गोरखालैंड के लिए कल से सिलीगुड़ी में आंदोलन शुरू

आंदोलन के संविधान के दायरे में रहने की बात कही सिलीगुड़ी. पहले गोरखा लिबरेशन फ्रंट (जीएनएलएफ), फिर गोरखा जन मुक्ति मोर्चा (गोजमुमो), और अब गोरखा जन कल्याण मंच ने अलग गोरखालैंड राज्य के लिए आंदोलन में उतरने का एलान कर दिया है. इसी मंगलवार से मंच का आंदोलन सिलीगुड़ी से प्रारंभ होगा. यह जानकारी मंच […]

आंदोलन के संविधान के दायरे में रहने की बात कही
सिलीगुड़ी. पहले गोरखा लिबरेशन फ्रंट (जीएनएलएफ), फिर गोरखा जन मुक्ति मोर्चा (गोजमुमो), और अब गोरखा जन कल्याण मंच ने अलग गोरखालैंड राज्य के लिए आंदोलन में उतरने का एलान कर दिया है. इसी मंगलवार से मंच का आंदोलन सिलीगुड़ी से प्रारंभ होगा. यह जानकारी मंच के प्रमुख कृष्णा छेत्री ने रविवार को सिलीगुड़ी जर्नलिस्ट क्लब में प्रेस कांफ्रेंस करके दी.
पत्रकारों को संबोधित करते हुए श्री छेत्री ने कहा कि जीएनएलएफ और गोजमुमो के आंदोलन से नागरिकों का विश्वास उठ चुका है. जीएनएलएफ अब समाप्ति की ओर है और गोजमुमो प्रमुख विमल गुरूंग विफल नेता साबित हो चुके हैं. श्री छेत्री ने कहा कि उनके आंदोलन में काफी कुछ नया होगा, लेकिन आंदोलन की सभी गतिविधियां भारतीय संविधान के दायरे में ही होंगी. किसी भी प्रकार का कोई हिंसक रुख अख्तियार नहीं किया जायेगा.
उन्होंने कहा कि गोरखालैंड की मांग एक संवैधानिक और सवा करोड़ गोरखाओं की पहचान की लड़ाई है.गोरखा जन कल्याण मंच अभी बस सवा महीने पुरानी पार्टी है. गत 5 अक्तूबर को ही इसका गठन हुआ है. एक राजनीतिक पार्टी के रूप में इसे मान्यता भी प्राप्त नहीं हुई है. हांलाकि रजिस्ट्रेशन के लिए इन लोगों ने आवेदन भेजा है. पहाड़ पर पार्टियां बदलती रहती हैं, लेकिन गोरखालैंड की मांग जस की तस रहती है. गोरखालैंड की मांग को लेकर वर्ष 1986 में जीएनएलएफ का बड़ा आंदोलन हुआ था. तत्कालीन माकपा सरकार ने पहाड़ के विकास की जिम्मेदारी जीएनएलएफ प्रमुख स्वर्गीय सुभाष घीसिंग को सौंप कर आंदोलन को दबा दिया. हांलाकि पार्टी में इसका काफी विरोध भी हुआ.
जीएनएलएफ के क्रियाकलाप से नाराज होकर एक गुट अलग हो गया. बाद में वह गोजमुमो के रूप में सामने आया. विमल गुरूंग के गुरूंग के नेतृत्व में गोजमुमो ने एक बार फिर जोरदार आंदोलन शुरू किया. कई बार इनका हिंसक रुख भी सामने आया. वर्ष 2007 में गोजमुमो के आंदोलन ने उत्तर बंगाल को थर्रा दिया था. लेकिन तृममूल सरकार ने पहाड़ के विकास के लिए जीटीए का गठन कर विमल गुरूंग को उसका चेयरमैन बना दिया.
इसके बाद यह आंदोलन ठंडा पड़ गया. गोजमुमो को केंद्र की भाजपा सरकार का साथ मिलने के बाद अब वह फिर गोरखालैंड के लिए ताल ठोंक रहा है. इस बीच गोजमुमो से अलग होकर डॉ हर्क बहादुर छेत्री ने जन आंदोलन पार्टी (जाप) बना ली है. विरोधियों का आरोप है कि जाप तृणमूल कांग्रेस की ही ‘बी’ पार्टी है. पहाड़ की कई पार्टियां छठवीं अनुसूची लागू करने की भी मांग कर रही हैं.

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