उतार-चढ़ाव भरे सफर के बीच मुख्यमंत्रियों के दौर ने बदली तस्वीर

आजादी के बाद से लेकर वर्तमान तक पश्चिम बंगाल की राजनीति ने कई बड़े बदलाव देखे हैं. कांग्रेस के एकछत्र शासन से सत्ता वाममोर्चा के पास गयी, फिर तृणमूल कांग्रेस का उदय हुआ और अब भाजपा मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरकर तृणमूल को चुनौती दे रही है.

कोलकाता.

आजादी के बाद से लेकर वर्तमान तक पश्चिम बंगाल की राजनीति ने कई बड़े बदलाव देखे हैं. कांग्रेस के एकछत्र शासन से सत्ता वाममोर्चा के पास गयी, फिर तृणमूल कांग्रेस का उदय हुआ और अब भाजपा मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरकर तृणमूल को चुनौती दे रही है.

कांग्रेस दौर की शुरुआत : 1947 में आजादी के बाद से 1977 तक राज्य में कांग्रेस का प्रभुत्व रहा. इस दौरान डॉ प्रफुल्ल चंद्र घोष पश्चिम बंगाल के पहले मुख्यमंत्री बने. उन्होंने 15 अगस्त 1947 को पद संभाला और जनवरी 1948 तक इस पद पर रहे.इसके बाद डॉ विधान चंद्र रॉय राज्य के दूसरे मुख्यमंत्री बने और उन्होंने लंबे समय तक शासन किया. उनका कार्यकाल जनवरी 1948 से 1950 तक, फिर मार्च 1950 से 1952, 1952 से 1957 और जुलाई 1957 से 1962 तक रहा.

औद्योगीकरण और चुनौतियां

डॉ विधान चंद्र रॉय के नेतृत्व में राज्य में बड़े पैमाने पर औद्योगीकरण हुआ. दुर्गापुर और कल्याणी जैसे क्षेत्रों का विकास हुआ. साथ ही उन्हें शरणार्थियों के पुनर्वास जैसी बड़ी चुनौतियों का सामना भी करना पड़ा. उनके बाद प्रफुल्ल चंद्र सेन 1962 से 1967 तक मुख्यमंत्री रहे. इसी दौरान कांग्रेस के भीतर मतभेद उभरने लगे, जिससे बंगाल कांग्रेस का गठन हुआ और संयुक्त मोर्चा की सरकार बनी.

संयुक्त मोर्चा और अस्थिरता का दौर

अजय कुमार मुखर्जी के नेतृत्व में संयुक्त मोर्चा सरकार बनी. वह 15 मार्च 1967 से दो नवंबर 1967 तक और फिर 25 फरवरी 1969 से 19 मार्च 1970 तक मुख्यमंत्री रहे. इस दौरान राजनीतिक अस्थिरता बनी रही. प्रफुल्ल चंद्र घोष भी प्रोग्रेसिव डेमोक्रेटिक फ्रंट के नेतृत्व में करीब 90 दिनों के लिए मुख्यमंत्री बने. बाद में कई बार राष्ट्रपति शासन लागू हुआ. 1971 में अजय मुखर्जी फिर 87 दिनों के लिए मुख्यमंत्री बने, लेकिन इसके बाद फिर राष्ट्रपति शासन लग गया.

सिद्धार्थ शंकर रे का कार्यकाल

1972 से 1977 तक सिद्धार्थ शंकर रे मुख्यमंत्री रहे. इस दौरान नक्सल आंदोलन के दमन और आपातकाल जैसे घटनाक्रमों ने राज्य की राजनीति को प्रभावित किया. 1977 के चुनाव में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा और इसके बाद वह दोबारा सत्ता में नहीं लौट सकी.

वाममोर्चा का लंबा शासन : 1977 में माकपा के नेतृत्व में वाममोर्चा सत्ता में आया और 2011 तक लगातार 34 वर्षों तक शासन किया. यह दुनिया की सबसे लंबी लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित कम्युनिस्ट सरकार मानी जाती है. ज्योति बसु 1977 से 2000 तक मुख्यमंत्री रहे. स्वास्थ्य कारणों से पद छोड़ने के बाद बुद्धदेव भट्टाचार्य मुख्यमंत्री बने और 2000 से 2011 तक शासन किया. हालांकि वाममोर्चा सरकार ने ग्रामीण सशक्तीकरण को बढ़ावा दिया, लेकिन बाद में औद्योगीकरण और जमीन अधिग्रहण के मुद्दों, खासकर सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलनों के कारण उसे सत्ता गंवानी पड़ी.

तृणमूल का उदय और वर्तमान परिदृश्य : 2011 में तृणमूल कांग्रेस ने वाममोर्चा को हराकर सत्ता हासिल की और ममता बनर्जी मुख्यमंत्री बनीं. वह 2011, 2016 और 2021 के विधानसभा चुनाव जीतकर लगातार मुख्यमंत्री पद पर बनी हुई हैं. कांग्रेस और वाममोर्चा का प्रभाव अब काफी कम हो गया है, जबकि भाजपा तेजी से उभरकर मुख्य विपक्षी दल बन गयी है. पिछले विधानसभा चुनाव में 77 सीटें जीतकर भाजपा ने तृणमूल को कड़ी चुनौती दी थी और आगामी चुनाव में भी मुकाबला रोचक होने की संभावना है.

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By BIJAY KUMAR

BIJAY KUMAR is a contributor at Prabhat Khabar.

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