इजरायल और हमास युद्ध के बीच पीड़ित महिलाएं, प्रसव के लिए भटक रहीं, शेल्टर होम में फर्श पर सोने को मजबूर

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इजरायल और हमास युद्ध के बीच पीड़ित महिलाएं, प्रसव के लिए भटक रहीं, शेल्टर होम में फर्श पर सोने को मजबूर
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Wounded Palestinians sit in al-Shifa hospital in Gaza City, central Gaza Strip, after arriving from al-Ahli hospital following an explosion there, Tuesday, Oct. 17, 2023. The Hamas-run Health Ministry says an Israeli airstrike caused the explosion that killed hundreds at al-Ahli, but the Israeli military says it was a misfired Palestinian rocket. AP/PTI(AP10_18_2023_000031B)

एक गर्भवती महिला ने संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी यूएनएफपीए को बताया कि मेरा बच्चा हर विस्फोट को महसूस कर रहा था. महिला ने बताया कि वह जिस स्कूल में आश्रय ली हुई है वह वहां जमीन पर सोई थी. उसने बताया एक रात पहले, वह ठंडे फर्श पर सोई थी जो हर बम विस्फोट से हिल जाता था.

israel vs palestine : इजरायल और हमास युद्ध के बीच आज अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन का एक बयान सामने आया है जिसमें उन्होंने यह कहा है कि उन्होंने इजरायल के नेताओं के साथ बातचीत में यह स्पष्ट कहा है कि यदि हमास के साथ युद्ध के दौरान गाजापट्टी के लोगों को मानवीय सहायता की अनुमति नहीं दी जाती तो इजरायली नेताओं को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया जाएगा. जो बाइडेन ने यह कहा कि इसमें कोई शक नहीं है कि इजरायल पीड़ित है, बावजूद इसके अगर उसने गाजा के लोगों की पीड़ा को कम नहीं किया तो वह दुनिया भर में अपनी विश्वसनीयता खो देगा. यह एक बयान है, लेकिन सच्चाई यह है कि इस युद्ध से इजरायल तो बुरी तरह प्रभावित हुआ ही है गाजा पट्टी के आम लोगों की भी हालत खराब है.

1,400 से अधिक इजरायली मारे गए

इजराइल ने हमास के हमले के बाद उत्तरी गाजा में रहने वाले 11 लाख फिलिस्तीनियों को दक्षिण की ओर चले जाने का निर्देश दिया था. इसकी वजह यह थी कि वह हमास पर जमीनी कार्रवाई करना चाहता था. इजरायल पर हमास के हमले में 1,400 से अधिक इजरायली मारे गए थे. इस बीच संयुक्त राष्ट्र ने आगाह किया कि गाजा में अभूतपूर्व मानवीय संकट पैदा होने की आशंका है.

बच्चों का बचपन छीन रहा है मानसिक दबाव हावी

ऐसे में महिलाओं और बच्चों की चिंता वाजिब है. बच्चों का बचपन छीन रहा है और वे मानसिक दबाव में हैं. युद्ध की वजह से उनकी शिक्षा और स्वास्थ्य सबकुछ बुरी तरह प्रभावित है. वहीं गाजापट्टी की महिलाएं भी गंभीर संकट झेल रही हैं. ReliefWeb में प्रकाशित सूचना के अनुसार गाजापट्टी में महिलाओं की स्थिति बहुत खराब है. एक गर्भवती महिला ने संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी यूएनएफपीए को बताया कि मेरा बच्चा हर विस्फोट को महसूस कर रहा था. महिला ने बताया कि वह जिस स्कूल में आश्रय ली हुई है वह वहां जमीन पर सोई थी. उसने बताया एक रात पहले, वह ठंडे फर्श पर सोई थी जो हर बम विस्फोट से हिल जाता था.

प्रसव के लिए जगह नहीं

वहीं एक अन्य महिला ने बताया कि उसे प्रसव पीड़ा शुरू हो गई थी,लेकिन मुझे नहीं पता था कि मैं अपने बच्चे को कहां और कैसे जन्म दूंगी. बम के हमले की वजह से हमने घर खाली कर दिया था. वह किसी तरह एक एम्बुलेंस तक पहुंचने में कामयाब रही, जिसने उसे गाजा की सबसे बड़ी चिकित्सा सुविधा, अल शिफा अस्पताल के प्रसूति वार्ड में पहुंचाया, लेकिन एक बच्ची को जन्म देने के तीन घंटे बाद ही उसे छुट्टी दे दी गई, क्योंकि अस्पताल में जगह नहीं है.

चौथी दुनिया है गाजा पट्टी

पिछले साल ReliefWeb ने ही एक सूचना प्रकाशित की थी जिसमें इस बात का जिक्र था कि अगर आप गाजा जाते हैं तो यह चौथी दुनिया के देश में प्रवेश करने जैसा होता है. यहां कुछ भी सामान्य नहीं है. हर आम आदमी परेशान है, महिलाएं अपने परिवार की चिंता करती हैं. यहां की महिलाओं में शिक्षा का अभाव है. वे बहुत गरीब है, महिलाओं की बहुत कम आबादी काम करती है. यहां की महिलाएं कहती हैं जीवन बहुत कठिन है. वर्षों की हिंसा, नाकाबंदी और लॉकडाउन झेल रहा यह क्षेत्र शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार हर क्षेत्र में पिछड़ा है और महिलाएं खराब स्थिति में हैं. उनके अधिकारों की किसी को परवाह नहीं.

युवा महिलाओं को नहीं मिल रहे अधिकार

अलजजीरा के वेबसाइट पर 2011 में एक महिला पत्रकार जो फिलिस्तीनी हैं और लंदन में रहती हैं ने लिखा था कि एक युवा फिलिस्तीन के तौर पर मैं बताना चाहती हूं कि हम कितना भी पढ़-लिख लें नौकरी की गुंजाइश गाजा में नहीं है. हमारे अधिकारों पर बात करने वाला कोई नहीं है, जो हमें अधिकार देने की बात करते हैं वे भी उनके समर्थन में खड़े हो जाते हैं, जो हमारे अधिकारों के हनन की वजह हैं.

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लेखक के बारे में

By Rajneesh anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.

राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

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