मिथिलेश झा
Humid Heat Climate Change Threat: जलवायु परिवर्तन (Climate Change) अब केवल ग्लेशियरों के पिघलने या भविष्य की चेतावनी तक सीमित नहीं रह गया है. यह हमारे रोजमर्रा के जीवन को सीधे प्रभावित कर रहा है. पश्चिम बंगाल में एक ऐसा अदृश्य और जानलेवा संकट दस्तक दे चुका है, जिसे वैज्ञानिक ह्यूमिड हीट (Humid Heat) यानी उमस वाली जानलेवा गर्मी कह रहे हैं.
शरीर के नैचुरल कूलिंग सिस्टम को फेल कर देता है ह्यूमिड हीट
जब वातावरण में उच्च तापमान के साथ-साथ भारी मात्रा में नमी (Humidity) मिल जाती है, तो उसे ह्यूमिड हीट कहा जाता है. सामान्य सूखी गर्मी या लू में हमारा शरीर खुद को ठंडा रखने के लिए पसीना बहाता है, जो हवा में तुरंत सूख जाता है. लेकिन ह्यूमिड हीट में हवा में पहले से ही इतनी नमी होती है कि पसीना सूख नहीं पाता और शरीर का नैचुरल कूलिंग सिस्टम फेल हो जाता है.
‘वेट-बल्ब तापमान’ से मापते हैं खतरनाक स्थिति
वैज्ञानिक इस खतरनाक स्थिति को मापने के लिए वेट-बल्ब तापमान (Wet-Bulb Temperature) का इस्तेमाल करते हैं. यह थर्मामीटर तापमान और आर्द्रता का ऐसा कॉम्बिनेशन है, जो बताता है कि हमारा शरीर पसीने के जरिये खुद को कितना ठंडा कर सकता है. क्लाइमेट सेंट्रल के अनुसार, 25 डिग्री सेंटीग्रेड या उससे अधिक का वेट-बल्ब तापमान इंसान के स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक माना जाता है.
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10 से बढ़कर 23 हो गयी ह्यूमिड हीट वाले दिनों की संख्या
क्लाइमेट सेंट्रल की रिपोर्ट के मुताबिक, वैश्विक स्तर पर वर्ष 1970 के दशक के बाद से खतरनाक ह्यूमिड हीट वाले दिनों की संख्या डबल से अधिक हो चुकी है. साल में पहले औसतन ऐसे 10 दिन होते थे. अब ऐसे दिनों की संख्या बढ़कर 23 हो गयी है. इसमें से लगभग 83 प्रतिशत दिनों के लिए सीधे तौर पर मानवीय गतिविधियां और प्रदूषण जिम्मेदार हैं.
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कोलकाता और दक्षिण बंगाल के तटीय जिलों पर सबसे बड़ा खतरा
पश्चिम बंगाल की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि यहां हुगली नदी, बंगाल की खाड़ी और विशाल मैंग्रोव क्षेत्र (सुंदरवन) के कारण हवा में नमी का स्तर हमेशा बहुत अधिक रहता है. इस वजह से कोलकाता, हावड़ा, उत्तर और दक्षिण 24 परगना के साथ-साथ पूर्व मेदिनीपुर जैसे जिले ह्यूमिड हीट के सबसे बड़े हॉट स्पॉट बन चुके हैं. कोलकाता में मानसून के ठीक पहले और बाद के महीनों में स्थिति नरक जैसी हो जाती है.
तमिलनाडु का तिरुनेलवेली देश में टॉप पर, कोलकाता भी दौड़ में आगे
तमिलनाडु का तिरुनेलवेली शहर साल में औसतन 273 खतरनाक ह्यूमिड हीट दिनों के साथ देश में सबसे ऊपर है. इसके बाद चेन्नई (257 दिन) और तिरुचिरापल्ली (251 दिन) का नंबर आता है. पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता और देश की आर्थिक राजधानी मुंबई भी इस लिस्ट में बहुत पीछे नहीं हैं. इन दोनों महानगरों में लोगों के साल के 200 से अधिक दिन घुटन भरी गर्मी में बीतते हैं.
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बंद कमरों में भी राहत नहीं, चेन्नई और कोलकाता के घरों की डरावनी स्थिति
यह मान लेना कि घर में राहत मिल जायेगी, बिल्कुल गलत है. क्लाइमेट ट्रेंड्स के अध्ययन में पता चला कि निम्न और मध्यम वर्ग के परिवारों के घरों के भीतर भी तापमान लगातार 32 डिग्री सेंटीग्रेड से ऊपर बना रहता है. चेन्नई और कोलकाता जैसे घनी आबादी वाले शहरों में लोग साल के करीब 3,000 से 5,000 घंटे अपने ही घरों के भीतर इस दमघोंटू वातावरण में जीने को मजबूर हैं.
कामकाजी और मेनोपॉज से जूझ रही महिलाओं पर दोहरी मार
इस मौसम की सबसे बड़ी मार समाज के संवेदनशील हिस्सों पर पड़ रही है. 50 वर्ष से अधिक उम्र की कामकाजी महिलाओं के लिए, जो पहले से ही मेनोपॉज (Menopause) के कारण हॉट फ्लैशेस (अचानक तेज गर्मी और धड़कन बढ़ना) से जूझ रही हैं, यह मौसम किसी प्रताड़ना से कम नहीं है. सार्वजनिक बसों में सफर करना या दफ्तरों में बिना एसी के काम करना उनके स्वास्थ्य को गंभीर खतरे में डाल रहा है.
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सुंदरवन और तटीय मछुआरों के लिए बना ‘ऑक्यूपेशनल हैजार्ड’
दक्षिण बंगाल और सुंदरवन के इलाकों में रहने वाले मछुआरों, किसानों और निर्माण कार्य से जुड़े मजदूरों के लिए यह गर्मी अब एक ऑक्यूपेशनल हैजार्ड (कामकाजी जोखिम) बन चुकी है. सुबह 9 बजे से ही आसमान से बरसती आग और हवा की उमस के कारण खेतों में काम करना या समुद्र में नाव चलाना असंभव हो जाता है. स्थानीय लोगों के मुताबिक, अब गर्मियों की शुरुआत मार्च की बजाय फरवरी से ही होने लगी है.
बिजली संकट और ‘शहरी हीट आइलैंड’ ने बढ़ायी सरकार की चिंता
कोलकाता जैसे बड़े महानगरों में तेजी से हो रहे कंक्रीट के निर्माण ने अर्बन हीट आइलैंड (Urban Heat Island) के प्रभाव को बढ़ा दिया है. शहर दिन भर गर्मी सोखते हैं और रात में भी ठंडे नहीं हो पाते. जब भीषण गर्मी में हर तरफ एसी और कूलर चलते हैं, तो बिजली की मांग रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच जाती है. भारत में पीक बिजली खपत रिकॉर्ड 270 गीगावॉट तक पहुंच चुकी है, जिससे बार-बार होने वाले पावर कट लोगों की मुसीबत और बढ़ा देते हैं.
अमीर और गरीब के बीच बढ़ा ‘कूलिंग गैप’
इस संकट ने देश और राज्य में आर्थिक असमानता को भी उजागर किया है. एक तरफ 15 प्रतिशत सक्षम लोग एयर कंडीशनर और एयर कूलर की मदद से कमरों में सुरक्षित हैं, तो दूसरी तरफ 85 फीसदी आबादी, जो झुग्गियों, चालों या कच्चे मकानों में रहती है, उनके पास इस जानलेवा हवा से बचने का कोई साधन नहीं है.
पर्यावरण नीति से बढ़कर ‘पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी’ पर विचार का समय
वरिष्ठ स्वास्थ्य विशेषज्ञों और डॉक्टरों का मानना है कि ह्यूमिड हीट अब केवल पर्यावरणविदों के विमर्श का मुद्दा नहीं रह गया है. यह एक गंभीर पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी (Public Health Emergency) है. इसके कारण देश में कार्डियोवैस्कुलर स्ट्रेन (हृदय रोग), हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन और किडनी फेलियर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. अस्पतालों के इमरजेंसी वार्ड जून और जुलाई के महीनों में ऐसे मरीजों से पट जाते हैं.
नीति निर्माताओं को बदलना होगा दृष्टिकोण, ग्राउंड लेवल पर एक्शन की जरूरत
पश्चिम बंगाल की शुभेंदु अधिकारी सरकार ने अपने बजट का एक बड़ा हिस्सा पर्यावरण और सतत विकास लक्ष्यों (SDG) के लिए समर्पित किया है. लेकिन ह्यूमिड हीट जैसी अदृश्य आपदा से निपटने के लिए शहरी नियोजन को बदलना होगा. शहरों में ग्रीन कवर बढ़ाना, सार्वजनिक स्थानों पर कूलिंग शेल्टर्स बनाना और मजदूरों के काम करने के घंटों में बदलाव करना अब समय की सबसे बड़ी मांग है.
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