देश में डिजिटल पेमेंट का इस्तेमाल करने वाले लाखों छोटे-बड़े व्यापारियों के लिए आने वाले कुछ दिन बेहद चुनौतीपूर्ण साबित हो सकते हैं. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा पेमेंट एग्रीगेटर्स (PA) के लिए तय की गई री-केवाईसी (Re-KYC) की अंतिम समय सीमा 15 सितंबर 2026 अब बेहद करीब आ चुकी है. नए दिशानिर्देशों के तहत यदि व्यापारियों ने अपना पूर्ण सत्यापन पूरा नहीं कराया, तो उनके डिजिटल पेमेंट कलेक्शन और ऑनलाइन भुगतान सेवाएं तुरंत रोकी जा सकती हैं. स्थिति यह है कि देश भर के करीब 10 लाख से अधिक ऑनलाइन व्यापारी और लगभग 30 प्रतिशत यूपीआई क्यूआर (UPI QR) कोड इस्तेमाल करने वाले छोटे कारोबारी अब तक इस प्रक्रिया को पूरा नहीं कर पाए हैं. कागजी औपचारिकताओं और कड़े भौतिक सत्यापन के नियमों की वजह से पेमेंट कंपनियां और छोटे दुकानदार दोनों ही इस समय भारी दबाव में नजर आ रहे हैं.
री-केवाईसी में क्यों आ रही है बड़ी रुकावट?
आरबीआई ने पिछले साल सितंबर 2025 में अपने मास्टर डायरेक्शंस को अपडेट करते हुए पेमेंट एग्रीगेटर्स को तीन प्रमुख श्रेणियों में विभाजित किया था. इनमें ऑनलाइन, फिजिकल और क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट सेवाएं शामिल हैं. नए नियमों के अनुसार, अब सिर्फ दस्तावेज जमा कर देना ही काफी नहीं है, बल्कि कंपनियों को व्यापारियों के व्यवसाय की प्रकृति, उनके बैकग्राउंड और मालिकाना हक से जुड़ी हर छोटी-बड़ी जानकारी की गहन जांच करनी होगी. जो व्यापारी 1 जनवरी 2026 या उसके बाद जुड़े हैं, उनका सत्यापन पहले ही अनिवार्य कर दिया गया था. अब पुराने व्यापारियों के लिए 15 सितंबर की अंतिम तिथि तय की गई है. हालांकि समय रहते प्रक्रिया शुरू की गई थी, लेकिन आखिरी वक्त पर काम टालने की आदत और पेचीदा कागजी कार्रवाई ने बड़ी समस्या खड़ी कर दी है.
डिजिटल केवाईसी से आगे, भौतिक सत्यापन बना बड़ा सिरदर्द
इस बार केवल ऑनलाइन दस्तावेज अपलोड कर देने भर से सत्यापन पूरा नहीं माना जाएगा. आरबीआई के सख्त निर्देशों के मुताबिक, पेमेंट कंपनियों को कई मामलों में मर्चेंट के व्यापारिक ठिकाने का कॉन्टैक्ट-पॉइंट वेरिफिकेशन यानी ऑन-ग्राउंड फिजिकल वेरिफिकेशन करना होगा. इसके अलावा असली दस्तावेजों से मिलान करने के लिए कंपनी के प्रतिनिधि का खुद मौके पर मौजूद होना जरूरी है. इस नियम का सबसे कठिन पहलू यह है कि इस काम को पूरी तरह किसी थर्ड-पार्टी एजेंसी को आउटसोर्स नहीं किया जा सकता. कंपनियों को अपने ही कर्मचारियों के जरिए गांव-गांव और शहर-शहर जाकर यह जांच पूरी करानी पड़ रही है, जिससे उनके परिचालन और लागत पर अचानक भारी बोझ आ पड़ा है.
छोटे और अनौपचारिक व्यापारियों पर सबसे ज्यादा असर
रिजर्व बैंक की इस सख्ती का सबसे बड़ा खामियाजा देश के छोटे, अनौपचारिक और व्यक्तिगत स्तर पर व्यापार चलाने वाले दुकानदारों को भुगतना पड़ रहा है. कई छोटे व्यवसाय ऐसे हैं जिनके पास कॉरपोरेट स्तर के डाक्यूमेंट्स जैसे निगमन दस्तावेज, शेयरहोल्डिंग पैटर्न, टैक्स रिटर्न या आधिकारिक बिजनेस एड्रेस प्रूफ मौजूद नहीं होते. जब उनसे बेनिफिशियल ओनरशिप (वास्तविक मालिकाना हक) जैसे जटिल कागजात मांगे जाते हैं, तो वे भ्रमित हो जाते हैं. पेमेंट सेक्टर के जानकारों का मानना है कि इससे सरकार के वित्तीय समावेशन के अभियान को झटका लग रहा है, क्योंकि सबसे ज्यादा संघर्ष वही व्यापारी कर रहे हैं जो हाल ही में डिजिटल व्यवस्था से जुड़े थे.
पेमेंट कंपनियां बनीं दुकानदारों की गाइड
वर्तमान परिस्थितियों में पेमेंट एग्रीगेटर कंपनियां केवल दस्तावेज जुटाने का काम नहीं कर रही हैं, बल्कि उन्हें दुकानदारों को यह भी समझाना पड़ रहा है कि री-केवाईसी क्यों जरूरी है और इसके लिए कौन-कौन से प्रमाण पत्र चाहिए. अधूरे कागजात को सही कराना, मालिकाना हक के सबूत समझाना और बार-बार फॉलो-अप लेना कंपनियों के लिए एक भारी मशक्कत बन चुका है. गूगल डेवलपर्स और कई अन्य मर्चेंट्स के री-केवाईसी में आ रही दिक्कतों की खबरों ने यह साफ कर दिया है कि अगर समय रहते इस समस्या का व्यावहारिक समाधान नहीं निकला, तो 15 सितंबर के बाद देश के एक बड़े वर्ग का डिजिटल लेनदेन ठप पड़ सकता है.
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
Q1: आरबीआई का नया री-केवाईसी नियम क्या है और इसकी आखिरी तारीख क्या है?
उत्तर: आरबीआई के नए नियमों के तहत सभी पेमेंट एग्रीगेटर्स को अपने पुराने और नए व्यापारियों का पूर्ण सत्यापन (Re-KYC) करना अनिवार्य है. इसके लिए अंतिम समय सीमा 15 सितंबर 2026 तय की गई है.
Q2: यदि 15 सितंबर तक री-केवाईसी पूरा नहीं हुआ तो क्या होगा?
उत्तर: निर्धारित तिथि तक सत्यापन प्रक्रिया पूरी न होने पर संबंधित व्यापारियों का डिजिटल भुगतान कलेक्शन, यूपीआई क्यूआर कोड और ऑनलाइन पेमेंट स्वीकार करने की सुविधा अस्थायी रूप से रोकी (पाउज) जा सकती है.
Q3: छोटे दुकानदारों को री-केवाईसी पूरा कराने में क्या मुख्य दिक्कतें आ रही हैं?
उत्तर: छोटे व्यापारियों के पास औपचारिक बिजनेस डाक्यूमेंट्स, कॉर्पोरेट एड्रेस प्रूफ या टैक्स रिटर्न की कमी होती है. इसके अलावा ऑन-ग्राउंड भौतिक सत्यापन की बाध्यता और जटिल कागजी प्रक्रिया के कारण उन्हें कठिनाई हो रही है.
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