मोबाइल नेटवर्क और इंटरनेट सेवाओं में आने वाले समय में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है. भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (ट्राई) ने नेटवर्क स्लाइसिंग तकनीक को लेकर सेवा गुणवत्ता (QoS) नियमों में संशोधन का मसौदा जारी किया है. इस प्रस्ताव के लागू होने पर टेलीकॉम कंपनियां 4G, 5G और अन्य नेटवर्क सेवाओं के लिए अलग-अलग शुल्क तय कर सकेंगी. साथ ही ग्राहकों को बेहतर स्पीड और नेटवर्क प्रदर्शन सुनिश्चित करने के लिए कंपनियों पर नई जिम्मेदारियां भी तय की जाएंगी.
क्या है नेटवर्क स्लाइसिंग और क्यों है अहम?
नेटवर्क स्लाइसिंग एक ऐसी आधुनिक तकनीक है, जिसमें एक ही मोबाइल नेटवर्क को कई वर्चुअल हिस्सों में बांट दिया जाता है. हर हिस्से को किसी खास सेवा या ग्राहक की जरूरत के हिसाब से अलग क्षमता और प्रदर्शन दिया जा सकता है. इससे एंटरप्राइज सेवाएं, इंडस्ट्री 4.0, स्मार्ट फैक्ट्री, हेल्थकेयर, गेमिंग और लो-लेटेंसी एप्लिकेशन जैसी सेवाओं को बेहतर नेटवर्क अनुभव मिल सकता है.
हाल ही में भारती एयरटेल ने इस तकनीक को पेश किया था, जबकि रिलायंस जियो और वोडाफोन आइडिया ने इस मॉडल पर सवाल उठाते हुए इसे ग्राहकों के बीच भेदभाव पैदा करने वाला बताया था.
4G और 5G के लिए अलग-अलग हो सकता है शुल्क
ट्राई के मसौदे में सबसे बड़ा प्रस्ताव यह है कि टेलीकॉम कंपनियों को अलग-अलग नेटवर्क तकनीक के आधार पर शुल्क तय करने की अनुमति दी जा सकती है. यानी भविष्य में 4G और 5G सेवाओं के लिए अलग-अलग कीमत वसूली जा सकती है. अभी अधिकांश उपभोक्ता दोनों सेवाओं के लिए समान शुल्क का भुगतान करते हैं.
हालांकि, इसके लिए कंपनियों को यह साबित करना होगा कि उनके नेटवर्क में पर्याप्त क्षमता और स्पेक्ट्रम उपलब्ध है. नई नेटवर्क स्लाइसिंग सेवा शुरू करने से पहले इसकी जानकारी ट्राई को भी देनी होगी.
स्पीड के वादे पर कंपनियों की होगी जवाबदेही
ट्राई ने इंटरनेट स्पीड को लेकर भी सख्त प्रस्ताव रखा है. कंपनियों द्वारा जिस स्पीड का दावा किया जाएगा, उसकी जांच की जा सकेगी. यदि परीक्षण के दौरान 80 प्रतिशत मामलों में घोषित स्पीड नहीं मिलती है, तो इसे नियमों के अनुरूप नहीं माना जाएगा.
ऐसी स्थिति में टेलीकॉम कंपनियों को ग्राहकों को इसकी जानकारी देनी होगी और नेटवर्क सुधार के लिए जरूरी कदम उठाने होंगे. इसका मकसद उपभोक्ताओं को अधिक पारदर्शी और भरोसेमंद इंटरनेट सेवा उपलब्ध कराना है.
नेटवर्क क्षमता बढ़ाने का भी प्रस्ताव
मसौदे में 4G और 5G नेटवर्क के फिजिकल रिसोर्स ब्लॉक (PRB) उपयोग को अधिकतम 80 प्रतिशत तक सीमित रखने का सुझाव दिया गया है. यदि किसी महीने में लगातार पांच दिनों तक इसका उपयोग इस सीमा से ऊपर जाता है, तो संबंधित ऑपरेटर को नेटवर्क क्षमता बढ़ानी होगी ताकि सेवा की गुणवत्ता प्रभावित न हो.
26 अगस्त तक मांगे गए सुझाव
ट्राई ने इस मसौदे पर सभी हितधारकों से 26 अगस्त तक सुझाव और 7 सितंबर तक प्रतिवाद मांगे हैं. सुझावों और आपत्तियों की समीक्षा के बाद अंतिम नियम जारी किए जाएंगे. यदि ये प्रस्ताव लागू होते हैं, तो भारत में 5G सेवाओं की गुणवत्ता, नेटवर्क प्रबंधन और प्राइसिंग मॉडल में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है.
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