सीएम ने कहा कि 1932 के खतियान आधारित नियोजन नीति लाते हैं, पर इसे असंवैधानिक करार दिया जाता है. अजीब हालत है. हमें तो समझ में नहीं आता है कि राज्य सरकार राज्य के आदिवासी-मूलवासी को अधिकार देने के लिए कानून बनाती है और पेट दर्द यूपी- बिहार के लोगों को होता है. बता दें कि सरकार ने जिस कानून को बनाया, उसे 20 लोगों ने कोर्ट में चुनौती दी. उन्होंने लोगों से सवाल पूछा कि क्या राज्य के बच्चों को नौकरी में प्राथमिकता नहीं मिलनी चाहिए. कहा कि जो कानून इस सरकार बनाती है, तो उसे संवैधानिक करार दिया जाता है और यही कानून कर्नाटक सरकार बनाती है, वहां के लोगों के हक और अधिकार के लिए आरक्षण बढ़ाती है, तो वहां के राज्यपाल उस विधेयक पर मुहर लगाकर दिल्ली भेज देते हैं. लेकिन, झारखंड में अगर आदिवासी-मूलवासी के अधिकार के लिए कानून बने, तो उसे संवैधानिक करार दिया जाता है.