मोहब्बतपुर (कालियाचक). 500 और 1000 के पुराने नोट बंद होने के बाद जाली नोट के धंधे से जुड़े लोगों में बेचैनी फैल गयी है. मालदा जिले के वैष्णवनगर एवं कालियाचक थाना क्षेत्रों में भारत-बांग्लादेश सीमा पर स्थित गांवों में कुछ ऐसी ही तसवीर देखने को मिल रही है. सीमांत इलाके के गांव के स्थानीय लोग अड्डेबाजी और गपशप करते दिन काट रहे हैं. लोगों के बीच यही चरचा है कि क्या मोदी सरकार जाली नोट के धंधे को पूरी तरह बंद कर पायेगी. स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि कुछ समय के लिए शायद यह धंधा बंद हो जायेगा, लेकिन इस पर हमेशा के लिए लगाम लगना असंभव है.
मालदा जिले के इंगलिश बाजार थाने के केष्टोपुर से लेकर वैष्णवनगर थाने के शोभापुर तक 55 किलोमीटर की लंबाई में भारत-बांग्लादेश की सीमा है. इसमें से 50 किलोमीटर की लंबाई में कंटीले तारों की बाड़ लगी है. शोभापुर इलाके में तीन से चार किलोमीटर की दूरी में बाड़ नहीं है. वहां गंगा की एक सहायक नदी और उसका किनारा है. बारिश के समय यह पूरा इलाका जलमग्न रहता है.
सोमवार को कालियाचक थाने की चरिअनंतपुर ग्राम पंचायत के दुइशतदीघी इलाके के हाजीपाड़ा गांव में जाने पर देखा गया कि बीएसएफ के जवान रोज की तरह सीमा पर गश्त लगा रहे हैं. हमें देखकर 24 नंबर बटालियन के एक जवान राजेश राय आगे आये. उन्होंने कहा कि अब कोई टेंशन नहीं है. हमलोग रात में निश्चिंत होकर सो रहे हैं. लेकिन 8 नवंबर से पहले ऐसी स्थिति नहीं थी. हाजीपाड़ा गांव मालदा शहर से 42 किलोमीटर की दूरी पर है. यहां बाड़ के उस पार 155 भारतीय बस्तियां हैं, जो जाली नोट तस्करी का एक बड़ा ठिकाना है. उस पार के जाली नोट कारोबारी बाड़ पार कराकर नोट इस पार फेंक देते हैं. इधर के कारोबारी उन नोटों को उठा लेते हैं. 8 नवंबर से पहले ऐसा ही चलता था.
उस पार बांग्लादेश के नबावगंज जिले के शिवगंज थाने के बिनोदपुर ग्राम पंचायत का जामिनपुर गांव है. सीमा से लगी सड़क के किनारे मुकुलेश्वर रहमान का घर है. पेशे से ट्रक चालक रहमान ने बताया कि इलाके में अभी शांति का माहौल है. जाली नोट के तस्कर नजर नहीं आ रहे हैं. चरिअनंतपुर ग्राम पंचायत का एक और गांव है मोहब्बतपुर. इस गांव में जाली नोट तस्करी का बड़ा अड्डा था. गांव के 50 से ज्यादा लोग जाली नोट के मामलों में देश की विभिन्न जेलों में बंद हैं. गांव के एक 22 वर्षीय युवक दुरूल शेख ने हमसे बातचीत की. वह रामपुर हाट कॉलेज में कला विभाग में तृतीय वर्ष का छात्र है और छुट्टी में घर आया हुआ है. दुरूल ने कहा कि यहां लोगों के पास कोई काम नहीं है. खेती की जमीन कंटीले तार के बाड़ के उस पार है. इसकी वजह से खेती कर पाना संभव नहीं हो पाता. इसलिए गांव के बहुत से लोग तस्करी के गैर कानूनी धंधे से जुड़ गये हैं. 500 और 1000 का नोट बंद होने से गांव के लोगों की मुसीबत और बढ़ गयी है. ग्रामीण अब किसी दूसरे रोजगार की खोज में बेचैन हैं.
हमारी मुलाकात बाजार करके बाइक से लौट रहे मोहब्बतपुर के 35 वर्षीय जामिल शेख से हुई. वह बाइक पर कई तरह की सब्जियां लादे हुए थे. बातचीत के दौरान उन्होंने 500 का एक नोट जेब से निकाल कर दिखाते हुए कहा कि इसे कोई ले नहीं रहा है. बाजार से मुझे उधार सब्जी खरीदनी पड़ी है. ऐसा कब तक चलेगा. पेशे के बारे में पूछे जाने पर बिना कोई जवाब दिये जामिल ने मोटरसाइकिल आगे बढ़ा दी. तभी कुछ स्थानीय ग्रामीणों ने बताया कि ये सब जाली नोट के धंधे से जुड़े लोग थे. अब हाल यह हो गया है कि जाली नोट के कारोबारियों से कोई असली नोट तक नहीं ले रहा है. सीमावर्ती गांवों में नोटबंदी का व्यापक प्रभाव पड़ा है. बाजार सूने हैं. खरीद-बिक्री लगभग बंद है. मोदीखाना चलाने वाले एक दुकानदार अश्विनी सिंह (45) ने बताया कि हर रोज वह 900 से 1200 रुपये का काम करते थे. अभी उनकी बिक्री 100 से 200 रुपये रह गयी है. ज्यादातर बिक्री उधार हो रही है.
एक कपड़ा दुकानदार ताजमुल हक ने कहा कि आज एक ग्राहक 500 रुपये लेकर लूंगी खरीदने आया था. मुझे उसे लौटा देना पड़ा, क्योंकि मेरे पास खुदरा पैसा नहीं है. कुछ दिन पहले तक रोज डेढ़ से दो हजार रुपये तक की बिक्री होती थी. लेकिन अभी काम पूरी तरह ठप है. लोगों के हाथ में पैसा नहीं है, ऐसे में वह खरीददारी कैसे करेंगे. सीमांत इलाके में रहने वाले लोगों से कोई असली नोट भी लेना नहीं चाह रहा. लोगों की जेबों में 500 और 1000 के नोट पड़े हैं, फिर भी वह असहाय स्थिति में हैं. गांव में कोई बैंक भी नहीं है. चार किलोमीटर दूर गोपालगंज में इलाहाबाद बैंक है, जहां रद्द हुए नोटों को जमा कराने के लिए महिला-पुरुषों की भीड़ लगी हुई है.
इलाके में एक जाली नोट का कारोबारी है, जिसे लोग सिन्टू डीलर कहते हैं. एनआइए उससे कई बार पूछताछ कर चुकी है. काफी तलाश के बाद हमारी मुलाकात सिन्टू से हुई. उसका घर मोहब्बतपुर गांव में है. 55 वर्षीय सिन्टू डीलर के चेहरे पर चिंता साफ दिखायी दे रही थी. हालांकि उसने हमसे कहा कि अब यहां जाली नोट का धंधा नहीं होता. जाली नोट का कारोबार पास के दूसरे गांव में होता है. हमारे गांव के पुरुष दूसरे राज्यों में जाकर मजदूरी करते हैं. सिन्टू का एक बेटा जादवपुर के केपीएस मेडिकल कॉलेज में तृतीय वर्ष का छात्र है और एक बेटी गांव में एक स्कूल में 11वीं पढ़ती है. यह पूछने पर कि बेटा-बेटी की पढ़ाई का खर्च कैसे जुगाड़ होता है, इस बारे में उन्होंने कहा कि बीएसएफ जो माल पकड़ता है, वह उसकी खरीद-बिक्री करते हैं. इसके अलावा उनके पास सात बीघा जमीन है, जिसमें धान, गेहूं और पाट होता है. इसी से उनका घर खर्च चलता है. उनका एक तल्ला पक्का मकान दो हजार वर्गफुट में बना हुआ है. वह बीते 25 सालों से राजनीति से भी जुड़े हैं. पहले सीपीएम करते थे और अब तृणमूल के इलाके के प्रभावशाली नेता हैं. उन्होंने कहा कि नोट बंद होने से लोगों को काफी असुविधा हो रही है. ऐसे में बेरोजगार युवक क्या करेंगे, उनके घरों में तो अंधेरा हो गया है.
चरिअनंतपुर ग्राम पंचायत की तृणमूल कांग्रेस प्रधान मसूदा बीबी ने कहा कि यह गांव बहुत बदनाम है. पूरे इलाके की छवि जाली नोट के धंधे से जुड़ गयी है. बड़े नोट बंद होने से जाली नोट के कारोबारी अभी अंडरग्राउंड हो गये हैं. लेकिन आखिर कब तक. यहां के लोगों को वैकल्पिक रोजगार चाहिए. यहां के ज्यादातर लोग काम की तलाश में दूसरे राज्यों में जाने को मजबूर हैं. कालियाचक और वैष्णवनगर थाना इलाके में आधे से ज्यादा पुरुष दूसरे राज्यों में काम करते हैं. नोट बंद होने से इन लोगों का काम भी प्रभावित हुआ है. लोग वापस लौटने को मजबूर हो रहे हैं. कंस्ट्रक्शन और अन्य उद्योगों में काम-काज ठप होने से लोगों को रोजगार नहीं मिल रहा है.
