खास बातें
West Bengal Assembly Dissolved: पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक महत्वपूर्ण संवैधानिक अध्याय का अंत हो गया. राज्यपाल आरएन रवि ने गुरुवार, 7 मई को राज्य की 17वीं विधानसभा को भंग करने का आदेश जारी कर दिया. इस फैसले के साथ ही मई 2021 में अस्तित्व में आयी 17वीं विधानसभा का कार्यकाल समाप्त हो गया. इसके साथ ही ममता बनर्जी बंगाल की मुख्यमंत्री नहीं रहीं.
सबकी नजरें नयी सरकार के शपथ ग्रहण पर टिकीं
राज्यपाल का यह आदेश चुनाव नतीजों के बाद राज्य में सत्ता के हस्तांतरण और नयी सरकार के शपथ ग्रहण की दिशा में सबसे बड़ी प्रक्रिया है. अब सबकी नजरें 18वीं विधानसभा के गठन और नये मंत्रिमंडल के शपथ ग्रहण समारोह पर टिकी हैं.
मुख्य सचिव ने जारी की अधिसूचना
राज्यपाल आरएन रवि ने संविधान के अनुच्छेद 174 (2) की उप-धारा (ख) के तहत मिली शक्तियों का इस्तेमाल कर विधानसभा भंग करने के निर्देश दिये हैं. संसदीय कार्य विभाग की ओर से जारी इस अधिसूचना को मुख्य सचिव दुष्मंत नारियाला ने जनहित में प्रकाशित किया है. आदेश के मुताबिक, गुरुवार (7 मई 2026) से ही निवर्तमान विधानसभा का अस्तित्व समाप्त माना जायेगा.
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17वीं विधानसभा का सफर : 2021 से 2026 तक
- यह विधानसभा पश्चिम बंगाल के राजनीतिक इतिहास के सबसे उतार-चढ़ाव वाले दौर की गवाह रही.
- सदन का गठन मई 2021 में हुआ था, जब ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस ने भारी बहुमत के साथ लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी की थी.
- हाल ही में संपन्न हुए 2026 के विधानसभा चुनाव के बाद अब इस सदन का कार्यकाल पूरा हो गया है.
- पुरानी विधानसभा भंग होने के साथ ही अब नवनिर्वाचित जनप्रतिनिधियों के शपथ लेने और नये सदन के संचालन का मार्ग प्रशस्त हो गया है.
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अब आगे क्या? शपथ ग्रहण की तैयारी तेज
विधानसभा भंग होना महज एक प्रक्रिया नहीं, बल्कि बंगाल में नयी व्यवस्था के स्वागत का संकेत है. अगले कुछ दिनों में राजभवन और ब्रिगेड परेड ग्राउंड (संभावित स्थल) में भारी गहमागहमी रहने वाली है. बहुत जल्द नयी सरकार के मुख्यमंत्री और उनके मंत्रियों का शपथ ग्रहण समारोह आयोजित होगा.
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West Bengal Assembly Dissolved: 18वीं विधानसभा का पहला सत्र
शपथ ग्रहण के बाद राज्यपाल नयी विधानसभा का पहला सत्र बुलाने की तारीख घोषित करेंगे, जिसमें सभी नवनिर्वाचित विधायक शपथ लेंगे. राज्यपाल के इस आदेश ने बंगाल में सत्ता परिवर्तन की कानूनी मुहर लगा दी है. टीएमसी सरकार के कार्यकाल के औपचारिक समापन और भाजपा की नयी सरकार के उदय के बीच यह एक अनिवार्य संवैधानिक कड़ी है.
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