सिलीगुड़ी : मानव उत्थान सेवा समिति के तत्वावधान में दो दिवसीय सद्भावना सम्मेलन के दूसरे दिन हजारों भक्तों को संबोधित करते हुए सद्गुरू सतपालजी महाराज ने कहा कि राष्ट्र के निर्माण में सब को अपना-अपना योगदान देना है. इसके लिए जरूरी है कि हम अपनी आत्मशक्ति को जगायें.
इसी आत्मज्ञान की विद्या राजविद्या कहलाती है. जिसका ज्ञान भगवान राम ने हनुमान को और श्री कृष्ण ने अर्जुन को दिया था. हमें भी इस विद्या को जानने के लिए तत्वदर्शी सद्गुरू के पास जाना होगा. जो हमें भगवान के पावन नाम और रूप का तत्व बोध करा सके.
उन्होंने कहा कि गुरु सूर्य के समान होते हैं जो हमारे मन के अज्ञान रूपी अन्धकार को आत्मज्ञान रूपी प्रकाश से प्रकाशित कर देते हैं. उन्होंने कहा कि आज हम बाहरी विद्या तो पढ़ लिये, पर अपने आप को नहीं पढ़ा. हमारा देश अनादि काल से ही आत्मविद्या से पूरे विश्व को ज्ञान का मार्ग प्रशस्त करता आया है.
आज लोग इस अध्यात्म से दूर हो चुके हैं जिसके कारण समाज में तरह-तरह के अनैतिक कर्म हो रहे हैं . धर्म के मूल आधार को न जानने के कारण लोग विभिन्न कर्मकाण्ड में लग कर अपनी बुद्धि के अनुसार अपना-अपना अलग धर्म और पंथ मान बैठे हैं, जबकि सबको चलाने वाली शक्ति एक है.
सतपालजी महाराज ने कहा कि धर्म वही है जो हमारे समाज को जोड़े, तोड़े नहीं. आत्मज्ञान ही धर्म का आधार है. जिसपर भक्ति की बुनियाद मजबूत रहती है.
जो मनुष्य सद्गुरू के शरणागत होकर धर्म को अपने हृदय में धारण कर चुका है वह कभी समाज और राष्ट्र को तोड़ने वाला कर्म नहीं कर सकता. वहीं सद्भावना सम्मेलन को संबोधित करते हुए पूज्य माता श्री अमृताजी ने भक्तों को जीवन भर गुरू महाराज के बताये हुए ज्ञान-मार्ग पर चलने की सलाह दी.
इसके पश्चात भजन कलाकार एवं छोटे-छोटे बच्चों ने भजन, नृत्य और नाटक प्रस्तुत कर भक्तों को आनंद विभोर कर किया. हरिद्वार से आये पूज्य महात्मा श्री हरिसंतोषानंदजी ने अपने प्रवचन में लोगों को भजन ध्यान के माध्यम से मनुष्य जीवन को सफल बनाने की प्रेरणा दी. सद्भावना सम्मेलन के आखिरी दिन भक्तों की दोगुनी भीड़ नजर आयी.
