'बधाई दो' के निर्देशक हर्षवर्धन कुलकर्णी ने बताया राजकुमार राव और भूमि को किस तरह बनें फ़िल्म का हिस्सा..

राजकुमार राव और भूमि पेडनेकर स्टारर फ़िल्म बधाई दो आज सिनेमाघरों में दस्तक दे चुकी है.इस फ़िल्म के निर्देशक हर्षवर्धन कुलकर्णी ने इस फ़िल्म से जुड़े लैवेंडर मैरिज के कांसेप्ट,शूटिंग सहित कई पहलुओं पर बातचीत की.उर्मिला कोरी से हुई बातचीत के प्रमुख अंश

राजकुमार राव और भूमि पेडनेकर स्टारर फ़िल्म बधाई दो आज सिनेमाघरों में दस्तक दे चुकी है. इस फ़िल्म के निर्देशक हर्षवर्धन कुलकर्णी ने इस फ़िल्म से जुड़े लैवेंडर मैरिज के कांसेप्ट,शूटिंग सहित कई पहलुओं पर बातचीत की. उर्मिला कोरी से हुई बातचीत के प्रमुख अंश…

‘बधाई दो’ की कहानी लैवेंडर मैरिज पर है इस पर फ़िल्म बनाने का जेहन में कब औऱ क्यों आया?

हमारी फ़िल्म के जो लेखक हैं.अक्षत और सुमन ये कहानी का आईडिया उनका था.वे जंगली पिक्चर्स के साथ मिलकर इस कांसेप्ट पर काम कर रहे थे.उन्होंने निर्देशन के लिए मुझे पिच किया. इन्होंने जो कहानी लिखी उसके जो दो अहम किरदार हैं.राजकुमार और भूमि जिन्हें निभा रहे हैं. उनकी दुनिया को मैं ज़्यादा एक्सप्लोर करना चाहता था इसलिए मैं फ़िल्म से जुड़ा.यह फ़िल्म लैवेंडर मैरिज पर है. जो बहुत ही ट्रैजिक चीज़ है. ऐसा कहा जाता है कि चीन में तो बाकायदा वेबसाइट है लैवेंडर मैरिज के लिए.जहां गे और लेस्बियन आपस में शादी कर लेते हैं सिर्फ परिवार और समाज के दिखावे के लिए और छिपकर वो अपनी ज़िंदगी जीते हैं. कुलमिलाकर वो रेग्रेसिव ज़िन्दगी जीते हैं. हम उसी रेग्रेसिव ज़िन्दगी को हल्के फुल्के अंदाज़ में अपनी फिल्म में दिखा रहे हैं.

आप खुद लेखक भी हैं ऐसे में किसी दूसरे की स्क्रिप्ट पर फ़िल्म निर्देशन करना कितना मुश्किल या आसान होता है

ये पहली बार हुआ है.मैं सोचता था कि मैं तो कभी नहीं कर पाऊंगा. मुझे सबसे बढ़िया पार्ट जो फ़िल्म बनाने का लगता है.वो लेखन है. ये जो होता है. मुझे कभी नहीं लगा था कि मैं कभी भी किसी और की स्क्रिप्ट पर काम कर पाऊंगा. ये पहली बार हुआ . हंटर की रिलीज के बाद मेरे पास बहुत सारी फिल्मों की कहानी आयी कि ये कर लेते हैं.वो कर लेते हैं लेकिन पिछले चार सालों से मैं ना ही बोल रहा था. मैं खुद भी बैठकर लिखने की कोशिश कर रहा था लेकिन हो नहीं पाया . बधाई दो का कांसेप्ट और कहानी मेरी पास आयी तो मेरे जेहन में यही सवाल था कि मेरे निर्देशन से अक्षत और सुमन कहीं दुखी तो नहीं हो जाएंगे मगर एक महीने में हमारी ट्यूनिंग इतनी अच्छी हो गयी कि कभी लगा ही नहीं कि मैं राइटिंग टीम का हिस्सा नहीं हूं. हम सबने मिलकर एक और ड्राफ्ट फ़िल्म की कहानी का लिखा और वही फाइनल ड्राफ्ट था. मैंने इस दौरान ये जाना कि खुद लिखते हो तो बड़ा बोरिंग प्रोसेस होता है .अकेले बैठो अकेले सोचो.मैं थोड़ा आलसी भी हूं.यही वजह है कि हंटर के बाद मैं दूसरी स्क्रिप्ट नहीं लिख पाया .आनेवाले समय में मिलजुलकर कहानियां लिखने और फ़िल्म बनाने पर फोकस करूंगा.

हंटर के सात सालों बाद आपकी कोई फ़िल्म रिलीज हो रही है इतना लंबा अंतराल में क्या असुरक्षा की भावना आपको नहीं परेशान करती है

मैं थोड़ा अलग किस्म का हूं. मुझे असुरक्षा की भावना नहीं महसूस होती है. मैं बहुत ही अलसी आदमी हूं.लालच नाम की चीज़ बहुत कम है. अब जब बुढापा सामने आ रहा है तो समझ आ रहा है कि मैंने तो ज़्यादा पैसे कमाए नहीं है.अब तो कमाने पड़ेंगे. रिटायरमेंट वाली उम्र आ रही है. वैसे मैं विज्ञापन फिल्में बहुत करता हूं तो उससे मेरी रोजी रोटी चलती रहती है. लंबा ब्रेक हो गया.4 साल तो बधाई दो में ही चले गए.उससे पहले विनिल की फ़िल्म हंसी तो फंसी लिखी थी

बधाई दो को बनने में 4 साल का वक़्त कैसे लग गया

मैं बताना चाहूंगा मैंने 2004 में हंटर की स्क्रिप्ट लिखी थी.2012 में फ़िल्म फ्लोर पर गयी थी.रिलीज 2015 में हुई.बहुत मेहनत से वो फ़िल्म बनी थी क्योंकि उसका कांसेप्ट बहुत अलग था. बधाई दो में इस तरह की परेशानी नहीं हुई थी लेकिन ये ज़रूर मैं समझ गया हूं कि हर फिल्म की एक जर्नी होती है. दो से तीन साल जाते ही हैं.आप लिखते हो फिर ठीक करते हो फिर कास्टिंग होती है.वो भी मुश्किल प्रोसेस है.उनकी डेट्स मिलती है फिर आप शूटिंग करते हो उसके बाद पोस्ट प्रोडक्शन होता है. इस पूरे प्रोसेस में दो से ढाई साल कहीं नहीं गए लेकिन कोविड की वजह से एक साल और लग गए.हम शूट पर जाने वाले ही थे कि कोरोना की पहली लहर आ गयी. शूट खत्म करके जैसे आए सेकेंड वेव आ गयी.रिलीज करने वाले थे तो थर्ड वेव आ गयी थी. मुझे खुशी है कि थिएटर में आने की जो हमारी चाहत थी.वो आखिरकार पूरी हो गयी.

थिएटर में फ़िल्म को रिलीज करना मौजूदा हालात में क्या ज़्यादा रिस्की नहीं है

फिल्ममेकिंग रिस्की बिजनेस है. कोई भी इस बात की गारंटी नहीं दे सकता है कि ये फ़िल्म सफल होगी या ये नहीं होगी.हमारी जो फ़िल्म है जो इसका कांसेप्ट है.उसको सामुहिक तौर पर देखने से एक अलग ही मैजिक है. यह रिस्क अगर चल जाता है तो बहुत सालों तक इसका प्रभाव रहेगा. मेरा मानना है कि ओटीटी पर जो फ़िल्म रिलीज होती है.वो दो घंटे की होती है लेकिन आदमी उसको तीन घंटे में देखता है .वो उसको पॉज करता है. कुछ करके आता है फिर फ़िल्म आगे देखता है. ऐसे में वो फ़िल्म थिएटर वाला प्रभाव नहीं छोड़ पाती है.थिएटर में एक अच्छी फिल्म आपको बहुत अच्छी लग सकती है और एक बुरी फ़िल्म वाहियात लग सकती है. ओटीटी पर आपको अच्छी फिल्म भी ओके लग सकती है और बुरी भी क्योंकि आप टॉर्चर को एक साथ नहीं टाइम लेकर झेलते हैं .ओटीटी प्लेटफार्म वेब सीरीज के लिए अच्छा माध्यम है. वहां आप दो दिन में खत्म करो चलेगा लेकिन फिल्मों के लिए नहीं.

निर्देशक ओनिर ने हालिया अपने इंटरव्यू में कहा था कि वो अपनी एक फ़िल्म में सेना के जवान को गे दिखाना चाहते थे लेकिन उन्हें स्वीकृत नहीं मिली.आपकी फ़िल्म में आपने पुलिस अधिकारी को गे दिखाया है

ये ज़रूरी है दिखाना.नार्मल किस तरह से आप फिर उनको बताओगे.आमतौर पर कोई गे है तो वो कॉस्ट्यूम डिजाइनर है या फ़िल्म इंडस्ट्री से है.ब्यूटी सैलून वाले. जिम वाला.यही स्टीरियोटाइप उनको बनाते आए हैं.हम क्यों नहीं सोचते एक पीटी टीचर,एक वकील,एक पुलिस वाला या फिर एक लैब में काम करने वाली भी समलैंगिक हो सकती है. हर एक क्षेत्र में गे और लेस्बियन हैं.हम कब तक भागते रहेंगे.वैसे शायद हम लकी हैं. हमको किसी तरह का ऑब्जेक्शन का सामना नहीं करना पड़ा

आयुष्मान खुराना की चंडीगढ़ करे आशिकी जब रिलीज हुई थी तब थर्ड जेंडर कम्युनिटी के कई लोग इसके खिलाफ थे उनका कहना था कि बॉलीवुड वाले हमको हमारे हाल पर क्यों नहीं छोड़ देते हैं

हर सोसाइटी में ऐसे लोग होते हैं .जिनको इन सबसे एतराज होता है .कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जिन्हें अच्छा लगता है. अगर आपको इन चीज़ को नार्मल करना है तो इसके ऊपर मेनस्ट्रीम सिनेमा में ऐसी फिल्में बनती रहनी चाहिए. अभी हम दिखा रहे हैं कि ये कम्युनिटी अपनी पहचान को छिपा रही है लेकिन जैसे जैसे हम कहानियां सुनाते जाएंगे.हमको और पहलू पता चलेंगे.हमारी जो स्वीकार्यता इस कम्युनिटी को लेकर है वो और मजबूत होगी तो बनती रहनी चाहिए.किसी के दर्द पर कोई पैसा नहीं बनाना चाहता हूं. ये कहानी बतायी नहीं गयी है इसलिए ये कहानी आकर्षित करती है.

भूमि और राजकुमार ने अपने किरदारों के लिए कितनी मेहनत की

फ़िल्म की स्क्रिप्ट अपने आप में सम्पूर्ण थी.उन्हें बस खुद को उसमें ढालना और डालना था और वो दोनों उस लिहाज से बहुत मंझे हुए कलाकार हैं तो आसानी से किरदार में रच बस गए.हां राजकुमार को अपनी बॉडी पर खासा काम करना पड़ा.हमने उत्तराखंड, हरिद्वार की शूटिंग में खूब मिठाईयां उड़ाई जबकि राजकुमार उबली सब्जी ही खाता था.

क्या हमेशा से भूमि और राजकुमार ही आपकी पहली पसंद थे

मैं एक अरसे से इनके साथ फ़िल्म करना चाहता था.राज ने तो स्क्रिप्ट पढ़कर ही फ़िल्म को हां कह दिया था उसे नरेशन की ज़रूरत नहीं पड़ी थी .भूमि ने तो आधा ही नरेशन सुना था.इंटरवल तक नरेशन पहुंचा था उन्होंने हां कह दिया.

377 अब कानून बन चुका है क्या आप हमेशा से समलैंगिक संबंधों के पक्षधर थे या बदलते वक्त के साथ आपने अपनी सोच बदली

मैं हमेशा से ही ओपन हूं.मुझे ये नियम समझ में ही नहीं आते हैं. हम सब अलग अलग विचारधारा के हैं तो इतना क्या रूल्स बनाकर बैठना है. मुझे सेंसरशिप भी पसंद नहीं है.जहां पर भी बताया जाए कि ऐसा कर सकते हैं.ऐसा नहीं. कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए नियम होने चाहिए.मोरालिटी के लिए नियम नहीं होने चाहिए.आज है .10 साल बाद नहीं होगा.हम हंसेंगे क्या दकियानूसी थे.

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लेखक के बारे में

Author: कोरी

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