बांग्लादेशी कार्यकर्ता की हत्या के संबंध में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की प्रमुख ममता बनर्जी की कथित टिप्पणी के विरोध में एक जनहिता याचिका (पीआईएल) दायर की गयी है. इस याचिका पर सवाल उठाते हुए हाईकोर्ट ने मंगलवार को कहा कि जनहित याचिकाओं का इस्तेमाल ‘खास औजार या हथियार’ के रूप में किया जा रहा है. खंडपीठ ने पूछा कि यह याचिका जनहित याचिका के रूप में सुनवाई योग्य कैसे है.
याचिका को क्यों माना जाये पीआईएल : खंडपीठ
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश तपब्रत चक्रवर्ती और न्यायमूर्ति अतारूप बनर्जी की खंडपीठ ने पूछा कि इस याचिका को जनहित याचिका क्यों माना जाये. कोर्ट ने मौखिक टिप्पणी में कहा कि ध्यान आकर्षित करने के लिए ‘आजकल जनहित याचिकाओं का इस्तेमाल खास औजार या हथियार के रूप में किया जा रहा है.’
जनहित याचिका में क्या?
याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी ने दिसंबर 2025 में ढाका में बांग्लादेशी कार्यकर्ता शरीफ उसमान हादी की हत्या को लेकर कुछ विवादित टिप्पणियां की थीं. इसकी वजह से भारत के राष्ट्रीय हित पर असर पड़ा. याचिकाकर्ता ने खंडपीठ के समक्ष दावा किया कि ये टिप्पणियां 2 जून को कोलकाता में एक राजनीतिक रैली के दौरान की गयी थीं. याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी शासकीय गोपनीयता अधिनियम का पालन करने के लिए बाध्य थीं.
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ममता बनर्जी के वकील ने याचिका पर उठाये सवाल
तृणमूल नेता के वकील कल्याण बंद्योपाध्याय और अर्क कुमार नाग ने दावा किया कि याचिकाकर्ता यह नहीं बता सका कि शासकीय गोपनीयता अधिनियम के किस प्रावधान का उल्लंघन हुआ है.
14 सितंबर को फिर होगी सुनवाई
राज्य सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त महाधिवक्ता राजदीप मजूमदार ने अदालत को बताया कि जांच में यह पुष्टि हुई है कि याचिकाकर्ता उस स्थान पर मौजूद नहीं था और वहां किसी अप्रिय घटना की सूचना नहीं मिली. याचिकाकर्ता के वकील ने अपने मुवक्किल से निर्देश लेने के लिए समय मांगा, जिसके बाद अदालत ने मामले की सुनवाई की अगली तारीख 14 सितंबर तय की.
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