श्रमिकों के पास भी पैसा खत्म हो गया है. उनके सामने भूखों मरने की स्थिति पैदा हो गयी है. यही वजह है कि कई चाय श्रमिक काम करने के लिए पड़ोसी देश भूटान चले गये हैं. वहां उन्हें नगद में भुगतान किया जाता है. एक तो यहां काम नहीं है, ऊपर से काम करने पर पैसे मिलने की उम्मीद भी नहीं है. ऐसे में भला कौन चाय श्रमिक यहां काम करना चाहेगा. नागराकाटा ब्लॉक स्थित केरन चाय बागान के डिप्टी मैनेजर प्रियव्रत भद्र का कहना है कि वह क्या कर सकते हैं. बैंक में पैसा है, लेकिन श्रमिकों को निकाल कर नहीं दे पा रहे हैं. बैंकों से जो पैसा मिल रहा है, उतने कम में क्या होगा. इसी वजह से श्रमिकों की मजदूरी रोक दी गयी है. श्रमिक भी अब काम के लिए भूटान जाने लगे हैं. श्रमिकों की संख्या कम होने से चाय पत्तियों को तोड़ने का काम प्रभावित हो रहा है. यही स्थिति बनी रही, तो चाय उद्योग को काफी नुकसान होगा. इसी तरह की बातें डीबीआइटीए के सचिव सुमंत गुहा ठाकुराता ने कही है. उन्होंने हालांकि यह भी कहा है कि जिला प्रशासन ने इस समस्या को दूर करने की पहल शुरू की है.
नोटबंदी ने तोड़ी चाय बागानों की कमर, नयी पत्तियां तोड़ने का काम प्रभावित, श्रमिकों के सामने खाने का संकट
जलपाईगुड़ी. केंद्र सरकार की नोटबंदी का सीधा असर डुवार्स के चाय बागानों पर पड़ रहा है. यहां के बागानों में काम कर रहे चाय श्रमिक रोजगार की तलाश में भूटान चले जा रहे हैं. जिससे आनेवाले दिनों में चाय उद्योग को भारी नुकसान होने की संभावना है. यह समस्या सिर्फ बंद अथवा खुले चाय बागानों […]

जलपाईगुड़ी. केंद्र सरकार की नोटबंदी का सीधा असर डुवार्स के चाय बागानों पर पड़ रहा है. यहां के बागानों में काम कर रहे चाय श्रमिक रोजगार की तलाश में भूटान चले जा रहे हैं. जिससे आनेवाले दिनों में चाय उद्योग को भारी नुकसान होने की संभावना है. यह समस्या सिर्फ बंद अथवा खुले चाय बागानों की नहीं है, भारत-भूटान सीमा पर स्थित सभी चाय बागानों में यह समस्या देखी जा रही है. चाय बागानों के पास पैसे हैं, लेकिन वह निकाल नहीं पा रहे हैं, जिसकी वजह से चाय श्रमिकों को मजदूरी नहीं मिल पा रही है. एनयूपीडब्ल्यूयू के बानरहाट ब्लॉक अध्यक्ष मो शमीम तथा पीटीडब्ल्यूयू नेता महेश्वर महली ने कहा है कि 1000 तथा 500 रुपये के पुराने नोट बंद हो जाने की वजह से बागान मालिक श्रमिकों को भुगतान नहीं कर पा रहे हैं.
मजबूरन 30 फीसदी चाय बागान श्रमिक चले गये हैं भूटान
दूसरी तरफ, चाय श्रमिकों की भी स्थिति काफी खराब है. उनके घर में जो भी कुछ पैसे थे, वे खत्म हो गये हैं. उनके सामने अब खाने-पीने का संकट पैदा हो गया है. पेट चलाने के लिए नगद रुपये की जरूरत है. भूटान में काम कर उन्हें नगदी मिल जाती है. करीब 20 से 30 प्रतिशत चाय श्रमिक भूटान चले गये हैं. इस बीच, चाय बागानों में चाय के पौधों में नयी पत्तियां निकलनी शुरू हो गयी है. इन पत्तियों को तोड़ने के लिए श्रमिकों की आवश्यकता है. बाहर से भी पत्ती तोड़ने के लिए श्रमिकों को बुला पाना संभव नहीं है, क्योंकि बागान प्रबंधन के पास मजदूरी देने के लिए नगदी नहीं है. इसकी वजह से चाय पत्ती तोड़ने का काम रुक गया है. एक-दो दिनों में समस्या खत्म नहीं होने पर चाय पत्तियों के खराब होने के आसार हैं.
किन चाय बागानों को नुकसान
भारत-भूटान सीमा पर स्थित नागराकाटा ब्लॉक के केरन, ग्रासमोड़, लुक्सान, धूपगुड़ी ब्लॉक के आमबाड़ी, चामूर्ची, चूनाभट्ठी, काठालगुड़ी, पलासबाड़ी सहित डुवार्स के कई चाय बागानों को नुकसान होने की संभावना है. मुख्य रूप से इन्हीं चाय बागानों के श्रमिक नगदी पाने की आस में काम करने के लिए पड़ोसी देश भूटान जा रहे हैं.