विभिन्न सामाजिक संगठन हुए एकजुट
सरकारी अस्पतालों में अंग संरक्षण व्यवस्था की मांग
सिलीगुड़ी : कहते हैं कि अंगदान महादान होता है. जिस व्यक्ति ने भी मरने के बाद अपने अंगदान की घोषणा कर रखी है, उनके अंग से कई लोगों की जिंदगी बचायी जा सकती है. हालांकि कुछ लोग ही अंगदान का संकल्प लेते हैं.लेकिन समस्या यह है कि अगर बड़े पैमाने पर अंगदान शुरू हो जाये, तो मानव शरीर के विभिन्न महत्वपूर्ण अंगों को सुरक्षित रखने के लिए आवश्यक ढांचागत सुविधा सिलीगुड़ी के किसी भी सरकारी अस्पताल में नहीं है.
कहने को तो सिलीगुड़ी में उत्तर बंगाल मेडिकल कॉलेज भी है, लेकिन यहां भी मानव अंगों को रखने की कोई व्यवस्था नहीं है. अगर कोई व्यक्ति अपना देहदान करता है, तो मृत्यु के बाद उसके शरीर को उत्तर बंगाल मेडिकल कॉलेज के हवाले कर दिया जाता है. हालांकि उस शरीर से केवल डॉक्टरी के पढ़ाई करने वाले बच्चे ही लाभान्वित होते हैं.मानव अंगों को जरूरतमंद रोगियों में प्रत्यारोपित करने के लिए यहां कोई पहल नहीं की जाती है.
विभिन्न स्वयंसेवी संगठनों द्वारा मिली जानकारी के अनुसार, सिलीगुड़ी तथा इसके आसपास के इलाकों में ऐसे काफी लोग हैं, जो अपनी मौत के बाद मानव कल्याण के लिए अपना देहदान करना चाहते हैं. लेकिन इन लोगों को प्रक्रिया का पता नहीं होता है. कई लोग सरकारी अस्पतालों से इसके लिए संपर्क साधते हैं तो वहां से कोई सकारात्मक संकेत और सहयोग नहीं मिलता है.
सिलीगुड़ी के प्रमुख समाजसेवी तथा स्वास्थ्य कार्यकर्ता सोमनाथ चटर्जी, विज्ञान मंच, सृजन सेना, वेस्ट बंगाल वोलंटियरी ब्लड डोनर फोरम के साथ मिलकर मृत्यु के बाद अंगदान तथा देहदान को लेकर इन दिनों जागरूकता फैलाने में लगे हुए हैं.
श्री चटर्जी ने कहा है कि मौत के बाद मानव शरीर को जलाकर नष्ट करने से कोई लाभ नहीं है. मरने के बाद भी मानव शरीर कई लोगों की जान बचा सकता है. दो आंखों की बदौलत दो नेत्रहीनों को रोशनी मिल सकती है. इसके अलावा किडनी, पेनक्रियाज, लिवर, हार्ट आदि की बदौलत जरूरतमंद रोगियों की जान बचायी जा सकती है.
हार्ट फेल, किडनी फेल आदि जैसी बीमारियों से हर वर्ष ही भारत जैसे देश में हजारों रोगियों की मौत हो जाती है. यदि अंगदान तथा देहदान की परंपरा बढ़ जाये, तो ऐसे रोगियों की जान बचायी जा सकती है.
श्री चटर्जी ने इस बात पर आश्चर्य व्यक्त किया कि सिलीगुड़ी के किसी भी सरकारी अस्पताल में या मेडिकल कॉलेज में मानव अंगों को सुरिक्षत रखने की कोई ढांचागत सुविधा नहीं है. उन्होंने कहा कि सिलीगुड़ी के एक गैर सरकारी संगठन लायंस नेत्रालय द्वारा आंखों को संरक्षित करने की व्यवस्था है. यदि कोई व्यक्ति मरने के बाद देहदान करता भी है, तो उसके शरीर तथा अंगों को रखने की समस्या उत्पन्न होगी. उन्होंने राज्य सरकार से सरकारी अस्पतालों में मानव अंगों को संरक्षित रखने के लिए आवश्यक ढांचागत सुविधा विकसित करने की मांग की.
मानव अंगों की तस्करी पर लगेगी रोक : श्री चटर्जी ने आगे कहा कि देहदान तथा अंगदान को लेकर जागरूकता की कमी की वजह से ही देश में मानव अंगों के तस्कर सक्रिय हैं.
बड़े पैमाने पर किडनी आदि की तस्करी की जाती है. धोखे से मानव अंगों के तस्कर गरीब लोगों को कुछ पैसे का लालच देकर उनकी किडनी निकाल लेते हैं. पूरे देश में किडनी रैकेट सक्रिय है. उन्होंने कहा कि देश में इतनी बड़ी आबादी है और हर दिन ही लाखों लोगों का जन्म होता है तो लाखों लोग मरते भी हैं. मरने वाले तीस प्रतिशत लोग भी यदि देहदान कर जायें तो हजारों रोगियों की मौत रोकी जा सकती है.
हुकुमचंद सिंह ने किया देहदान: सिलीगुड़ी के स्टेशन फीडर रोड के रहने वाले 66 वर्षीय हुकुमचंद सिंह ने अपनी मृत्यु के बाद अपना देहदान कर दिया है. उन्होंने आज इस आशय के एक प्रपत्र पर हस्ताक्षर किया.
इस अवसर पर सोमनाथ चटर्जी के अलावा अन्य सामाजिक संगठनों के लोग भी उपस्थित थे. सोमनाथ चटर्जी ने हुकुमचंद सिंह के इस पहल की सराहना की. उन्होंने आगे कहा कि दो दिनों पहले ही प्रख्यात टेबल टेनिस कोच भारती घोष भी मृत्यु के बाद अपने देहदान की घोषणा कर चुकी हैं.
