खास बातें
West Bengal Election 2026 SIR Impact: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के बीच मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) ने राज्य की सियासत में भूचाल ला दिया है. राज्य की वोटर लिस्ट से रिकॉर्ड 90.83 लाख नाम हटाये जाने के बाद अब चुनावी जंग पूरी तरह अनिश्चित हो गयी है. कुल मतदाताओं की संख्या 7.66 करोड़ से घटकर अब 6.77 करोड़ रह गयी है. इस बदलाव ने ममता बनर्जी के गढ़ और भाजपा के वोट बैंक, दोनों के लिए खतरे की घंटी बजा दी है.
टीएमसी के ‘किलों’ में सबसे बड़ी सेंध
हटाये गये नामों में से लगभग तीन-चौथाई (करीब 66.6 लाख) नाम उन्हीं जिलों से हैं, जिन्हें तृणमूल कांग्रेस का अभेद्य दुर्ग माना जाता है. इनमें उत्तर और दक्षिण 24 परगना, मुर्शिदाबाद, नदिया और मालदा जैसे जिले शामिल हैं. ऐसा माना जा रहा है कि इन क्षेत्रों में नाम कटने से टीएमसी की बढ़त कम हो सकती है. महिला मतदाताओं का अनुपात 959 से घटकर 950 (प्रति 1000 पुरुष) हो गया है, जो दीदी के ‘साइलेंट वोटर’ आधार पर चोट माना जा रहा है.
भाजपा के ‘मतुआ’ कार्ड पर संकट
ममता बनर्जी परेशान हैं, तो भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए भी राह आसान नहीं है. वर्ष 2019 से भाजपा की मजबूती का आधार रहे मतुआ-शरणार्थी क्षेत्र में एसआईआर का गहरा असर पड़ा है. करीब 1.3 करोड़ की आबादी वाले मतुआ समुदाय का असर 55 सीटों पर है. समुदाय के नेताओं का दावा है कि 70 प्रतिशत परिवार इस प्रक्रिया से प्रभावित हुए हैं.
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West Bengal Election 2026 SIR Impact: भाजपा के लिए जंगलमहल में राहत
भाजपा के लिए राहत की खबर यह है कि जंगलमहल (पुरुलिया, बांकुड़ा, झारग्राम) और उत्तर बंगाल के उसके कोर क्षेत्रों में नामों की कटौती अल्पसंख्यक क्षेत्रों की तुलना में काफी कम है.
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120 सीटों पर जीत के अंतर से ज्यादा नाम कटे
सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि 120 से अधिक विधानसभा क्षेत्रों में जितने वोटर लिस्ट से बाहर हुए हैं, वह संख्या वर्ष 2021 या वर्ष 2024 की जीत के मार्जिन से कहीं ज्यादा है. 2021 में टीएमसी ने 45 और भाजपा ने 20 सीटों पर 10,000 से कम वोटों के अंतर से जीत दर्ज की थी. अब एक साथ इतने नाम कट जाने से इन सीटों पर परिणाम पूरी तरह पलट सकते हैं.
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ध्रुवीकरण का नया खेल?
राजनीतिक विश्लेषक सुमन भट्टाचार्य के अनुसार, अल्पसंख्यक क्षेत्रों में बढ़ी असुरक्षा की भावना मुस्लिम मतदाताओं को तृणमूल के पक्ष में और ज्यादा एकजुट कर सकती है. इससे आईएसएफ (ISF) और एमआईएम (AIMIM) जैसे छोटे दलों को नुकसान होने की आशंका है. यह टीएमसी के लिए ‘डैमेज कंट्रोल’ का काम कर सकता है. उनका कहना है कि 23 और 29 अप्रैल को होने वाले 2 चरणों के चुनाव अब नयी और अनिश्चित परिस्थितियों में लड़े जायेंगे, जहां हर एक वोट की कीमत पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गयी है.
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