कोलकाता. कलकत्ता हाइकोर्ट ने करीब 26 वर्ष पहले अपने आदेश में एक यौनकर्मी को आर्थिक मदद देने का आदेश दिया था, लेकिन राज्य सरकार द्वारा अब तक वित्तीय सहायता प्रदान नहीं की गयी है. इसे लेकर सोमवार को कलकत्ता हाइकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सुजय पॉल की अध्यक्षता वाली खंडपीठ के समक्ष अधिवक्ता ने ध्यानाकर्षण किया और बकाया मदद दिलाने के लिए तुरंत सुनवाई की मांग की. सूत्रों के मुताबिक, अगले सोमवार को मामले की सुनवाई हो सकती है. यह घटना करीब ढाई दशक पहले की है. आरोप है कि कालीघाट इलाके के एक पुलिसवाले ने एक यौनकर्मी के साथ जबरदस्ती करने की कोशिश की. वहां मौजूद एक व्यक्ति ने जब पुलिस को रोका तो पुलिस उस व्यक्ति को थाने ले गयी और बुरी तरह पीटा, जिससे उसकी मौत हो गयी. उस समय विपक्ष की नेता ममता बनर्जी ने घटना का सार्वजनिक रूप से विरोध किया था. इस घटना के बाद कलकत्ता हाइकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गयी थी. कोर्ट ने अलीपुर डिस्ट्रिक्ट जज को जांच सौंपी थी. 25 अगस्त 2000 को तत्कालीन जस्टिस अशोक कुमार माथुर और जस्टिस बी घोष ने आदेश दिया कि आरोपी पुलिसवालों की सैलरी से पैसे काटकर कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल के पास जमा कर दिये जायें. वह पैसा मृतक व्यक्ति और संबंधित यौनकर्मी के परिवार को डोनेशन के तौर पर दिया जाना था. लेकिन बाद में यौनकर्मी का पता नहीं चल पाया, इसलिए पैसे कोर्ट में ही जमा रहे. हाल ही में पता चला कि वह अभी हुगली जिले में रह रही है. इसलिए यौनकर्मी को उक्त मुआवजा दिलाने के लिए हाइकोर्ट में याचिका दायर की गयी है.
हाइकोर्ट के आदेश के बावजूद यौनकर्मी को नहीं मिली वित्तीय सहायता
अगले सोमवार को मामले की सुनवाई हो सकती है.
