पहाड़ पर 1986-88 में सुभाष घिसिंग की अगुवायी जब गोरखालैंड आंदोलन हुआ उस समय भी वाम सरकार ने आंदोलन को जबरन दबाने की कोशिश की थी और बाद में आंदोलन ने हिंसक रूप धारन कर लिया. श्री मजुमदार ने कहा कि गोरखालैंड की आवाज को दबाने के लिए मुख्यमंत्री जो रणनीति चला रही है इससे आंदोलन शांत होने के बजाये और उग्र होने की ओर इंगित कर रहा है. उन्होंने दीदी पर पहाड़ को जातियों में भी तोड़ने का आरोप लगाया. उनका कहना है कि ममता पहाड़ पर जातिगत राजनीति के मारफत गोरखाओं को आपस में लड़ाने की साजिश रच रही है.
उन्होंने दीदी से आंदोलनकारियों से टकराने के बजाये तुरंत सर्वदलीय बैठक बुलाने की गुहार लगायी है और पहाड़ की राजनैकित समस्या को आपस में बातचीत के जरिये जल्द सुलझाने की अपील की है. श्री मजुमदार का कहना है कि शांत पहाड़ के बार-बार गरम होने से यहां सबसे महत्त्वपूर्ण पेशा पर्यटन उद्योग भी प्रभावित होता है. दहशत की वजह से देसी-विदेशी सैलानी आने से भी कतराने लगते हैं.
श्री मजुमदार ने गोरखालैंड की समस्या को लेकर केंद्र सरकार से भी हस्तक्षेप की मांग की. वजह गोरखालैंड के विकल्प के तौर पर पहाड़ पर गोरखा टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन (जीटीए) समझौता राज्य, केंद्र सरकार और गोजमुमो के बीच हुआ है. ऐसे में केंद्र सरकार खामोश नहीं रह सकती.
