रंगमंच के क्षेत्र में शोधार्थियों की कमी महसूस हो, तो समझने लायक जरूरी बात यह है कि रंगकर्म ज्ञान का एक चुनौती पूर्ण और जटिल विषय है.
ऐसे समय में नाटककार सुरेंद्र वर्मा पर शोद्ध के रूप में आयी पुस्तक का हिंदी साहित्य में स्वागत होना चाहिए. ज्ञान प्रकाशन, कानपुर से प्रकाशित पुस्तक ‘सुरेंद्र वर्मा के नाटकों का अनुशीलन’ की शोधार्थी लेखिका डाॅ जयश्री सिंह हैं. पुस्तक के शीर्षक से पता चलता है कि लेखिका का मकसद शोद्ध के रूप में सुरेंद्र वर्मा की रचनाओं को जांचना है.
इस पुस्तक सुरेंद्र वर्मा ने जो कुछ लिखा है, उसका आशय समझाते समय लेखिका ने उनके सारे नाटकों, उपन्यासों, कहानियों और कविताओं को विशेष रूप से सिलसिलेवार विवरण दिया है. उनके रचे गये मिथक नाटकों एवं एकांकी नाटकों सहित उपन्यासों का वास्तविक तथ्यों को समझाते हुए अलग करती हैं.
इस शोध पुस्तक को छह अध्यायों में विभाजित कर उनके नाटकों के गहन अध्ययन का प्रयास किया है. प्रत्येक में वर्मा के रंगकर्म कृतित्व का एक छोटा सा लेखा-जोखा है.
बेशक पार्श्व में सुरेंद्र वर्मा को उपेक्षित करते हिंदी के समीक्षकों का वास्तविक चरित्र उभरता है. कुछ निर्देशकों की टिप्पणियां भी दिखती हैं. बिल्कुल उसी तरह जिस तरह मोहन राकेश, धर्मवीर भारती, इत्यादि को उनके नाटकों, कहानियों, उपन्यासों को सही-गलत की कसौटी पर कसा गया था और आज भी कसा जाता है.
डाॅ जयश्री सिंह की यह पुस्तक सुरेंद्र वर्मा के मात्र रंगकर्म को ही नहीं, बल्कि उनके रचनाकर्म को पूरी तरह जानने का काम भी करती है.
उनके रंगकर्म नाटकों की इतिहास-भूगोल की परत हटाकर हर हिस्सा हमें दिखाती है. नाटककार सुरेंद्र वर्मा और उनके व्यक्तित्व साथ-साथ उनकी रचना विषय पर लेखिका का शोध अध्ययन तथ्यों की विश्वसनीयता की मांग इस पुस्तक में पूरी होती है.
यह बात स्पष्ट है कि सुरेंद्र वर्मा आधुनिक युवा निर्देशकों के प्रयोगशील नाटककार है. मोहन राकेश के बाद सुरेंद्र वर्मा के नाटक हिंदी नाटक और रंगमंच के नयी दिशा प्रदान करते हैं. प्रभावपूर्ण नाट्यभाषा, शिल्प शैली एवं कुशल रंगमंचीयता सुरेंद्र वर्मा के नाटकों की कुछ ऐसी विशेषताएं है, जो रंगमंच पर अपना विशेष प्रभाव डालती है. अपने नाटकों में स्त्री-पुरुष संबधों की छानबीन ही नहीं करते, अपितु आज के अत्याधुनिक परिवेश में नये समीकरणों की स्थापना भी करते हैं.
– जीतेंद्र सिंह
