कोलकाता : हमारे दर्शन शास्त्रों में किसी वस्तु का प्रतिपादन करने से पहले उसका लक्षण बताना आवश्यक होता है. लक्षण दो प्रकार का होता है-पहला-तटस्थ लक्षण, दूसरा-स्वरूप लक्षण. हमारे वेद प्रतिपाद्य सनातन धर्म के दो लक्षण प्रमाणिक मनीषियों के द्वारा बतलाये गये हैं.
पहला धर्म का तटस्थ लक्षण है-यतोभ्युदय निःश्रेयससिद्धिस्सधर्मः. दूसरा स्वरूप लक्षण है-वेद प्रणिहितो धर्मः. तटस्थ लक्षण का अर्थ है-जिसके द्वारा लौकिक अभ्युदय और निःश्रेयस की सिद्धि होती है वह धर्म है. स्वरूप लक्षण का अर्थ है जिसका वेद के द्वारा विधान किया जाता है और जो धर्म के स्वरूप को प्रकाशित करता है वह धर्म है.
यह माना जाता है कि -सर्वज्ञ, शक्तिमान परमात्मा के द्वारा प्रलय के अनन्तर जो सृष्टि होती है उसमें जीवों को केवल कर्मफल प्रदान करना ही नहीं अपितु उसके कल्याण का मार्ग प्रशस्त करना भी है, अतः हमारे शास्त्रों में कहा है-सृष्टि के प्रारंभ में ब्रह्मा के हृदय में परमात्मा ने वेदों को प्रकट किया-यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं. इसीलिए वैदिक धर्म को सनातन धर्म कहा गया है.
अनन्तश्री विभूषित ज्योतिष्पीठाधीश्वर एवं द्वारकाशारदापीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी श्री स्वरूपानन्द सरस्वतीजी महाराज ने शनिवार को चातुर्मास प्रवचन में कहा कि सनातन परमात्मा ने सनातन जीवों के लिए सनातन वेद-शास्त्रों द्वारा जो सनातन अभ्युदय, निःश्रेयस का मार्ग बतलाया, उसको सनातन धर्म कहते हैं.
सृष्टि में वृद्धि, ह्रास का क्रम चलता रहता है. जो धर्म अनादिकाल से प्रचलित है उसमें रजोगुण, तमोगुण बढ़ जाने से शिथिलता आ जाती है. साथ ही शास्त्रों का तात्पर्य जानना भी प्रत्येक व्यक्ति के लिये संभव नहीं है.
इसीलिए भगवान का अवतार होता है और आचार्य भगवत्प्रेरणा से जन्म लेते हैं. आचार्य मां विजानीयात् के अनुसार आचार्य भी भगवान के स्वरूप होते हैं. आदि शंकराचार्य द्वारा निर्मित महानुशासन के अनुसार-सतगुरू में ब्रह्मा जगदगुरु थे, त्रेता में वशिष्ठ, द्वापर में व्यास एवं कलियुग में शंकराचार्य जगदगुरू होते हैं.
व्यासजी ने जितना व्याख्यान वेदों का किया है वह अतुलनीय है. उन्होंने महाभारत, सत्रह पुराण, ब्रह्मसूत्र द्वारा सब कुछ बतला दिया है. इसीलिए कहा जाता है कि-व्यासोच्छिष्टं जगत सर्वम् और यह भी कि यदिहास्तितदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत् क्वचित.
श्रीव्यासकृत ब्रह्मसूत्रों पर शांङ्करभाष्य और उसके अनुसार अनेकों विद्वानों ने ग्रन्थों की रचना की है. इसमें वैदिक वांङ्गमय अत्यन्त विस्तृत हो गया है. इस वाङ्गमय का अध्येता और उसे समझाने वाला मनस्वी संन्यासी ही शंकराचार्य पद का अधिकारी होता है. यही कारण है कि आदिगुरू शंकराचार्यजी ने धर्म की रक्षा के लिये चार आम्राय पीठों की स्थापना की.
