुजुर्ग अपनी खाट पर बैठे थे. उन्होंने मेरे हाथ में प्रसाद की पोटली देखते ही मुझसे रूकने का इशारा किया. पहले तो मैं किसी अनहोनी की आशंका से डर गया. फिर उनकी उम्र को देखते हुए रूक गया. मुझे लगा संभवत: उन्हें मेरी किसी सहायता की जरूरत हो. उन बुजुर्ग ने मुझसे पूछा- ”बेटा, छठ का प्रसाद बांटने जा रहे हो क्या?” मेरे ‘हां’ करने पर उन्होंने कहा- ”बेटा एक बात बोलूं ? पूरी करोगे?” मैंने आश्चर्य कहा- ”अगर मुझसे हो पायेगा, तो जरूर पूरा करूंगा.”
उन्होंने कहा- ”बेटा मुझे भी थोड़ा छठ का प्रसाद खाने को दे दो?” मैंने आश्चर्य से कहा- ”पर बाबा आप तो मुसलमा…” उनके हाथ में बदना (टोटीदार लोटा) और बड़े छापवाली लुंगी देख कर मैं समझ गया था. मेरी बात खत्म होने से पहले ही उन्होंने कहा- ”बेटा, तुझे भी मैं केवल मुसलमान दिखता हूं? मैं मुसलमान या हिंदू बाद में हूं. पहले तो मैं एक इंसान हूं.
बताओ अब प्रसाद दोगे?” उनकी अावाज में एक अजीब-सी खुशी की झनक महसूस हो रही थी. मैंने चुपचाप थैले से प्रसाद निकाला व उन्हें दे दिया और वह उसे प्रणाम करके खाने लगे. मैं दबी जुबान में उनसे पूछा- ”बाबा एक बात पूछूं?” बाबा ने कहा- ”पूछो.” मैंने कहा- ”छठ तो यहां भी होता है, पर आपने प्रसाद मुझसे ही क्यों मांगा?” बाबा उदास स्वर बोले- ”बेटा, हर साल छठ पूजा के बाद गांव के हमारे हिंदू भाई मुझे प्रसाद खिलाने आते थे और मैं प्रसाद खाकर ही अपने दिन की शुरुआत करता था. आज भी इसी इंतजार में तीन बज गये. मैंने पूछा- ”तो इस बार वे लोग आपको प्रसाद खिलाने नही आये?”
बाबा कांपती आवाज में बोले- ”पिछले साल मुहर्रम में कुछ नये खून के लड़के एक नेता के बहकावे मे आकर आपस में उलझ गये थे. तब से न इधर के लोग सेवईयां बांटते हैं और न ही उधर के लोग प्रसाद, मगर मुझे आज भी उस प्रेमरूपी प्रसाद का इंतजार है.”

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