कोर्टमार्शल दलित चेतना का नाटक नहीं

राजेश चंद्र वरिष्ठ रंगकर्मी हिंदी रंगमंच में दलितों के सवालों को जान-बूझ कर या तो नजरअंदाज किया गया या उन्हें प्राथमिकता का सवाल नहीं बनने दिया गया है. इसके पीछे बड़ा कारण है अधिकांश नाटककारों और निर्देशकों का सवर्ण वर्गों से होना. इनके यहां दलितों-पिछड़ों के प्रति करुणा या सदाशयता का छद्म जरूर मिल जायेगा, […]

राजेश चंद्र
वरिष्ठ रंगकर्मी
हिंदी रंगमंच में दलितों के सवालों को जान-बूझ कर या तो नजरअंदाज किया गया या उन्हें प्राथमिकता का सवाल नहीं बनने दिया गया है. इसके पीछे बड़ा कारण है अधिकांश नाटककारों और निर्देशकों का सवर्ण वर्गों से होना. इनके यहां दलितों-पिछड़ों के प्रति करुणा या सदाशयता का छद्म जरूर मिल जायेगा, परंतु समूचे आधुनिक हिंदी रंगमंच में एक भी ऐसा नाटक या नाट्य-प्रस्तुति नहीं, जिसमें दलितों की यथार्थ जीवन-स्थितियों और भयावह शोषण-उत्पीड़न का मुखर चित्रण हुआ हो.
हाल के वर्षों में राजेश कुमार के ‘अांबेडकर और गांधी’, ‘सत भाषै रैदास’, ‘हिंदू कोड बिल’, ‘श्राद्ध’ और ‘गाय’ जैसे नाटक, पटना के रणधीर कुमार द्वारा निर्देशित शरण कुमार लिंबाले के ‘आउटकास्ट’ और ‘जहाजी’ (राजेश चंद्र) की प्रस्तुतियां, दिल्ली के वरिष्ठ अभिनेता-निर्देशक लोकेश जैन की ‘अक्करमाशी’ (एकल) तथा युवा निर्देशक ईश्वर शून्य द्वारा की गयी ओमप्रकाश वाल्मीकि की ‘जूठन’ और शिवाजी सावंत की ‘मृत्युंजय’ जैसी प्रस्तुतियों के अलावा दलितों के उत्पीड़न और उनके संघर्षों को उजागर करनेवाले नाटक हिंदी में नहीं मिलते. एनएसडी और संगीत नाटक अकादमी जैसे संस्थानों ने दलितों के सवालों को उठानेवाले नाटकों को कभी जगह दी हो, इसका कोई उदाहरण नहीं मिलता.
हिंदी में दलित नाटक और रंगमंच की परंपरा में बहुत से रंगकर्मी स्वदेश दीपक के ‘कोर्टमार्शल’ का उदाहरण देते हैं. ‘कोर्टमार्शल’ दलितों के प्रति सहानुभूति का नाटक है, पर वह उनके प्रति न्याय नहीं करता. स्वदेश ने रामचंदर को न्याय नहीं दिलवाया.
वे उसे अपराधी मानते हैं और उसके लिए ईश्वरीय न्याय की आकांक्षा व्यक्त करते हैं, ताकि रामचंदर को मृत्युदंड देने के अपरिहार्य ‘पाप’ से बच सकें. शायद यह आधुनिकता, संविधान और दलितों के अनथक संघर्षों का दबाव था, इसलिए ‘कोर्टमार्शल’ में रामचंदर का उत्पीड़न अपराध की श्रेणी में आ गया, वरना भारतीय परंपराओं के अनुसार रामचंदर जैसों के लिए क्रूरतम तरीके से मृत्युदंड के अलावा न्याय-व्यवस्था के पास विकल्प ही क्या था!
नाटक में कर्नल सूरत सिंह, जो प्रिजाइडिंग ऑफिसर है, रामचंदर को व्यक्तिगत तौर पर दोषी नहीं मानता, पर वह उसे दोषमुक्त भी नहीं करता! यह न्याय नहीं, बल्कि न्याय का निषेध है. वह एक तरफ यह सिद्ध करता है कि कैप्टन बीडी कपूर ने रामचंदर का लगातार जातीय-उत्पीड़न करने का अपराध किया है, और ऐसी स्थिति में रामचंदर द्वारा गोली चलाने का निर्णय उसकी एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया थी, पर साथ ही वह यह भी बताता है कि रामचंदर को कल मृत्युदंड का आदेश सुनाया जानेवाला है, जिसके लिए वह मजबूर है! वह कैप्टन कपूर को रिवॉल्वर मुहैय्या कराता है, उसे ‘जलील’ करता है, ताकि कैप्टन आत्महत्या कर ले और कर्नल सूरत सिंह को उस ऐतिहासिक ‘धर्मसंकट’ से उबार ले!
स्वदेश चाहते तो रामचंदर को मुक्त कर उसका सम्मान बचा सकते थे, उसे परिस्थितियों का लाभ देते हुए बरी कर सकते थे, और कैप्टन पर दलित-उत्पीड़न का अभियोग शुरू करवा सकते थे, पर ऐसा करके वे संभवत: अपने सामाजिक वर्ग के विरुद्ध नहीं करना चाहते थे. इसलिए ‘कोर्टमार्शल’ को हिंदी में दलित नाटक या रंगमंच की प्रतिनिधि रचना के तौर पर प्रस्तुत करना सही नहीं है.

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