कुछ खास जायकों का उठाएं लुत्फ

पुष्पेश पंत दीपावली का नाम सुनते ही हमारे मन में चित्र उभरने लगते हैं जगमगाते घरों के, बचपन में छोड़े पटाखों और आतिशबाजी के, जब प्रदूषण का संकट इतना विकट नहीं था. साथ ही खील और उन खिलौनों की, जो चीनी के बने होते थे. गुजरे जमाने में दीपावली का जश्न कोजागरी पूर्णमासी अर्थात शरद […]

पुष्पेश पंत

दीपावली का नाम सुनते ही हमारे मन में चित्र उभरने लगते हैं जगमगाते घरों के, बचपन में छोड़े पटाखों और आतिशबाजी के, जब प्रदूषण का संकट इतना विकट नहीं था. साथ ही खील और उन खिलौनों की, जो चीनी के बने होते थे. गुजरे जमाने में दीपावली का जश्न कोजागरी पूर्णमासी अर्थात शरद पूर्णिमा से ही शुरू हो जाता था. दीपावली से पंद्रह दिन पहले. इस दिन का अपना महत्व था.
मान्यता है कि इस दिन चंद्रमा अपनी 16 कलाओं से संपन्न होता है और उसकी रश्मियां पीयूष वर्षण करती हैं. इसलिए लोग खीर पका चांदनी के रस में भीगने को रातभर खुले में छोड़ देते थे. राजस्थान के राजमहलों में खासकर जयपुर, उदयपुर की रियासतों में मेहमानों का स्वागत सिर्फ सफेद व्यंजनों से किया जाता था.
आज की नयी पीढ़ी अपने खान-पान की इस विरासत से अनभिज्ञ है. इसीलिए हमारे प्रयोग-प्रेमी मित्र शैफ निशांत चौबे ने यह चुनौती स्वीकार की कि इस बार शरद पूर्णिमा का स्वागत वह ऐसे शाकाहारी श्वेत भोज से करेंगे, जिसके 16 व्यंजन षोडश चंद्रकलाओं की याद दिलायेंगे. खाने के शौकीन चुनिंदा मेहमानों के लिए इसका आयोजन राजधानी के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर अनेक्स के खुले आंगन में किया गया.
झारखंड के निशांत ऑस्ट्रेलिया तथा अंटार्कटिक को छोड़ सभी महाद्वीपों में खाना पका चुके हैं. मेरे साथ उनकी शाकाहारी जुगलबंदी बीच-बीच में सधती ही रहती है. लेकिन, इस बार निशांत के कुछ प्रयोग अनूठे होने के साथ ही असाधारण और स्वादिष्ट भी थे. ‘शुभ्र ज्योत्स्ना ज्यौनार’ में शैफ का प्रयास यह था कि हिंदुस्तान के विभिन्न प्रांतों के व्यंजनों का प्रतिनिधित्व हो.
आरंभ ‘अष्टामृत’ से किया गया, जो पारे की तरह फिसलनदार ठोस और द्रव के दरमियान था. छोटी सी कटोरी में यह चंदामामा दूर के की याद दिला रहा था. पारंपरिक पंचामृत में तीन सफेद फलों के मिश्रण ने इसे जन्म दिया था. दक्षिण भारत में कुछ मंदिरों में इसे पंचामृत की जगह काम में लाया जाता है
. ऊंट के दूध के पनीर से निर्मित ‘तिलोत्तमा’ नामक नन्हीं चौकोर टिक्की को सफेद तिलों की चादर ओढ़ायी गयी थी और ‘फुल्ल कुसुमित’ फूलगोभी अवधी मुसल्लम का कश्मीरी अखरोट-मूली की चटनी से सजा नया अवतार था. कुछ ही मेहमानों को यह जानकारी थी कि अवध के आखिरी नवाब वाजिब अली शाह श्रीकृष्ण की लीला से प्रेरित रास रचाया करते थे. नटवर नागर छांछ के भी दीवाने थे और इसलिए ‘नदर (कमल ककड़ी) की छाछ’ भी इस मेनू में शामिल की गयी थी.
पूर्ण चंद्राकार भरवां हिमाचल का ‘सिद्दू’ प्रकट हुआ दो और गोलाकार झक्क सफेद रोटियों के साथ. दूध में उबली धुली माष निर्जला की सफेदी होड़ ले रही थी मक्खन बड़े और पनीर-खोए से तैयार शुभ्र ज्योत्सना से. मधुर रस आदि से अंत तक बरकरार रहा. मिष्ठान में कलाकंद, कांचागोला और ‘नारिकेल पायसम’ की त्रिवेणी (कंदानंद) पेश की गयी. मुख प्रचालन के लिए सफेद चाय और खरबूजे का संकर उपस्थित था.
कुल मिला कर, यह शुभ्रवस्त्रावृत्त भोज हमारे भारतीय खान-पान की विविधता को दर्शाने के साथ-साथ यह भी अनायास झलका रहा था कि हमारा पारंपरिक आहार ऋतुचक्र के अनुकूल होने के कारण कितना सेहतमंद होता था- कृत्रिम रासायनिक स्वाद, रंग और गंध से मुक्त! कविवर रबींद्र नाथ ठाकुर ने ऐसी ही पूर्णमासी से प्रेरित हो वह पंक्ति लिखी थी जिसका अनुवाद है- ‘चांद की हंसी का बांध टूट गया है और प्रकाश छलका जा रहा है!’

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