हाल ही में कुछ स्कूलों और काॅलेजों के बाहर ड्रग्स बेचने के आरोप में कई लोगों को गिरफ्तारी हो चुकी है. पुलिस की ओर से बताया गया है कि ऐसे मामलों में आरोपियों के मुख्य ग्राहक विद्यार्थी थे. ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि कॉलेजों और स्कूलों में पढ़ने वाले विद्यार्थी भी नशे के चंगुल में फंसते जा रहे हैं.
जानकारों का मानना है कि कई मामलों में कुछ अभिभावक समाज में उनकी प्रतिष्ठा खो न जाये, इस भय से बच्चों में नशे की लत को छिपाने या उसपर पर्दा डालने की कोशिश करते हैं. कुछ तो बच्चों में नशे की लत की बात की अनदेखी भी करते हैं. ऐसा करना उन अभिभावकों के लिए सही नहीं है क्योंकि नशा के आदी हो चुके बच्चे जब अंतिम चरण में पहुंच जाते हैं तो उनके इलाज में खासी परेशानी होती है.
समय रहते यदि बच्चों का इलाज कराया जाये तो स्थिति पहले जैसी सामान्य हो सकती है. यह कहना है मनोचिकित्सक अभिषेक हंस का. बच्चों में नशा के लत के कारण व उससे बचने के उपाय के बारे में उन्होंने कई अहम पहलुओं से अवगत कराया.
मनोवैज्ञानिक अभिषेक हंस ने कहा कि वर्ष 2012 में कोलकाता पुलिस और कलकत्ता विश्वविद्यालय की ओर से किये गये एक रिसर्च में वे भी शामिल थे. रिसर्च के आधार पर उनका मानना है कि चरस, गांजा, अफीम, हेरोइन की तरह ही सिगरेट और शराब को भी ड्रग्स की श्रेणी में रखना उचित होगा. रिसर्च के अनुसार ड्रग्स की लत में फंस बच्चे और युवा सबसे पहले शराब और सिगरेट का सेवन करते थे. बाद में वे ड्रग्स के अन्य साधनों का व्यवहार करने लगे.
रिसर्च के दौरान श्यामबाजार, रासबिहारी, बड़ाबाजार, नॉर्थ पोर्ट के फूल बागान, इकबालपुर का दौरा किया गया. वहां कई ऐसे लोगों को पाया गया, जो ड्रग्स के लिए भीख मांग रहे थे. असल में जब ड्रग्स के लिए रुपये नहीं जुटते हैं, तो नशे की लत में फंसा व्यक्ति चोरी से लेकर बड़ा अपराध भी कर सकता हैं. उसका मनोभाव कुछ ऐसा हो जाता है कि उसे भीख मांगना भी गलत नहीं लगता.
हाल ही में कुछ स्कूलों और काॅलेजों के बाहर ड्रग्स बेचने के आरोप में कई लोगों को गिरफ्तारी हो चुकी है. पुलिस की ओर से बताया गया है कि ऐसे मामलों में आरोपियों के मुख्य ग्राहक विद्यार्थी थे. ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि कॉलेजों और स्कूलों में पढ़ने वाले विद्यार्थी भी नशे के चंगुल में फंसते जा रहे हैं.
जानकारों का मानना है कि कई मामलों में कुछ अभिभावक समाज में उनकी प्रतिष्ठा खो न जाये, इस भय से बच्चों में नशे की लत को छिपाने या उसपर पर्दा डालने की कोशिश करते हैं.
कुछ तो बच्चों में नशे की लत की बात की अनदेखी भी करते हैं. ऐसा करना उन अभिभावकों के लिए सही नहीं है क्योंकि नशा के आदी हो चुके बच्चे जब अंतिम चरण में पहुंच जाते हैं तो उनके इलाज में खासी परेशानी होती है.
समय रहते यदि बच्चों का इलाज कराया जाये तो स्थिति पहले जैसी सामान्य हो सकती है. यह कहना है मनोचिकित्सक अभिषेक हंस का. बच्चों में नशा के लत के कारण व उससे बचने के उपाय के बारे में उन्होंने कई अहम पहलुओं से अवगत कराया.
मनोवैज्ञानिक अभिषेक हंस ने कहा कि वर्ष 2012 में कोलकाता पुलिस और कलकत्ता विश्वविद्यालय की ओर से किये गये एक रिसर्च में वे भी शामिल थे. रिसर्च के आधार पर उनका मानना है कि चरस, गांजा, अफीम, हेरोइन की तरह ही सिगरेट और शराब को भी ड्रग्स की श्रेणी में रखना उचित होगा. रिसर्च के अनुसार ड्रग्स की लत में फंस बच्चे और युवा सबसे पहले शराब और सिगरेट का सेवन करते थे.
बाद में वे ड्रग्स के अन्य साधनों का व्यवहार करने लगे. रिसर्च के दौरान श्यामबाजार, रासबिहारी, बड़ाबाजार, नॉर्थ पोर्ट के फूल बागान, इकबालपुर का दौरा किया गया. वहां कई ऐसे लोगों को पाया गया, जो ड्रग्स के लिए भीख मांग रहे थे. असल में जब ड्रग्स के लिए रुपये नहीं जुटते हैं, तो नशे की लत में फंसा व्यक्ति चोरी से लेकर बड़ा अपराध भी कर सकता हैं. उसका मनोभाव कुछ ऐसा हो जाता है कि उसे भीख मांगना भी गलत नहीं लगता.
पुनर्वास सेंटर जाना जरूरी
नशे की लत छुड़ाने के लिए परिजनों का सहयोग काफी जरूरी होता है. ड्रग्स की लत में फंसे व्यक्ति को कम से कम तीन से छह महीने पुनर्वास सेंटर में रहना जरूरी होता है. मनोचिकित्सक की निगरानी व कुछ दवाइयों के जरिये पीड़ित का इलाज किया जाता है.
क्या अभिभावक अपनी जिम्मेदारी समझते हैं
मनोवैज्ञानिक का कहना है कि भावनात्मक संकट (इमोशन क्राइसिस) बच्चों और युवाओं के नशा के चंगुल में फंसने का सबसे बड़ा कारण है. अपने बच्चों को सफल इनसान बनाना हर अभिभावक चाहते हैं. इसके लिए वे बच्चों की सारी जरुरतें पूरी करने में लगे भी रहते हैं. इन जरुरतों को पूरा करने मेें कुछ अभिभावक अपने बच्चों को वक्त नहीं दे पाते.
भावनात्मक सहयोग नहीं मिलने पर बच्चे ऐसे किसी ऐसे व्यक्ति के करीब जाना चाहते हैं, जो उन्हें समझे. इसी का फायदा ड्रग्स बेचनेवाले गिरोह के लोग उठाते हैं. यानी वे ड्रग्स देकर उन्हें समझाने की कोशिश करते हैं कि इससे उनका दर्द दूर होगा. इस प्रकार धीरे-धीरे ड्रग्स के चंगुल में फंसनेवाला उनकी अंगुलियों की कठपुतली बन जाता है. बच्चों में नशा के अन्य कारण भी हैं.
बच्चों में नयी चीजों के प्रति जिज्ञासा काफी होती है. वे नयी चीजों को जानने की कोशिश करते हैं. आसपास जब कोई व्यक्ति नशा करता है तो बच्चों को उसके प्रति जिज्ञासा होती है और वे नशा की चंगुल मेें फंस सकते हैं. वर्तमान में सोशल मीडिया का क्रेज है. यह नये लोगों से परिचय करने का एक जरिया भी है. लेकिन गलत लोगों से परिचय होना बच्चों के लिए सही नहीं है. बच्चे सबसे पहले अपने अभिभावकों से सीखते हैं.
अभिभावकों को ध्यान रखने की जरूरत है वे अपने बच्चों के सामने नशा ना करें. प्राय: बच्चे अपने अभिभावकों का अनुसरण करते हैं और उनके नशा करने से वे भी नशा के आदी हो सकते हैं. बच्चों के स्वाभाव में अचानक परिवर्तन होने पर अभिभावकों को इसका कारण जानने की कोशिश करनी चाहिए.
