इस प्रो. कंचन शर्मा ने विमर्श, आलोचना और साहित्य के अंत: संबंध को स्पष्ट किया और कहा कि विमर्श का कोई दौर नहीं होता. विमर्श साहित्य की सृजनात्मक चुनौती है.विमर्श सनातन संस्कृति है. विमर्श तत्कालीन होता है.आता है और चला जाता है.
संगोष्ठी को संबोधित करते हुए विभागाध्यक्ष प्रो. अजय कुमार साव ने कहा कि स्त्री, दलित, आदिवासी, महानगर को विमर्श के केंद्र में लिया जाता है. प्रगतिशील-जनवादियों की शिकायत वाजिब है कि विमर्श ही होता है, आंदोलन की कोई संभावना नज़र नहीं आती. इस सत्य से साहित्य के पाठक होने के कारण हमें आंखें चुराना नहीं है, बल्कि इनके बीच साहित्य को ले जाना है. अग्रसेन महाविद्यालय के प्रो. माजिद मियां ने कहा कि प्रतिवर्चस्व की भूमिका में स्थापित स्त्री और दलित के सरोकार के तहत विमर्श को गति प्रदान किये जाने की जरूरत है.सिलीगुड़ी महाविद्यालय के अंग्रेज़ी विभाग के प्रो ओइण्ड्रेला मण्डल ने कहा कि स्त्री विमर्श के तहत स्त्री और दलित स्त्री का विभाजन साहित्य के विमर्श सकारी सरोकार को कमजोर करता है. समग्रता में स्त्री समाज को लिया जाना चाहिए.
उन्होंने कहा कि विमर्श का काम हाशिये को केंद्र में लाना है. इस मौके पर प्रो. गीता देवान ने कहा कि दहेज नहीं होने के कारण नेपाली समाज में स्त्री शोषण नहीं है, बेचारी नहीं है.उन्होंने इसके साथ ही स्त्री स्वतंत्रता को अनिवार्य बताया.संगोष्ठी के अन्य वक्ता देवेन्द्र नाथ शुक्ल ने कहा कि वमर्श विचारों का आदान प्रदान है, निर्णय नहीं. यथार्थ से बिल्कुल अलग, विशेष का अनुभावन का अनुसंधान नहीं हो सकता. प्रो. पूनम सिंह ने स्पष्ट किया कि विमर्श को जीवंत बनाये रखने के लिए सिर्फ़ शोषण के शिकार पर ही विचार करना पर्याप्त नहीं, शिकार के शिकारी रूप पर भी विचार अनिवार्य है.तृतीय वर्ष की छात्रा मनीषा गुप्ता ने इस मौके पर स्त्री-विमर्श के नये आयाम शीर्षक से आलेख पाठ किया. इसके अलावा बागडोगरा कॉलेज की छात्रा ज्योति मण्डल, पूनम चौधरी और सिलीगुड़ी कॉलेज से सोनू शर्मा, ज्योति भट्ट, रिंकू प्रसाद, नमिता प्रसाद, पिंकी प्रसाद, पंकज, मनीष, शिखर पाठक, शालिनी जायसवाल आदि ने भी अपने विचार रखे.
