World Bamboo Day: क्यों बंद हो गया मानुषमुड़िया बंबू प्लांट में उत्पादन? काम बंद होने से किसान हैं मायूस

World Bamboo Day: उद्योग विभाग ने इसके संचालन की जिम्मेदारी झारक्राफ्ट (Jharcraft) को सौंप दी. झारक्राफ्ट ने असम से विशेषज्ञों की टीम बुलायी. उन्होंने क्षेत्र के लोगों को बांस के घर एवं बांस से फर्नीचर बनाने की ट्रेनिंग दी. कुछ समय तक काम चला, फिर बंद हो गया.

World Bamboo Day: पूरी दुनिया में 18 सितंबर को विश्व बांस दिवस मनाया जाता है. झारखंड में भी बांस से बने उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए बंबू सीजनिंग प्लांट या बंबू ट्रीटमेंट प्लांट की स्थापना की गयी थी. इससे बड़े पैमाने पर लोगों को रोजगार मिला था. बांस लगाने वाले किसानों की आय बढ़ी थी. चाकुलिया के मानुषमुड़िया में झारक्राफ्ट की ओर से लगाये गये इस उद्योग की स्थिति क्या है? किसानों की क्या राय है? पढ़ें, चाकुलिया से राकेश सिंह की रिपोर्ट.

असम के विशेषज्ञों ने कारीगरों को दी ट्रेनिंग

वर्ष 2005 में चाकुलिया वन क्षेत्र में स्थित मानुषमुड़िया में बंबू सीजनिंग प्लांट (Bamboo Seasoning Plant) की स्थापना की गयी थी. बड़े ताम-झाम के साथ तत्कालीन उपमुख्यमंत्री सह वन मंत्री सुधीर महतो ने इसका उद्घाटन किया. बाद में उद्योग विभाग ने इसके संचालन की जिम्मेदारी झारक्राफ्ट (Jharcraft) को सौंप दी. झारक्राफ्ट ने असम से विशेषज्ञों की टीम बुलायी. उन्होंने क्षेत्र के लोगों को बांस के घर एवं बांस से फर्नीचर बनाने की ट्रेनिंग दी. कुछ समय तक काम चला, फिर बंद हो गया.

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इस प्लांट को बनाने में लगभग एक करोड़ रुपये खर्च आया था. प्लांट में एक विशेष मशीन की मदद से बांस को विभिन्न रसायनों के साथ एक नियत तापमान पर उपचारित किया जाता था. दावा था कि ऐसा करने से बांस की उम्र 50 वर्ष से अधिक हो जाती है. इन उपचारित बांसों से पलंग, सोफा, कुर्सी समेत कई अन्य फर्नीचर एवं सजावट की सामग्री का निर्माण भी किया जाने लगा.

मानुषमुड़िया प्लांट में बने उत्पादों की रांची में होती थी बिक्री

झारक्राफ्ट के माध्यम से उद्योग विभाग मानुषमुड़िया प्लांट में निर्मित बांसों से बनी सामग्रियों को बेचता था. यहां बनी सामग्रियां रांची जाती थी और वहीं इसकी बिक्री होती थी. जमशेदपुर, घाटशिला, चाकुलिया, बहरागोड़ा व आसपास के इलाकों में इसकी बिक्री की शुरुआत नहीं की गयी. नतीजा यह हुआ कि बांस से बने इन उत्पादों की लागत बहुत बढ़ गयी. चूंकि उत्पाद को खुले बाजार में नहीं बेचा गया, धीरे-धीरे झारक्राफ्ट को नुकसान होने लगा.

झारक्राफ्ट ने प्लांट को इसाफ को सौंपा

झारक्राफ्ट ने घाटा होता देख इस प्लांट को इएसएएफ दुमका (ESAF Dumka) को सौंप दिया. 31 जुलाई 2019 से इस प्लांट का संचालन ईएसएएफ के हाथों में आ गया. कुछ दिनों बाद प्लांट लगभग बंद हो गया. क्षेत्र की बांस को विशेष पहचान दिलाने के लिए वन विभाग ने पहल कर बंबू सीजनिंग प्लांट तो स्थापित करवा दिया, लेकिन सरकारी नीतियों का दंश झेलते-झेलते अब यह प्लांट बंद हो गया है. कई शिल्पकार बेरोजगार हो गये.

कर्मचारियों की कर दी गयी छुट्टी

बंबू सीजनिंग प्लांट में कार्यरत मशीन ऑपरेटर दिनेश झा, तुहिन कांति राणा, परिमल बेड़ा को ई-मेल पर सूचना देकर काम से निकाल दिया गया. इनके साथ-साथ गार्ड चामू सोरेन को भी कार्यमुक्त कर दिया गया. एक करोड़ से अधिक की राशि खर्च करके बनाये गये प्लांट में अब झाड़ियां ही झारियां हैं. स्थानीय लोगों की मानें, तो कई साल से इस प्लांट का ताला भी नहीं खोला गया.

प्रतिवर्ष 5 करोड़ बांस का होता है उत्पादन

चाकुलिया वन क्षेत्र अंतर्गत चाकुलिया, धालभूमगढ़ एवं बहरागोड़ा में लगभग 25 हजार एकड़ भूमि पर बांस के पौधे लगे हैं. वन विभाग की मानें, तो प्रति एकड़ 2 हजार बांस का उत्पादन होता है. एक आकलन के मुताबिक, चाकुलिया में प्रतिवर्ष 5 करोड़ बांस का उत्पादन होता है. इस स्थिति में यदि सरकार बांस से संबंधित उद्योग स्थापित करे, तो क्षेत्र के बांस की खपत भी आसानी से होगी. किसानों को बांसों का उचित मूल्य भी मिलेगा और क्षेत्र के लोग बांस उत्पादन से लेकर बांस उद्योग में कार्य करके रोजगार के अवसर प्राप्त कर सकेंगे.

चाकुलिया के लोगों के लिए नकदी फसल है बांस

लंबे समय से चाकुलिया में बांस का व्यवसाय फल-फूल रहा है. चाकुलिया, बहरागोड़ा एवं धालभूमगढ़ क्षेत्र के लगभग हजारों लोग बांस के व्यवसाय से जुड़े हैं. क्षेत्र में बांस को कैश क्रॉप (नगदी फसल) के नाम से जाना जाता है. जब भी ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को घर बनाने, बेटियों का विवाह करने तथा मरीजों का इलाज कराने के लिए पैसों की आवश्यकता होती है, वे बांस बेचकर इसकी व्यवस्था कर लेते हैं. सैकड़ों लोग बांस के व्यवसाय से भी जुड़े हैं. जमशेदपुर एवं रांची समेत देश के कोने-कोने में यहां से बांस भेजा जाता है. बृहद रूप में बांस उद्योग स्थापित होने पर क्षेत्र के किसानों के साथ-साथ व्यवसायियों को भी सहूलियत होगी.

सीमेंट उद्योग में कोयले की जगह हो सकता है बांस का उपयोग

झारक्राफ्ट के मैनेजिंग डायरेक्टर के रवि कुमार चाकुलिया में बांस उद्योग की संभावना तलाशने आये थे. किसानों एवं व्यवसायियों से मुलाकात कर क्षेत्र के लोगों को बताया कि बांस को चूना-पत्थर में मिलाकर बायोमास तैयार किया जाता है. इसका इस्तेमाल सीमेंट इंडस्ट्री में कोयले के स्थान पर किया जा सकता है. ऐसा करने पर सीमेंट इंडस्ट्री के खर्च में बचत होती है तथा बांस के किसानों को भी लाभ हो सकता है. उन्होंने सीमेंट इंडस्ट्री के साथ एमओयू करने की बात भी उस दौरान कही थी. इस आश्वासन के वर्षों बीतने के बाद भी अब तक कोई पहल नहीं हुई. इससे क्षेत्र के किसानों में रोष है. चाकुलिया पहुंचे उद्योग विभाग के मैनेजिंग डायरेक्टर के रवि कुमार बताया था कि मानुषमुड़िया में पीपीपी मोड में बांस उद्योग फिर से शुरू किया जायेगा. यहां कटलरी आइटम का निर्माण होगा. वह भी कोरा साबित हुआ.

नहीं लगा इनोवेटिव प्रोसेसिंग प्लांट

नेशनल बंबू मिशन (National Bamboo Mission) के तहत चाकुलिया वन क्षेत्र अंतर्गत चाकुलिया एवं बहरागोड़ा में 4 इनोवेटिव प्रोसेसिंग यूनिट लगायी जा रही थी. 2 वर्ष बीतने के बाद भी अब तक काम शुरू नहीं हो सका. बांस के क्षेत्र में समग्र विकास करने तथा जिन क्षेत्रों में बांस की खेती होती है, वहां बांस की खेती को बढ़ावा देना, मार्केटिंग करना, बांस के किसानों एवं मजदूरों को रोजगार दिलाना केंद्र एवं राज्य सरकार का लक्ष्य है.

ये थी सरकार की योजना

इस संबंध में चाकुलिया में एक तथा बहरागोड़ा में तीन यूनिट लगे. इन यूनिट्स में तमाम मशीन एवं संसाधन उपलब्ध कराया जाना था. कहा गया था कि किसानों से बांस खरीदकर बांस से बनी सामग्री, अगरबत्ती स्टिक, आइसक्रीम स्टिक से लेकर बांस की चटाई, बांस के घर और बांस के फर्नीचर तक बनाये जायेंगे. वर्ष 2020 से इस प्रोजेक्ट की शुरुआत चाकुलिया वन क्षेत्र अंतर्गत चाकुलिया, बहरागोड़ा में हुई, पर आज तक इसे पूरा नहीं किया जा सका.

जुलाई से सितंबर माह तक होता है बांसों का प्रजनन काल

बरसात के मौसम को बांस का प्रजनन काल माना जाता है. वर्तमान समय में बांसों में नये कोंपल निकलने शुरू हुए हैं. इन्हें राईजोम कहा जाता है. प्रजनन काल के दौरान क्षेत्र में बांसों की कटाई बंद रहती है. इससे बांस का व्यवसाय भी प्रभावित होता है. किसानों का मानना है कि बांसों की कटाई के दौरान निकलने वाले नये पौधे नष्ट हो सकते हैं. नये पौधों को नष्ट होने से बचाने के लिए ही बरसात के महीने में जुलाई से सितंबर तक बांस की कटाई बंद रहती है. इस दौरान एक बांस की जड़ से कम से कम 4 नये पौधे निकलते हैं.

मानुषमुड़िया में जल्द प्लांट शुरू हो, चल रहा प्रयास- जयवंत होरो

इसाफ (ESAF) के पदाधिकारी जयवंत होरो ने बताया कि प्लांट में कार्यरत मशीन ऑपरेटर एवं मजदूरों को प्रशिक्षण के लिए दुमका बुलाया गया था. परंतु मशीन ऑपरेटर एवं मजदूरों ने यहां प्रशिक्षण लेने से इंकार कर दिया. बाहर के मजदूर भय से वहां जाकर काम करने से कतरा रहे हैं. इस परिस्थिति में फिलहाल प्लांट में काम बंद रखा गया है. उन्होंने कहा कि बांस से बनी सामग्रियों के कई ऑर्डर हैं, जिसे पूरा नहीं कर पा रहे हैं. जल्द से जल्द मानुषमुड़िया में प्लांट शुरू हो, इसके लिए वे लगातार प्रयास कर रहे हैं.

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By Mithilesh Jha

मिथिलेश झा PrabhatKhabar.com में पश्चिम बंगाल राज्य प्रमुख (State Head) के रूप में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार हैं. उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 32 वर्षों से अधिक का व्यापक अनुभव है. उनकी रिपोर्टिंग राजनीति, सामाजिक मुद्दों, जलवायु परिवर्तन, नवीकरणीय ऊर्जा, कृषि और अन्य समसामयिक विषयों पर केंद्रित रही है, जिससे वे क्षेत्रीय पत्रकारिता में एक विश्वसनीय और प्रामाणिक पत्रकार के रूप में स्थापित हुए हैं. अनुभव : पश्चिम बंगाल, झारखंड और बिहार में 3 दशक से अधिक काम करने का अनुभव है. वर्तमान भूमिका : प्रभात खबर डिजिटल (prabhatkhabar.com) में पश्चिम बंगाल के स्टेट हेड की भूमिका में हैं. वे डिजिटल न्यूज कवर करते हैं. तथ्यात्मक और जनहित से जुड़ी पत्रकारिता को प्राथमिकता देते हैं. वर्तमान में बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 पर पूरी तरह से फोकस्ड हैं. भौगोलिक विशेषज्ञता : उनकी रिपोर्टिंग का मुख्य फोकस पश्चिम बंगाल रहा है, साथ ही उन्होंने झारखंड और छत्तीसगढ़ की भी लंबे समय तक ग्राउंड-लेवल रिपोर्टिंग की है, जो उनकी क्षेत्रीय समझ और अनुभव को दर्शाता है. मुख्य विशेषज्ञता (Core Beats) : उनकी पत्रकारिता निम्नलिखित महत्वपूर्ण और संवेदनशील क्षेत्रों में गहरी विशेषज्ञता को दर्शाती है :- राज्य राजनीति और शासन : झारखंड और पश्चिम बंगाल की राज्य की राजनीति, सरकारी नीतियों, प्रशासनिक निर्णयों और राजनीतिक घटनाक्रमों पर निरंतर और विश्लेषणात्मक कवरेज. सामाजिक मुद्दे : आम जनता से जुड़े सामाजिक मुद्दों, जनकल्याण और जमीनी समस्याओं पर केंद्रित रिपोर्टिंग. जलवायु परिवर्तन और नवीकरणीय ऊर्जा : पर्यावरणीय चुनौतियों, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और रिन्यूएबल एनर्जी पहलों पर डेटा आधारित और फील्ड रिपोर्टिंग. डाटा स्टोरीज और ग्राउंड रिपोर्टिंग : डेटा आधारित खबरें और जमीनी रिपोर्टिंग उनकी पत्रकारिता की पहचान रही है. विश्वसनीयता का आधार (Credibility Signal) : तीन दशकों से अधिक की निरंतर रिपोर्टिंग, विशेष और दीर्घकालिक कवरेज का अनुभव तथा तथ्यपरक पत्रकारिता के प्रति प्रतिबद्धता ने मिथिलेश झा को पश्चिम बंगाल और पूर्वी भारत के लिए एक भरोसेमंद और प्रामाणिक पत्रकार के रूप में स्थापित किया है.

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