अपनों के साथ ‘अपना घर’ ने भी वृद्ध दंपती से मुंह मोड़ा
सिलीगुड़ी. घर से निकाले गये वृद्धों को वृद्धाश्रम “अपना घर” ने भी अपनाने से इंकार कर दिया. दोनों वृद्ध दंपती बीमार है. इसकी वजह से बेटे-बहू ने घर से निकाल कर सड़क पर बेहाल छोड़ दिया. दोनों को वृद्धाश्रम अपना घर ले जाया गया.वहां भी दोनों को शरण देने में आनाकानी की जाने लगी. काफी […]
सिलीगुड़ी. घर से निकाले गये वृद्धों को वृद्धाश्रम “अपना घर” ने भी अपनाने से इंकार कर दिया. दोनों वृद्ध दंपती बीमार है. इसकी वजह से बेटे-बहू ने घर से निकाल कर सड़क पर बेहाल छोड़ दिया. दोनों को वृद्धाश्रम अपना घर ले जाया गया.वहां भी दोनों को शरण देने में आनाकानी की जाने लगी. काफी दबाव के बाद अपना घर ने दोनों को उत्तर बंगाल मेडिकल कॉलेज व अस्पताल में भरती कराने का निर्णय लिया है.
उल्लेखनीय है कि सिलीगुड़ी टाउन स्टेशन में पड़े इस वृद्ध दंपती पर स्थानीय वार्ड पार्षद निखिल सहनी की नजर पड़ी. स्थानीय लोगों से सलाह-मश्वरा कर गुरूवार को निखिल सहनी ने उन्हें उठाकर सिलीगुड़ी के निकट कावाखाली स्थित अपना घर वृद्धाश्रम ले गए. अपना घर प्रबंधन ने इनको आश्रम में शरण ना देकर उत्तर बंगाल मेडिकल कॉलेज में भरती कराने का निर्णय किया है. इस दंपती की कहानी बड़ी ही दर्दनाक है. इस दंपती का नाम रमणी मजुमदार और कनक मजुमदार है.
रमणी की उम्र सौ वर्ष से ज्यादा है. जबकि कनक भी 80 से अधिक साल की हो चुकी है. यह दोनों हाथियाडांगा इलाके के निवासी हैं. आज से करीब साठ वर्ष पहले इन दोनों का विवाह हुआ था. इन दोनों का एक बेटा और तीन बेटियां हैं. जीवन के अंतिम पड़ाव में चार संतानों में से कोइ भी अपने यहां इनको रखने के लिए तैयार नहीं है. इनकी कहानी काफी हद तक फिल्म बागवान से मिलती है.
इस दंपती से बात करने पर पता चला कि पुत्र निर्मल मजुमदार और उसकी पत्नी अंजली काफी परेशान करती है. निर्मल और अंजली का एक बेटा भी है विधान मजुमदार. विधान भी शादीशुदा है. हाथियाडांगा इलाके में इनकी पांच कट्ठा जमीन थी. जिसमें बने मकान में सभी एक साथ रहते थे. घर पर ही एक मोदीखाना दुकान से परिवार का भरण-पोषण होता आया. उम्र के साथ उनकी बीमारी बढ़ने लगी. दोनों ही शारीरिक रूप से काफी कमजोर हो चुके हैं. जिसकी वजह से वे स्वयं अपने पैरों पर खड़े नहीं हो पाते है. ऐसी स्थिति में इन दोनों की देखरेख की जिम्मेदारी बेटे और बहू की होती है. लेकिन सिर्फ इन दोनों की सेवा करने को लेकर ही आये दिन घर में झगड़ा होने लगा. इसबीच, करीब एक माह पहले रमणी की हालत काफी ज्यादा खराब हो गयी.
फिर निर्मल ने अपने पिता रमणी और मां कनक को लाकर सिलीगुड़ी जिला अस्पताल में भरती करा दिया. इसके बाद बीच में एक दिन पोता विधान मजुमदार अपनी पत्नी के साथ इनसे मिलने अस्पताल आया. उसके बाद पूरा परिवार इन्हें भूल गया. रमणी दमा के मरीज हैं. सांस लेने में उन्हें इतनी दिक्कत है कि वे बोलने में भी असमर्थ हैं. पूरे 24 दिन अस्पताल में भरती रहने के बाद चिकित्सकों ने इन दोनों को छुट्टी दे दी. परिवार के लोग इन्हें लेने नहीं पहुंचे. अपने हाथों से बनाये आशियाने को खोकर दोनों पिछले तीन दिनों से सिलीगुड़ी टाउन स्टेशन पर समय काट रहे थे. बीते बुधवार की रात सिलीगुड़ी नगर निगम के 18 नंबर वार्ड पार्षद निखिल सहनी की नजर इनपर पड़ी. उनकी गाथा सुनने के बाद निखिल सहनी ने गुरूवार की सुबह इन्हें निगम के एंबुलेंस में कावाखाली स्थित अपना घर वृद्धाश्रम ले गये. वहां कोइ इनको रखने को तैयार नहीं हुआ. वृद्धाश्रम प्रबंधन का कहना था कि रमणी स्वयं खड़े भी नहीं हो सकते. कनक की शारीरिक अवस्था भी ठीक नहीं है. इन्हें रखने के लिये वृद्धाश्रम के पास उचित व्यवस्था नहीं है. वार्ड पार्षद के साथ घंटो विचार-विमर्श के बाद वृद्धाश्रम प्रबंधन ने दंपती को उत्तर बंगाल मेडिकल कॉलेज व अस्पताल में भरती कराने का निर्णय किया.
अपना घर के मास्टरजी ने बताया कि रमणी काफी कमजोर है और दमा के मरीज हैं. इन्हें इलाज के लिये उत्तर बंगाल मेडिकल कॉलेज व अस्पताल में भर्ती कराया जायेगा. उनका इलाज होने तक कनक भी उनके साथ मेडिकल कॉलेज में ही रहेगी. रमणी के इलाज होने तक कनक के खाने-पीने की पूरी व्यवस्था वृद्धाश्रम की ओर से की जायेगी. रमणी के ठीक होने के बाद उन्हें वापस यहां लाया जायेगा.इसबीच, आश्रम सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार उत्तर बंगाल मेडिकल कॉलेज से छुट्टी मिलने के बाद दंपती को उनके परिवार वालों के पास भेजने की तैयारी की जा रही है.