जब ममता की जान बचाने को सिराजुल ने तानी थी बंदूक

मनोरंजन सिंह, कोलकाता : 21 जुलाई 1993 का दिन था, जब कांग्रेस की युवा शाखा की नेता रहीं ममता बनर्जी ने राइटर्स अभियान किया था और उनके आंदोलन को कुचलते हुए पुलिस फोर्स की ओर से फायरिंग की गयी थी, जिसमें युवा कांग्रेस के 13 कार्यकर्ताओं की मौत हो गयी थी. बड़ी तादाद में तत्कालीन […]

मनोरंजन सिंह, कोलकाता : 21 जुलाई 1993 का दिन था, जब कांग्रेस की युवा शाखा की नेता रहीं ममता बनर्जी ने राइटर्स अभियान किया था और उनके आंदोलन को कुचलते हुए पुलिस फोर्स की ओर से फायरिंग की गयी थी, जिसमें युवा कांग्रेस के 13 कार्यकर्ताओं की मौत हो गयी थी. बड़ी तादाद में तत्कालीन पुलिस प्रशासन की ओर से पहुंची फोर्स के सामने ही तत्कालीन पुलिस कमिश्नर दिनेश वाजपेयी की तरफ बंदूक तानते हुए सिराजुल मंडल नामक कोलकाता पुलिस के ही एक कांस्टेबल ने ममता बनर्जी की जान बचायी थी.

ममता बनर्जी बच गयीं और आज वह सत्ता में बैठी हैं लेकिन वह पुलिसकर्मी 23 सालों से अपनी खोयी नौकरी को पाने की आस में जी रहा है. हर साल 21 जुलाई आते ही वो क्षण और दिन याद करके सिराजुल की आंखों में आंसू आ जाता है.
सिराजुल का कहना है कि आर्थिक अभाव में किसी तरह से मजदूरी करके परिवार का भरण पोषण करते हैं. मुख्यमंत्री शहीदों के परिवार के कई लोगों को नौकरी दीं, लेकिन मैं सिर्फ अपनी खोयी नौकरी पाने की उम्मीद लगाये हूं लेकिन आश्वासन के सिवाय अब तक मुझे कुछ नहीं मिला है.
वृद्धा पेंशन से भी वंचित वृद्ध माता-पिता
उत्तर 24 परगना जिले के गोबरडांगा के इच्छापुर भद्रडांगा ग्राम निवासी सिराजुल मंडल मजदूरी करके 84 वर्षीय वृद्ध पिता इजराइल मंडल और 70 वर्षीय वृद्ध मां रूपभान मंडल छह सदस्यीय परिवार का खर्च चला रहे हैं. 19 जनवरी 1988 में सिराजुल ने कोलकाता पुलिस में नौकरी ज्वाइन किया था.
उसने बताया कि 21 जुलाई 1993 की घटना के तीन साल बाद ही तरह-तरह से परेशान किया गया था. अंत 1996 में सिराजुल को नौकरी गवानी पड़ी. फिलहाल स्थानीय सक्रिय तृणमूल नेता से जुड़े होने के बाद भी परिवार में वृद्ध माता-पिता वृद्धा पेंशन से वंचित हैं.
सिर्फ आश्वासन मिला, मदद नहीं
सिराजुल का कहना है कि ममता बनर्जी जब से सत्ता में आयीं, तब से शहीदों के परिवार को नौकरी दी लेकिन मैं सिर्फ अपनी खोयी नौकरी को पाने के लिए कई बार उनके दर गया. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से लेकर अन्य मंत्रियों के पास भी कई जरूरी दस्तावेज भी जमा किये, लेकिन मुझे सिर्फ आश्वासन और भरोसा ही दिया गया. इसके अतिरिक्त कुछ नहीं मिला है.
झोपड़ी में रहता है पूरा परिवार
सिराजुल का घर टीन, बांस और लकड़ी बना है. पूरा घर एक झोपड़ी की तरह है. उसमें वर्षों से पूरा परिवार रह रहा है. सिराजुल की मां का कहना है कि सिराजुल के अलावा घर चलाने वाला और कोई नहीं है. बेटा किसी तरह से दो वक्त की रोटी खिला रहा है.
सिराजुल का कहना है आर्थिक अभाव में हाईकोर्ट में मामला करके भी ज्यादा दिनों तक नहीं लड़ सका. मालूम हो कि 18 साल तक कानूनी लड़ाई के बाद निर्मल विश्वास को नौकरी मिल गयी थी. बिना प्रमोशन के अंत में प्रदीप सरकार ने बाध्य होकर रिटायरमेंट ले लिया था, लेकिन सिराजुल अब भी आश लगाये हुए है.
क्या हुई थी घटना
साल 1993 में 21 जुलाई के दिन कांग्रेस का राइटर्स बिल्डिंग अभियान था. ममता बनर्जी के नेतृत्व में ब्रेबर्न रोड से होकर रैली राइटर्स जाने के क्रम में ही पुलिस ने रोकी थी, इसके बाद विवाद बढ़ते ही लाठीचार्ज शुरू हुआ था. ममता बनर्जी का सिर फट गया था.
इस दौरान पुलिस फोर्स की मदद से फायरिंग की गयी थी, उस समय ड्यूटी में तैनात पुलिस कांस्टेबल सिराजुल मंडल ने पुलिस फोर्स के इस्तेमाल के खिलाफ आवाज उठाते हुए अपनी बंदूक पुलिस कमिश्नर की ओर तान दी थी, जिसके बाद फोर्स लौट गयी थी, लेकिन उसकी सजा के तौर पर बाद में मंडल को नौकरी गवानी पड़ी.

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