संवाददाता, कोलकाता
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने शुक्रवार को कोलकाता में गार्डेनरीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (जीआरएसइ) लिमिटेड द्वारा आयोजित रक्षा और समुद्री संवाद ””सागर संकल्प – भारत के समुद्री गौरव की पुनः प्राप्ति”” का उद्घाटन करते हुए कहा कि अनिश्चितता के वर्तमान युग में प्रासंगिकता और तैयारी का एकमात्र रास्ता आत्मनिर्भरता ही है. उन्होंने कहा : वर्तमान वैश्विक स्थिति के कारण आपूर्ति श्रृंखलाओं का पुनर्निर्माण, नये समीकरणों का निर्माण और समुद्री गतिविधियों में निरंतर वृद्धि हुई है. अप्रैल 2026 तक रक्षा निर्यात लगभग 29 हजार करोड़ रुपये तक पहुंचने की उम्मीद है.पश्चिम एशिया की स्थिति अत्यंत चिंताजनक
रक्षा मंत्री ने कहा कि पुराने विचार, पुरानी वैश्विक व्यवस्था और पुरानी धारणाएं तेजी से बदल रही हैं. ये वे अनिश्चितताएं हैं, जिन्हें हमें समझना होगा. पश्चिम एशिया की वर्तमान स्थिति इसका एक प्रमुख उदाहरण है. वहां जो हो रहा है, वह काफी असामान्य है. होर्मुज जलडमरूमध्य या पूरा फारस का खाड़ी क्षेत्र वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है. जब इस क्षेत्र में अशांति होती है, तो इसका सीधा असर तेल और गैस की आपूर्ति पर पड़ता है. इन अनिश्चितताओं का अर्थव्यवस्था और वैश्विक व्यापार पर सीधा प्रभाव पड़ता है. इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि यह असामान्य स्थिति ही अब नये सिरे से सामान्य बनती जा रही है. उन्होंने कहा कि हमारा लक्ष्य जहाजों को केवल उत्पादन इकाइयों के रूप में विकसित करना नहीं है, बल्कि उन्हें प्रौद्योगिकी केंद्रों के रूप में विकसित करना है. बुनियादी ढांचे के आधुनिकीकरण, डिजिटल जहाज डिजाइन उपकरणों, मॉड्यूलर निर्माण तकनीकों और आपूर्ति श्रृंखला एकीकरण के माध्यम से उन्हें वैश्विक मानकों के अनुरूप बनाने के प्रयास किये जा रहे हैं.देश में रक्षा उत्पादन बढ़ कर 1.5 लाख करोड़ रुपये के पार पहुंचा
रक्षा मंत्री ने बताया कि सरकार के प्रयासों के सकारात्मक परिणाम सामने आ रहे हैं, क्योंकि वित्त वर्ष 2024-25 में घरेलू रक्षा उत्पादन 1.5 लाख करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर को पार कर गया, जबकि रक्षा निर्यात लगभग 24 हजार करोड़ रुपये के सर्वकालिक उच्चस्तर पर पहुंच गया. उन्होंने कहा कि अप्रैल 2026 तक रक्षा निर्यात लगभग 29 हजार करोड़ रुपये तक पहुंचने की उम्मीद है और सरकार ने वित्त वर्ष 2029-30 तक 50 हजार करोड़ रुपये के रक्षा उपकरण निर्यात करने का लक्ष्य रखा है. रक्षा मंत्री ने बताया कि भारतीय नौसेना के लिए ऑर्डर किये गये सभी युद्धपोत व पनडुब्बियां भारतीय शिपयार्ड में ही बनायी जा रही हैं, जिसमें डिजाइन, इंजीनियरिंग, निर्माण से लेकर जीवनचक्र समर्थन तक भी शामिल है. रक्षा मंत्री ने कहा कि समुद्री भारत विजन 2030 और समुद्री अमृत काल विजन 2047 के तहत विश्वस्तरीय जहाज निर्माण क्लस्टर विकसित करने के लिए लगभग तीन लाख करोड़ रुपये के निवेश की योजना बनायी गयी है. उन्होंने कहा कि हमारा लक्ष्य 2030 तक भारत को शीर्ष 10 जहाज निर्माण करने वाले देशों में शामिल करना और 2047 तक शीर्ष पांच में पहुंचना है. रक्षा मंत्री ने कहा कि यदि देश समन्वित योजना, प्रौद्योगिकी अपनाने और संस्थागत तालमेल के साथ आगे बढ़ता है, तो भारत का समुद्री क्षेत्र सुरक्षित, समृद्ध और मजबूत होगा. उन्होंने कहा कि भारतीय नौसेना की तत्परता, ऑपरेशन सिंदूर जैसी सफल कार्रवाइयां और आत्मनिर्भरता की दिशा में उठाये गये कदम यह दर्शाते हैं कि भारत का रक्षा क्षेत्र सही दिशा में आगे बढ़ रहा है. अपने संबोधन में जीआरएसइ के सीएमडी कमोडोर पीआर हरि (सेवानिवृत्त) ने भारत की सभ्यतागत समुद्री विरासत और स्वदेशी जहाज निर्माण क्षमता के विकास पर प्रकाश डाला. इस सम्मेलन में नौसेना के वरिष्ठ नेतृत्व, नीति निर्माताओं और उद्योग जगत के हितधारकों ने भारत की समुद्री सुरक्षा संरचना और जहाज निर्माण प्रणाली को मजबूत करने पर विचार-विमर्श किया.
