कई चाय बागान बंद हो गये हैं. उसके बाद से ही इस चाय बागान के 300 श्रमिकों को अपना भविष्य अंधकार में नजर आ रहा है. इन लोगों का कहना है कि अगर मारूति चाय बागान भी बंद हो गया, तो वह लोग क्यों करेंगे. उनकी नौकरी तो गई ही, साथ ही अपनी ही जमीन को खाली कर यहां से जाना पड़ेगा. चाय श्रमिकों ने मारूति चाय बागान प्रबंधन पर धोखे से अपनी जमीन हड़पने का भी आरोप लगाया है.
वर्ष 1989 में जब इस बागान की स्थापना की गई थी, तब बागान मालिकों ने श्रमिकों से नौकरी देने के नाम पर जमीन लीज पर देने की बात कही थी. उन्होंने कहा कि तब बागान मालिकों ने यह भी कहा था कि जमीन श्रमिकों के नाम पर ही रहेंगे. हालांकि इस दौरान जमीन देने वाले श्रमिकों से सादे कागज पर हस्ताक्षर करा लिये जाने का भी आरोप उन्होंने लगाया. श्री दे ने आरोप लगाते हुए कहा कि अब श्रमिकों द्वारा दी गई जमीन बागान प्रबंधन ने सरकारी अधिकारियों के साथ सांठगांठ कर अपने नाम करा ली है.
स्वाभाविक रूप से श्रमिकों का अपनी ही जमीन से कब्जा खत्म हो गया है. उन्होंने आगे कहा कि इस बात को लेकर दार्जिलिंग के जिला अधिकारी को भी ज्ञापन दिया गया और जमीन फिर से श्रमिकों के नाम पर करने की मांग की गई. उन्हें सामूहिक हस्ताक्षर वाला ज्ञापन सौंपा गया है. हालांकि जिला अधिकारी ने इस मामले में कोई भी मदद करने से इंकार कर दिया है. उन्होंने धमकी देते हुए कहा कि यदि सरकार श्रमिकों का जमीन वापस करने की पहल नहीं करती, तो वह लोग स्वयं आंदोलन के जरिये जमीन पर कब्जा कर लेंगे. कुछ महीने बाद ही नक्सली नेता चारू मजूमदार की 100वीं जयंती है. उसी दिन सभी श्रमिक चाय बागान द्वारा हड़पी गई जमीन पर धावा बोलेंगे.
