बंद में भी घर से निकलीं ‘कबूतर मां’

दार्जिलिंग. गोरखा जनमुक्ति मोरचा (गोजमुमो)के पहाड़ बंद के दौरान भले ही सभी गतिविधि रूक गयी हो,लेकिन ‘कबूतर मां’ के रोजमर्रा पर इसका कोइ असर नहीं पड़ा. वह बुधवार को भी आम दिनों की तरह घर से निकलीं और शहर के माल मे कबूतरों को दाना खिलाया. वर्ष 2013 में मोरचा द्वारा लगातार 34 दिनों के […]

दार्जिलिंग. गोरखा जनमुक्ति मोरचा (गोजमुमो)के पहाड़ बंद के दौरान भले ही सभी गतिविधि रूक गयी हो,लेकिन ‘कबूतर मां’ के रोजमर्रा पर इसका कोइ असर नहीं पड़ा. वह बुधवार को भी आम दिनों की तरह घर से निकलीं और शहर के माल मे कबूतरों को दाना खिलाया. वर्ष 2013 में मोरचा द्वारा लगातार 34 दिनों के बंद के दौरान भी वह एक दिन भी कबूतरों को दाना खिलाये बगैर नहीं रहीं थी. आज भी बंद की उपेक्षा कर कबूतर मां ने सैकड़ों कबूतरों को दाना खिलाया.

बंद के दिन दार्जिलिंग के बतासिया लूप से लेकर टाईगर हिल तक ना तो पर्यटक और ना ही आमलोग बाहर निकले,लेकिन 86 वर्षीय यह महिला मावा सामता रोज की तरह अपने घर से निकली और सीधे कबूतरों को दाना खिलाने चली गयी. उन्हें स्वयं एक समय भूखे रहना मंजूर है लेकिन कबूतरों को दाना खिलाना कभी नहीं भूलती. पहाड़ वासियों के लिये मावा सामता ‘कबूतर मां’ के रूप ही परिचित है.


जाड़ा हो या गरमी रोज सुबह पांच बजे कबूतर मां हाथ में एक झोला लेकर निकल पड़ती है. चौरस्ता के निकट माल के बीच खड़ी होकर कबूतरों को दाना खिलाती हैं. इनके तू-तू की आवाज सुनते ही पलक झपकते ही सैकड़ो कबूतर माल पहुंच जाते हैं. फिर अपनी झोली से गेंहू, मटर आदि निकाल कर ये अपने हाथों से कबूतरों को खिलाती हैं.

कबूतर मां प्रतिदिन करीब 15 मिनट में दो से तीन किलो अनाज इन कबूतरों को खिलाती है. कबूतरों को दाना खिलाने के बाद माल रोड का एक चक्कर लगाकर राजभवन होते हुए न्यू महाकाल मार्केट के निकट भ्यू प्वाइंट पर भी कबूतरों दाना देती हैं. उसके बाद यहां से अपने घर लौट जाती हैं. माल रोड के नीचे बसी बस्ती में कबूतर मां रहती है.

कपड़े बेचने का है काम ः कबूतरों का पेट भरने के बाद पह अपने रोजगार पर निकलती है. घर से गर्म शाल, स्वेटर, चादर आदि पीठ पर लादकर वह बतासिया लूप पहंचती है. यहां दोपहर तक अपने सामानों की बिक्री करती हैं. शाम ढलने से पहले फिर दाना की झोली लेकर लूप और भ्यू प्वाईंट पर कबूतरों को दाना खिलाती हैं.
सेना से रिटायर पति बीमार
घर में 91 वर्षीय पति कसल लामा के अलावा कोई नहीं है. पति भी बीमार होकर बिस्तर पर है. बस्ती में इनका अपना एक झोपड़ा है. वर्ष 1959 में तिब्बत आंदोलन के समय ये दोनों दार्जिलिंग आकर बस गये. इनका पति कसल लामा भारतीय सेना से अवकाश प्राप्त कर चुके हैं. 1971 में पाकिस्तान के हुयी लड़ाई में भारतीय सेना में कसल लामा भी शामिल थे. नौकरी से अवकाश मिलने के बाद मिली सारी इलाज में खर्च हो गया.
34 दिनों के बंद में भी कबूतरों को दिया दाना ः इनके पड़ोसी सूर्या गुरूंग ने बताया कि 2013 के जुलाई-अगस्त महीने में मोरचा ने 34 दिन का बंद था. इस बंद में खाद्य संकट की आशंका पर कबूतर मां ने पहले से ही कबूतरों के लिये अपने घर में करीब दो महीने का दाना जमा कर लिया था. उन दिनों स्वयं एक समय भूखा रहकर भी इन्होंने कबूतरों को सुबह-शाम दाना खिलाया था.
पहले से कर ली थी तैयारी
मावा सामता स्वंय ही कहती है कि मनुष्य सिर्फ अपनी ही फिक्र करता है. इन निरीह कबूतरों के बारे में कौन सोचता है. इन्हें खिलाने से आत्मा को शांति मिलती है. स्वार्थी इस दुनिया में मेरे एक दिन नहीं आने से ये कबूतर भूखे ही रह जायेंगे.बुधवार मोरचा द्वारा बुलाये एक दिन के बंद को सफल बनाने के लिये मोर्चा समर्थक जब सुबह अपनी तैयारी कर रहे थे. दूसरी तरफ जहां आदिवासी विकास मंत्री जेम्स कुजूर, पर्यटन मंत्री गौतम देव और उत्तर बंगाल विकास मंत्री रवींद्रनाथ घोष जनजीवन को स्वाभाविक करने के लिये सड़क पर उतर रह थे. उसी समय पर्यटक शून्य इलाके से झोला हाथ में लेकर कबूतर मां को देखा गया. ये रोजाना की तरह माल और भ्यू प्वाइंट पर कबूतरों को दाना खिलाकर वापस अपने घर लौट गयी. ब??ंद के दिन कबूतरों को दाना खिलाने के संबंध में उनसे बात करने पर उन्होंने कहा कि बंद की घोषणा सुनकर ही मंगलवार को पांच किलो गेहू, चना, मटर आदि उन्होंने खरीद रखा था. मनुषय तो हड़ताल में भी अपने पेट भर लेगें लेकिन इन कबूतरों का क्या. इसलिये हड़ताल में भी इन्हें दाना खिलाना जरूरी है.

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