राजस्थानी फीचर फिल्म ‘व्हिसपर्स ऑफ द माउंटेंस’ को भी मिला दर्शकों का पूरा प्यार

डायरेक्टर ने बताया कि ‘व्हिसपर्स ऑफ द माउंटेंस’ फिल्म राजस्थान के बीहड़ अरावली क्षेत्र में, चाय की दुकान चलाने वाले 40 वर्षीय तिलक की कहानी है, जो चार साल पहले अपनी पत्नी को खोने के बाद गुजारे करने के लिए संघर्ष कर रहा है.

भारती जैनानी, कोलकाता

31वें कोलकाता इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल (केआइएफएफ) में राजस्थानी फीचर फिल्म ‘व्हिसपर्स ऑफ द माउंटेंस’ को दर्शकों ने खूब सराहा. बुधवार को इस फिल्म की नंदन में स्क्रीनिंग की गयी. इस फिल्म को केआइएफएफ के अलावा 56वें भारतीय अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के प्रतिष्ठित भारतीय पैनोरमा वर्ग के लिए आधिकारिक रूप से चुना गया है. जिगर नागदा द्वारा निर्देशित यह राजस्थानी फीचर फिल्म बाप-बेटे के भावनात्मक संघर्ष की कहानी है, जो हर आम आदमी के दिल को छूने वाली है. प्रेस कॉर्नर में आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन में फिल्म के निर्देशक व प्रोड्यूसर जिगर नागदा ने जानकारी दी कि कोलकाता में यह उनकी दूसरी फिल्म है, जिसे केआइएफएफ में जगह दी गयी है, इससे पहले 2023 में भी उनकी फिल्म को केआइएफएफ में शामिल किया गया था. उन्हें इस बात की खुशी है कि कोलकाता में फिल्मों के प्रति लोगों को काफी जानकारी व रुझान है, लोगों को फिल्मों की काफी समझ है. यहां फिल्मों का मेला लगा हुआ है, जो बहुत उत्साहित करने वाला है.

डायरेक्टर ने बताया कि ‘व्हिसपर्स ऑफ द माउंटेंस’ फिल्म राजस्थान के बीहड़ अरावली क्षेत्र में, चाय की दुकान चलाने वाले 40 वर्षीय तिलक की कहानी है, जो चार साल पहले अपनी पत्नी को खोने के बाद गुजारे करने के लिए संघर्ष कर रहा है. उसका 12 वर्षीय बेटा, रघु, एक मूक और संवेदनशील लड़का है, जो कक्षा पांच में पढ़ता है और आसपास के पहाड़ों के साथ एक अनकहा रिश्ता साझा करता है. तिलक जहां, निरंतर खनन से आर्थिक स्थिति के मजबूत होने का सपना देखता है, वहीं रघु प्रकृति के विनाश का दर्द महसूस करता है. जब रघु को शहर के एक विशेष स्कूल में छात्रवृत्ति की पेशकश की जाती है, तो तिलक, अकेलेपन और दुकान पर मदद न मिलने के डर से, उसे जाने से मना कर देता है. रघु अपनी इच्छा के विरुद्ध दुकान पर बैठता है और मदद करता है लेकिन पहाड़ों को मलबे में तब्दील होते देखकर वह निराश होता जाता है. उनके तनावपूर्ण रिश्ते में तब एक विनाशकारी मोड़ आ जाता है जब तिलक को सिलिकोसिस नामक फेफड़ों की बीमारी का पता चलता है, जो लंबे समय तक खनन की धूल के संपर्क में रहने से होती है. काम करने में असमर्थ, तिलक चाय की दुकान चलाने के लिए रघु पर निर्भर है. रघु अपनी ज़िम्मेदारियों की कठोर वास्तविकता को स्वीकार करते हुए दुकान की देखभाल करते हुए, जहां भी हो सके, पेड़ लगाना शुरू कर देता है. इस उम्मीद के साथ कि विनाश के जख्म भर जायेंगे.

निर्देशक का कहना है कि ‘व्हिसपर ऑफ़ माउंटेंस’ एक बेहद निजी फिल्म है, जो कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान मेरे पैतृक गांव में बिताए समय से प्रेरित है. यह आम लोगों की भावनाओं को स्पर्श करती है, इसीलिए सब जगह इसको दर्शकों का प्यार मिल रहा है. नंदन में बुधवार को नेपाली फिल्म छोरा जस्ताई और कबूल है, फिल्म को भी देखने के लिए लोगों की भीड़ दिखायी गयी.

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Author: GANESH MAHTO

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