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Bengal News: नई दिल्ली: यदि चयन प्रक्रिया वैध नहीं है, तो नियुक्ति वैध नहीं हो सकती. वैध उम्मीदवारों को मदरसों में नियुक्ति का मौका नहीं मिला. पश्चिम बंगाल में मदरसों की नियुक्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है. जब यह मामला अदालत में आया, तो न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की खंडपीठ ने कहा कि पिछले 10 वर्षों में पश्चिम बंगाल में भर्ती को लेकर बेहद खराब अनुभव रहा है.
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
बुधवार की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता ने कहा कि नियुक्ति वैध है या नहीं, इसका निर्णय तीन कारकों के आधार पर किया जाएगा. पहला, यह देखना होगा कि नियुक्ति प्रक्रिया सरकारी नियमों के अनुसार अनुमोदित है या नहीं. दूसरा, उम्मीदवार की शैक्षणिक योग्यता का सत्यापन करना होगा. तीसरा, यह देखना होगा कि उम्मीदवार ने वैध नियुक्ति प्रक्रिया का पालन किया है या नहीं.
भाई-भतीजावाद की ओर इशारा
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता ने अपने अवलोकन में पश्चिम बंगाल में मदरसों की भर्ती के कई मामलों में भाई-भतीजावाद की ओर इशारा किया. उन्होंने कहा- नौकरी पाने वालों से कहीं अधिक योग्य लोगों को अवसर नहीं मिला. ऐसे में क्या होगा. उन्होंने सवाल उठाया कि जब भर्ती प्रक्रिया ही कानूनी नहीं है, तो उम्मीदवार की योग्यता का सत्यापन करना कितना उचित है.
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सुप्रीम कोर्ट एक-एक करके सुनवाई कर रहा है
सुप्रीम कोर्ट एक-एक करके सुनवाई कर रहा है, जिसमें लगभग एक हजार विवादास्पद रूप से नियुक्त शिक्षकों और शिक्षाकर्मियों में से 10 की नियुक्ति को नमूने के रूप में लिया गया है. 2016 से पश्चिम बंगाल के मदरसों की प्रबंधन समितियां मदरसा सेवा आयोग को दरकिनार करते हुए मनमाने ढंग से शिक्षकों और शिक्षाकर्मियों की नियुक्ति कर रही हैं. सर्वोच्च न्यायालय ने सवाल उठाया है कि ऐसी भर्ती में राज्य सरकार को वेतन क्यों देना चाहिए, जिसमें राज्य सरकार की कोई भूमिका नहीं है. कई पात्र उम्मीदवारों ने इस नियुक्ति को चुनौती देते हुए सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया है.
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