जिस उम्र में बच्चों के कंधों पर स्कूल का बस्ता होता है, उस उम्र में उसके कंधों पर गरीबी और अभाव का बोझ था. घर की आर्थिक स्थिति इतनी खराब थी कि दो वक्त की रोटी जुटाना भी मुश्किल था. मजबूरी उसे घर की चौखट से उठाकर जंगल ले गयी. वहां से उसकी जिंदगी ने ऐसा मोड़ लिया, जिसने उसके बचपन, जवानी और पूरे जीवन की दिशा बदल दी. यह कहानी है झारग्राम जिले के बेलपहाड़ी थाना क्षेत्र के माजुगोड़ा गांव की रहने वाली चंदना सिंह की. उन्हें बाद में जंगलमहल में शोभा मुंडा के नाम से जाना गया.
अत्यधिक गरीबी और अभावों की वजह से चंदना ने 12 साल की उम्र में ही घर छोड़ दिया. इसी दौरान उनकी मुलाकात माओवादी नेता मदन महतो से हुई. धीरे-धीरे वह माओवादी संगठन से जुड़ गयीं. संगठन ने चंदना का नाम बदलकर शोभा मुंडा रख दिया. इसके बाद किताबों की जगह बंदूक ने ले ली और जंगल ही शोभा का ठिकाना बन गया.
बेलपहाड़ी के जंगलों से शुरू हुआ उनका सफर जल्द ही झारखंड के घाटशिला तक पहुंचा. वहीं उनकी मुलाकात माओवादी स्क्वॉड के सदस्य राजेश मुंडा से हुई. दोनों ने विवाह किया और संगठन के लिए साथ काम करने लगे. समय के साथ शोभा संगठन की सक्रिय सदस्य के रूप में पहचानी जाने लगीं.
हथियार चलाने में उनकी दक्षता की भी चर्चा होने लगी. वर्ष 2010 में घाटशिला में पुलिस के एक अभियान के दौरान शोभा गिरफ्तार हो गयीं. उनके खिलाफ कई मामले दर्ज किये गये और अदालत ने उन्हें जेल भेज दिया. इसके बाद उनकी जिंदगी के 15 साल जेल की ऊंची दीवारों के पीछे बीते.
वर्ष 2025 में मेदिनीपुर केंद्रीय सुधार गृह से रिहा होने के बाद वह अपने माजुगोड़ा गांव लौट आयीं. हालांकि, जेल से बाहर आने के बाद भी उनका संघर्ष खत्म नहीं हुआ. अब उनके हाथ में बंदूक नहीं, बल्कि मजदूरी का औजार है. वह अपनी बुजुर्ग मां के साथ रहती हैं और दिहाड़ी मजदूरी कर किसी तरह जीवनयापन कर रही हैं.
शोभा का कहना है कि उनके नाम पर कोई घर नहीं है और उन्हें अब तक किसी सरकारी आवास योजना का लाभ नहीं मिला है. उनका आरोप है कि नियमित राशन और पुनर्वास जैसी सुविधाएं भी उन्हें उपलब्ध नहीं करायी जा रही हैं. शोभा कहती हैं, \"मैं अब सामान्य जिंदगी जीना चाहती हूं. बस सिर छिपाने के लिए एक घर मिल जाये और मेहनत करके सम्मान के साथ जीवन जी सकूं.
