58500 साल पहले दार्जिलिंग से नीचे आ गया था हिमालय का 100 किमी लंबा ग्लेशियर! वैज्ञानिकों की रिसर्च में खुलासा

एक नयी शोध से पता चला है कि 58,500 साल पहले पूर्वी हिमालय का एक विशाल ग्लेशियर पिघलकर दार्जिलिंग की वर्तमान ऊंचाई से काफी नीचे तक आ गया था. यह अध्ययन ग्लोबल वार्मिंग के ऐतिहासिक प्रभावों को दर्शाता है. पढ़ें पूरी रिपोर्ट.

Climate Change Study: आज वैश्विक तापमान में वृद्धि (Global Warming) पूरी दुनिया के लिए सबसे बड़ा संकट बन गयी है. ऐसे नहीं है कि पहले कभी यह संकट नहीं था. हजारों साल पहले भी तापमान में बढ़ोतरी के कारण पूर्वी हिमालय में एक बहुत बड़ी तबाही मची थी. इसका सीधा संबंध पश्चिम बंगाल के आज के पर्वतीय क्षेत्रों से है. 'क्वाटरनरी साइंस रिव्यू' (Quaternary Science Review) जर्नल में प्रकाशित एक शोध में बताया गया है कि करीब 58,500 वर्ष पहले पूर्वी हिमालय का एक विशाल ग्लेशियर पिघलकर दार्जिलिंग, शिमला और शिलांग जैसे प्रसिद्ध हिल स्टेशन्स की मौजूदा ऊंचाई से भी काफी नीचे आ गया था.

द्री घाटी का 100 किमी लंबा ग्लेशियर अब विलुप्तप्राय

वैज्ञानिकों का कहना है कि आज हम दार्जिलिंग, शिमला और शिलांग की जिन खूबसूरत वादियों में घूमते हैं, अगर उस दौर में वे शहर वहां बसे होते, तो पूरी तरह बर्फ की चादर के नीचे दफन हो गये होते. मैनचेस्टर विश्वविद्यालय (University of Manchester) के शोधकर्ता शशांक नितुंदिले के नेतृत्व में वैज्ञानिकों की एक टीम ने वर्ष 2023 में पूर्वी हिमालय के सुदूर इलाकों का दौरा किया था. इस दौरान अरुणाचल प्रदेश के दिबांग क्षेत्र में स्थित ‘द्री घाटी’ (Dri Valley) में व्यापक अध्ययन किया गया, जिसमें तिब्बत और स्थानीय मिशमी समुदाय के लोगों ने वैज्ञानिकों की मदद की.

रिसर्च से पता चला कि 58,500 साल पहले इस क्षेत्र में लगभग 100 किलोमीटर (62 मील) लंबा एक विशाल ग्लेशियर फैला हुआ था. जलवायु परिवर्तन और बढ़ते तापमान के कारण आज वह सिकुड़ते-सिकुड़ते महज 5 किलोमीटर का रह गया है और लगभग विलुप्ति की कगार पर है.

ये भी पढ़ें: ग्लोबल वार्मिंग का यूरोपीय ट्रेलर भारत के लिए 3 मोर्चे पर तबाही के संकेत, कोलकाता में हीट इंडेक्स का जानलेवा जाल

दार्जिलिंग से 700 मीटर नीचे आ गयी थी 'बर्फ की जीभ'

वैज्ञानिकों के विश्लेषण के मुताबिक, उस दौर में पूर्वी हिमालय की करीब 7,000 मीटर की औसत ऊंचाई वाले शिखरों से ग्लेशियर में भू-स्खलन हुआ, जिसके कारण ग्लेशियर का अंतिम सिरा (जिसे विज्ञान की भाषा में ‘जीभ’ कहा जाता है) पिघलकर समुद्र तल से 1,300 से 1,500 मीटर की ऊंचाई तक नीचे आ गया था.

लद्दाख की पहाड़ियां.

अगर इसकी तुलना आज के प्रमुख हिल स्टेशंस की ऊंचाई से की जाये, तो आंकड़े हैरान हैरान कर देंगे.

  • शिमला (हिमाचल प्रदेश) : समुद्र तल से 2,206 मीटर की ऊंचाई पर.
  • दार्जिलिंग (पश्चिम बंगाल): समुद्र तल से 2,042 मीटर की ऊंचाई पर.
  • शिलांग (मेघालय) : समुद्र तल से 1,966 मीटर की ऊंचाई पर.

यानी, हजारों साल पहले आयी वह प्राकृतिक आपदा इतनी भयानक थी कि ग्लेशियर का मलबा और बर्फ बंगाल के सबसे प्रसिद्ध पर्यटन स्थल दार्जिलिंग (2,042 मीटर) की ऊंचाई से भी करीब 500 से 700 मीटर नीचे तक आ पहुंचा था.

ये भी पढ़ें: बंगाल में तेजी से बदल रहा मौसम, साइलेंट किलर बना ह्यूमिड हीट, घर का तापमान 32 डिग्री सेंटीग्रेड

‘बेरिलियम-10’ से खुला ऐतिहासिक तबाही का राज

वैज्ञानिकों को द्री घाटी में रिसर्च के दौरान यू (U) आकार की घाटियां और बिल्कुल चिकनी चट्टानें मिलीं, जो यह साबित करती हैं कि यहां कभी ग्लेशियरों का घर्षण हुआ था. ग्लेशियर के पिघलने का सटीक समय जानने के लिए वैज्ञानिकों ने कॉस्मोजेनिक न्यूक्लाइड डेटिंग (Cosmogenic Nuclide Dating) पद्धति का सहारा लिया.

शोधकर्ताओं ने घाटी से पत्थरों और बोल्डर के 63 नमूने एकत्र कर जांच के लिए ऑस्ट्रेलिया की प्रयोगशाला में भेजे. जब ग्लेशियर पिघलता है, तो उसके नीचे दबे पत्थरों पर सूर्य की किरणें पड़ने से ‘बेरिलियम-10’ (Beryllium-10) नामक एक दुर्लभ आइसोटोप बनता है. इसी आइसोटोप की मात्रा को मापकर पता चला कि ग्लेशियर धीरे-धीरे नहीं, बल्कि अचानक आयी तबाही के कारण सिकुड़ने लगा था. 58,500 साल पहले जो ग्लेशियर 100 किमी लंबा था, वह 12,600 साल पहले घटकर सिर्फ 25 किमी का रह गया.

ये भी पढ़ें: जलवायु परिवर्तन से लड़ने पर खर्च होगा बंगाल बजट का 69 प्रतिशत पैसा, सुंदरवन और सौर ऊर्जा पर बड़ा ऐलान

अत्यधिक बारिश नहीं, तापमान में वृद्धि असली विलेन!

अब तक वैज्ञानिकों का यह मानना था कि पूर्वी हिमालय जैसे अत्यधिक नमी और बारिश वाले इलाकों में ज्यादा बारिश ग्लेशियरों को स्थिर रखने में मदद करती है. लेकिन द्री घाटी के इस शोध ने पूरी धारणा बदल दी है. अंतिम ग्लेशियर चक्र के विश्लेषण से साफ हुआ कि ग्लेशियर के पिघलने के पीछे बारिश या बर्फबारी की कोई खास भूमिका नहीं थी. इसका मुख्य कारण तापमान में लगातार हो रही वृद्धि थी. तापमान बढ़ने से बर्फबारी कम हो जाती है और बारिश बढ़ जाती है, जिससे नयी बर्फ जमने की प्रक्रिया पूरी तरह रुक जाती है. पुराना ग्लेशियर तेजी से गलने लगता है.

ये भी पढ़ें: क्लाइमेट चेंज से रोटी पर संकट, रात की गर्मी से खतरे में खाद्य सुरक्षा

पश्चिम बंगाल और उत्तर बंगाल के लिए बड़ा अलर्ट

वैज्ञानिक अतीत के इस पन्ने को खंगालकर हमारे भविष्य का खाका तैयार कर रहे हैं. जिस प्रकार वर्तमान में ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण तापमान बढ़ रहा है, उससे सिक्किम और उत्तर बंगाल से सटे हिमालयी ग्लेशियरों पर बड़ा खतरा मंडरा रहा है. अगर ये ग्लेशियर इसी तरह अचानक पिघलते हैं, तो तीस्ता, तोर्सा, जलढाका और महानंदा जैसी उत्तर बंगाल की लाइफलाइन कही जाने वाली नदियों में भयानक फ्लैश फ्लड (बाढ़) और बाद में जलसंकट की स्थिति पैदा हो सकती है.

ये भी पढ़ें: क्यों खत्म हुआ 45 फीसदी ‘क्लाइमेट फाइनेंस’ का लक्ष्य! भारत पर क्या होगा इसका असर?


प्रभात खबर डिजिटल प्रीमियम स्टोरी

लेखक के बारे में

Published by: Mithilesh Jha

मिथिलेश झा PrabhatKhabar.com में पश्चिम बंगाल राज्य प्रमुख (State Head) के रूप में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार हैं. उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 32 वर्षों से अधिक का व्यापक अनुभव है. उनकी रिपोर्टिंग राजनीति, सामाजिक मुद्दों, जलवायु परिवर्तन, नवीकरणीय ऊर्जा, कृषि और अन्य समसामयिक विषयों पर केंद्रित रही है, जिससे वे क्षेत्रीय पत्रकारिता में एक विश्वसनीय और प्रामाणिक पत्रकार के रूप में स्थापित हुए हैं. अनुभव : पश्चिम बंगाल, झारखंड और बिहार में 3 दशक से अधिक काम करने का अनुभव है. वर्तमान भूमिका : प्रभात खबर डिजिटल (prabhatkhabar.com) में पश्चिम बंगाल के स्टेट हेड की भूमिका में हैं. वे डिजिटल न्यूज कवर करते हैं. तथ्यात्मक और जनहित से जुड़ी पत्रकारिता को प्राथमिकता देते हैं. वर्तमान में बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 पर पूरी तरह से फोकस्ड हैं. भौगोलिक विशेषज्ञता : उनकी रिपोर्टिंग का मुख्य फोकस पश्चिम बंगाल रहा है, साथ ही उन्होंने झारखंड और छत्तीसगढ़ की भी लंबे समय तक ग्राउंड-लेवल रिपोर्टिंग की है, जो उनकी क्षेत्रीय समझ और अनुभव को दर्शाता है. मुख्य विशेषज्ञता (Core Beats) : उनकी पत्रकारिता निम्नलिखित महत्वपूर्ण और संवेदनशील क्षेत्रों में गहरी विशेषज्ञता को दर्शाती है :- राज्य राजनीति और शासन : झारखंड और पश्चिम बंगाल की राज्य की राजनीति, सरकारी नीतियों, प्रशासनिक निर्णयों और राजनीतिक घटनाक्रमों पर निरंतर और विश्लेषणात्मक कवरेज. सामाजिक मुद्दे : आम जनता से जुड़े सामाजिक मुद्दों, जनकल्याण और जमीनी समस्याओं पर केंद्रित रिपोर्टिंग. जलवायु परिवर्तन और नवीकरणीय ऊर्जा : पर्यावरणीय चुनौतियों, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और रिन्यूएबल एनर्जी पहलों पर डेटा आधारित और फील्ड रिपोर्टिंग. डाटा स्टोरीज और ग्राउंड रिपोर्टिंग : डेटा आधारित खबरें और जमीनी रिपोर्टिंग उनकी पत्रकारिता की पहचान रही है. विश्वसनीयता का आधार (Credibility Signal) : तीन दशकों से अधिक की निरंतर रिपोर्टिंग, विशेष और दीर्घकालिक कवरेज का अनुभव तथा तथ्यपरक पत्रकारिता के प्रति प्रतिबद्धता ने मिथिलेश झा को पश्चिम बंगाल और पूर्वी भारत के लिए एक भरोसेमंद और प्रामाणिक पत्रकार के रूप में स्थापित किया है.
और पढ़ें

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >