खास बातें
Nandigram 2021 Election Mamata vs Suvendu: भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेता और बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी ने एक बार फिर पश्चिम बंगाल की चीफ मिनिस्टर और तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी के खिलाफ नामांकन दाखिल कर दिया है. शुभेंदु ने इस बार ममता बनर्जी को उनके ही गढ़ में चुनौती दी है. 2021 के बंगाल चुनाव में ममता बनर्जी ने शुभेंदु अधिकारी को उनके गढ़ नंदीग्राम में चुनौती दी थी. तब अपनी पुरानी ‘बॉस’ को 1956 वोटों से हराकर शुभेंदु अधिकारी रातोंरात नेशनल मीडिया में छा गये थे. आखिर शुभेंदु ने कैसे ममता बनर्जी जैसी कद्दावर नेता को पटखनी दे दी? आज भी लोगों के मन में यह सवाल उठता है. आईए, आपको बताते हैं वो फैक्टर, जिसकी वजह से ममता बनर्जी पर भारी पड़े शुभेंदु अधिकारी.
ममता ने रैलियों पर खर्च किये, शुभेंदु ने संगठन पर दिया जोर
नंदीग्राम 2021 की सबसे चर्चित राजनीतिक लड़ाई (ममता बनर्जी vs शुभेंदु अधिकारी) थी. चुनाव आयोग को दोनों उम्मीदवारों ने जो जानकारी उपलब्ध करवायी, उसका विश्लेषण करेंगे, तो पायेंगे कि टीएमसी सुप्रीमो ने 21.88 लाख रुपए चुनाव में खर्च किये. उनके मुकाबले शुभेंदु अधिकारी ने 23.62 लाख रुपए खर्च किये थे. दोनों उम्मीदवारों के खर्च का जो स्टेटमेंट है, उसके विश्लेषण से पता चलता है कि दोनों ने अलग-अलग रणनीतियां अपनायीं. ममता ने बड़ी रैलियों पर 89.5 प्रतिशत रुपए खर्च किये. शुभेंदु अधिकारी ने संगठनात्मक मशीनरी पर ज्यादा खर्च किया.
1.74 लाख रुपए अधिक खर्च कर चुनाव जीते शुभेंदु
नंदीग्राम की लड़ाई में शुभेंदु अधिकारी का खर्च अधिक प्रभावी साबित हुआ. उन्होंने ममता बनर्जी से 1.74 लाख रुपए अधिक खर्च किये. चुनावी खर्च के विश्लेषण से पता चलता है कि चुनाव में जीत के लिए सिर्फ पैसे खर्च करना जरूरी नहीं है. खर्च की रणनीति और स्थानीय संगठन पर भी बहुत कुछ निर्भर होता है. ममता बनर्जी के पास शुभेंदु अधिकारी से दोगुना फंड और मुख्यमंत्री की शक्ति थी, लेकिन लोकल लेवल पर वोटर और कार्यकर्ताओं में फूट ने नतीजों को प्रभावित किया.
बंगाल की खबरें पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
ममता और शुभेंदु के चुनावी खर्च की तुलना
- ममता बनर्जी ने बंगाल चुनाव 2021 में नंदीग्राम में कुल 21,88,135 रुपए खर्च किये थे. शुभेंदु अधिकारी ने 23,62,126 रुपए खर्च किये. ममता बनर्जी के पास जो फंड था, उसमें से उन्होंने 54.7 प्रतिशत ही खर्च किये.
- शुभेंदु अधिकारी ने उपलब्ध फंड के मुकाबले 112.4 प्रतिशत खर्च कर डाला. ममता बनर्जी की तुलना में लगभग 1,73,991 रुपए (8 प्रतिशत) अधिक.
इसे भी पढ़ें : बंगाल में ममता का ‘चौका’ या भाजपा का ‘परिवर्तन’? 294 सीटों का पूरा गणित और 2 चरणों का चुनावी शेड्यूल, यहां जानें सब कुछ
फंडिंग के स्रोत (कहां से आये पैसे?)
- ममता बनर्जी के पास कुल 40,01,000 रुपए का फंड उपलब्ध था. इसमें TMC से 25 लाख और निजी स्रोतों (भाई से उपहार और अपना व्यक्तिगत फंड) से 15.01 लाख रुपए शामिल थे.
- शुभेंदु अधिकारी के पास कुल 21,02,000 रुपए का फंड था. इसमें भाजपा के पार्टी से 15 लाख रुपए मिले थे. उन्होंने अपनी जेब से 42 हजार रुपए खर्च किये. चुनाव में उन्होंने आक्रामक निवेश मॉडल अपनाया और चुनाव जीत ली.
इसे भी पढ़ें : नंदीग्राम का संग्राम : 21 लाख लेकर मैदान में उतरे शुभेंदु अधिकारी ने खर्च किये 23.62 लाख रुपए, ममता बनर्जी को हराया
Nandigram 2021 Election Mamata vs Suvendu: खर्च का पैटर्न और जमीनी मशीनरी
ममता बनर्जी का खर्च मुख्य रूप से ‘बिग इवेंट मॉडल’ पर आधारित था. इसमें उनके कुल चुनाव खर्च का 89.5 प्रतिशत हिस्सा सार्वजनिक बैठकों और रैलियों पर खर्च हुआ. उनके पास 116 वाहनों और 1,420 से अधिक कार्यकर्ताओं का नेटवर्क था.
इसे भी पढ़ें : ममता बनर्जी 40 लाख रुपए लेकर उतरीं थीं नंदीग्राम में, सबसे हाई-प्रोफाईल चुनाव में खर्च किये 21.88 लाख
भाजपा के मजबूत राष्ट्रीय कैडर का शुभेंदु को मिला लाभ
शुभेंदु अधिकारी का भी चुनाव खर्च रैलियों पर केंद्रित था, लेकिन उनकी टीम ने वाहनों, स्थानीय यात्रा और प्रशासनिक कार्यों पर ममता बनर्जी की तुलना में अधिक निवेश किया. उन्होंने भाजपा के मजबूत संगठन और राष्ट्रीय कैडर का उपयोग किया.
इसे भी पढ़ें : ‘खेला होबे’ के बाद ‘आबार जीतबे बांग्ला’, ममता का ‘बोर्गी’ दांव बनाम भाजपा का ‘जय मां काली’, नारों के युद्ध में कौन भारी?
चुनावी नतीजा और प्रति वोट खर्च
- ममता बनर्जी को नंदीग्राम में 41,505 वोट मिले. उनका प्रति वोट खर्च 52.73 रुपए रहा.
- शुभेंदु अधिकारी को नंदीग्राम में 43,461 वोट मिले. उनका प्रति वोट खर्च 54.36 रुपए रहा.
इसे भी पढ़ें
ममता बनर्जी की फिसली जुबान, शुभेंदु अधिकारी ने वीडियो शेयर कर पूछा- क्या यही है बंगाल की गरिमा?
बंगाल समेत अन्य राज्यों में वोट के लिए बांटी जा रही शराब, ड्रग्स और कैश, अब तक 651.55 करोड़ जब्त
एक दशक में 16 राज्यों में हुए चुनाव, चुनावी हिंसा में पश्चिम बंगाल नंबर-1
