गरीब वृद्ध-वृद्धाओं को सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं, भिक्षाटन एकमात्र सहारा
कालियागंज : हर पांच साल पर चुनाव होते हैं जब राजनीतिक दल के नेता और मंत्री विकास के बड़े-बड़े दावे करते हैं. विरोधी दल के नेता भी जनता को आश्वासन देकर तरह-तरह के सपने दिखाते हैं. इसके बावजूद ग्रामीण इलाकों की तस्वीर आज भी नहीं बदली है. वहां के गरीब और भी गरीब होते जा रहे हैं.
सबसे ज्यादा संकट 60 पार के बुजुर्गों को झेलना पड़ रहा है. संतान की उपेक्षा और समाज के उपहास का पात्र बने ये लोग भिक्षावृत्ति के जरिये गुजारा करने पर मजबूर हैं. इनके लिए आज भी सरकारी योजनाओं के घर, शौचालय, वृद्ध-भत्ता, विधवा भत्ता और दिव्यांग भत्ता सपने की तरह है. देखा जा रहा है कि जिन गरीबों और असहाय लोगों के लिए ये योजनाएं बनी हैं उन तक ये सुविधा पहुंच ही नहीं रही है, बल्कि योजनाओं का लाभ पहले से ही साधन-संपन्न लोगों को ही मिल रहा है. अगर ऐसा न होता तो गांव-देहातों में भिखारियों की तादाद लगातार बढ़ नहीं होती.
उत्तर दिनाजपुर जिले का एक छोटा शहर है कालियागंज. यहां प्रत्येक गुरुवार और मंगलवार की सुबह 11 बजे से पूरे दिन 10 से 12 भिखारियों का समूह टोली बनाकर हाट-बाजारों की तरफ निकल जाते हैं. इन टोलियों में 10 से 12 भिखारी होते हैं जिनकी उम्र 60 से लेकर 75 वर्ष तक होती है. दुकानदार भी पहले से तैयार रहते हैं.
इनके पास एक रुपये के सिक्कों की पोटली होती है जहां से वे प्रत्येक भिखारी को एक-एक सिक्का देते जाते हैं. उस एक रुपये से ही ये भिखारी संतुष्ट हो जाते हैं. इन भिखारियों से बात करके देखा गया कि ये हमारे ही देश के नागरिक हैं, लेकिन ये हर तरह की सुविधाओं से वंचित हैं. अनंतपुर गांव की निवासी भगवती बाला, राधिकापुर गांव के अनंत सरकार, बोचाडांगा गांव के भेलसू देवशर्मा, बरुणा गांव के विनय राय का जैसे जन्म ही हुआ है भिख मांगने के लिए.
इन्हें आज तक कोई भी सरकारी सुविधा नहीं मिली है. ग्राम पंचायतों में जाने पर इनकी व्यथा सुनने के लिए जनप्रतिनिधियों के पास समय नहीं होता. वहीं कर्मचारियों का कहना है कि भिखारियों को सरकारी योजना से क्या वास्ता. यह है हमारे देश के गांवों की असली तस्वीर, जहां चुनाव के मौके पर हर रोज गरीबों, बेरोजगारों और आम आदमी की कसमें खायी जाती हैं.
चुनाव में वोट देने के बारे में इन भिखारियों का कहना है कि वे शरीर से वैसे ही असमर्थ हैं. पेट भरने के लिए पैदल चलना इनकी मजबूरी है. वोट देने के लिए भी इन्हें पैदल ही चलना पड़ेगा, जो इनके लिए संभव नहीं है. इसलिए सरकारी योजनाओं से नाउम्मीद हो चुके ये भिखारी आज केवल भिखारी बनकर रह गये हैं.
