वर्तमान समय को थोड़ा व्यंग्य का पुट देते हुए कहा जाये, तो जाबिर हुसेन शब्दों की सत्ता को बचाये रखने की साजिश में मुब्तिला हैं. वे शमशेर बहादुर सिंह की तरह नीला आईना बेठोस छोड़ जाना चाहते हैं. आज समूचा राजनीतिक तंत्र सच के आईने से अलहदा तस्वीर पेश करने की जिद पर अड़ा है. ऐसे में अपने समय की ध्वनि को कविताओं में दर्ज करना सामाजिक-राजनीतिक दायित्व निभाना ही है. इसी दायित्व निर्वहन जाबिर हुसेन का ‘आईना किस काम का’, कविता-संग्रह करता है.
आत्मदीप्त करतीं कविताएं
वर्तमान समय को थोड़ा व्यंग्य का पुट देते हुए कहा जाये, तो जाबिर हुसेन शब्दों की सत्ता को बचाये रखने की साजिश में मुब्तिला हैं. वे शमशेर बहादुर सिंह की तरह नीला आईना बेठोस छोड़ जाना चाहते हैं. आज समूचा राजनीतिक तंत्र सच के आईने से अलहदा तस्वीर पेश करने की जिद पर अड़ा है. […]

जिन्हें शब्दों के इल्म का पता है ‘वो जो इब्न बतूता ने नहीं लिखा’, उसके अन लिखे को भी बखूबी समझ जायेंगे. शेख नसीरुल्लाह ने अपनी खब्त-मिजाजी में सदियों पुरानी हवेली की चहारदीवारी को गिरा देने का फैसला लिया, और गिराने में उतना ही वक्त लगा, जितना उसे खड़ा करने में उनके पुरखों ने लगाया था. इस कविता की अंतिम दो पंक्तियां मानो निरे वर्तमान की अनसुनी आवाज को इतिहास में चुपचाप दर्ज कर रही है―ं- मैं शेख नसीरुल्लाह का वंशज हूं/ मुझे इतिहास को दुरुस्त करने का हक है.
दोआबा प्रकाशन से आये इस संग्रह में इब्न बतूता की आंखें देखने का काम कर रही हैं. अपने बारे में वे कहते भी हैं कि ‘अदृश्य सितारों से संवाद करने की आदत ने मेरा पीछा नहीं छोड़ा. फर्क सिर्फ इतना था कि धीरे-धीरे निजी दुख संवाद के दायरे से पूरी तरह बाहर होते गये. मेरी अभिव्यक्तियां ‘आत्म-संवाद’ से’ जन-संवाद’ की ओर मुड़ गयीं’.
जन-संवाद का ही नतीजा है कि कुल पंद्रह शब्दों की कविता संवाद के कई दरवाजे खोलती चलती है- ―’इब्न बतूता ने/ असंख्य/ देशवासियों की/ आत्मा को/ वंशगत सत्ता की/ जंजीरों में/ जकड़ा देखा.’ गैर की बस्ती, बादल कहां छिपे हैं, किसने मचाई लूट, नगमा, नुस्खा और शहर तमाम जैसी एकदम छोटी-छोटी कविताएं सहृदय के अंतःस्थल को वेध जाती हैं.
जाबिर हुसेन हिंदी-उर्दू के दोआब पर खड़े अपनी भाषा से वर्तमान यथार्थ का एक ऐसा आईना पेश करते हैं, जिसमें काव्य-रसिक कविता से रूबरू तो होता ही है और उसके मन में नयी कल्पनाएं भी उपजती हैं. मानो भाषा में सचमुच कोई प्रकाश हो.
लोककथाओं में प्रकृति कहीं-न-कहीं वह आग छुपा रखी होती है, जिसका संधान करना होता है. जाबिर हुसेन अपने संग्रह ‘आईना किस काम का’ में आत्म की खोज में तो हैं ही, पाठकों के मन में वह स्फुलिंग भी उत्पन्न करते हैं, जिसकी रोशनी में पाठक ज्ञान समृद्ध तो हो ही, आत्मदीप्त भी हो. ऐसा करने में वह पूरी तरह सफल हैं. मनोज मोहन