आंतरिक, बाह्य कारणों से होता है मानसिक अवसाद

आसनसोल. काजी नजरूल विश्वविद्यालय के ऑडिटोरियम हॉल में साइकोलॉजी विभाग ने बुधवार को ‘डिप्रेशन इन हयूमन बिंग’ पर सेमिनार आयोजित किया. इसका उद्घाटन कुलपति डॉ साधन चक्रवर्ती ने किया. अवसर पर रजिस्ट्रार डॉ अमिताभ अब्राहम, उन्नयन एवं परिकल्पना अधिकारी परिमलेंदू बनर्जी, उपपरीक्षा नियंत्रक डॉ निखिलेश बारीक, गणित विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ शांतनु घोष, इंस्पेक्टर ऑफ […]

आसनसोल. काजी नजरूल विश्वविद्यालय के ऑडिटोरियम हॉल में साइकोलॉजी विभाग ने बुधवार को ‘डिप्रेशन इन हयूमन बिंग’ पर सेमिनार आयोजित किया. इसका उद्घाटन कुलपति डॉ साधन चक्रवर्ती ने किया. अवसर पर रजिस्ट्रार डॉ अमिताभ अब्राहम, उन्नयन एवं परिकल्पना अधिकारी परिमलेंदू बनर्जी, उपपरीक्षा नियंत्रक डॉ निखिलेश बारीक, गणित विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ शांतनु घोष, इंस्पेक्टर ऑफ कॉलेज जयंत चक्रवर्ती, नजरूल सेंटर ऑफ स्टडीज के उप निदेशक श्रीकांत रायचौधरी, एप्लाइड साइकोलॉजी विभागाध्यक्ष शुभव्रत पोद्दार आदि उपस्थित थे.
कुलपति डॉ चक्रवर्ती ने कहा कि अवसादग्रस्त लोग खुद के फैसले ले सकने में अक्षम होते हैं, इन्हें या तो नींद नहीं आती या फिर ये बहुत सोते हैं. वे हमेशा किसी अंजान डर से भयग्रस्त दिखते हैं. या तो कम खाते हैं या बेवजह भूख के भी अधिक खाते हैं. उन्होंने इसका कारण कुछ लोगों में आंतरिक और कुछ में बाह्य बताया. उन्होंने कहा कि अक्सरहां आतंकवादी संगठनों के संचालक और उनके कार्यक र्ता, सीरियल किलर भी अवसादग्रस्त होते हैं.
इन संगठनों के सरगना देश ओर समाज में अवसाद ग्रस्त लोगों को खोज कर अपने संगठन में शामिल करते हैं और खुद के निर्णय ले सकने में अक्षम अवसादग्रस्त लोगों का मानसिक तथा शारीरिक शोषण करते हैं और अपने अमानवीय मंसूबों को पूरा करने में उनका इस्तेमाल करते हैं. ऐसे अवसादग्रस्त लोग दूसरों के आदेश पर चलते हैं. एप्लाइड साइकोलॉजी विभाग के विभागाध्यक्ष श्री पोददार ने कहा कि दो अप्रैल को वर्ल्ड अटीज्म जागरूकता दिवस मनाया गया. दुनिया भर में अटीज्म से पीड़ित लोगों की भरमार है. इससे पीड़ित बच्चे सामान्य बच्चों की अपेक्षा अलग व्यवहार करते हैं.
इससे पीड़ित बच्चों में तीन साल तक की उम्र में इसके लक्षण सामने आने लगते हैं. इससे पीड़ित बच्चे दूसरों से दूरी बना कर रहते हैं, लोगों से घुलने मिलने से कतराते हैं, सभा समारोह में सामने नहीं आना चाहते हैं, आंख से आंख मिला कर बातें नहीं करते हैं. उन्होंने कहा कि बीते सात अप्रैल को विश्व स्वास्थ्य दिवस के कार्यक्रमों में डिप्रेशन विषय पर लंबी कार्यशालाएं आयोजित की गयी. उन्होंने कहा कि यह एक मानसिक बीमारी है जिसका इलाज संभव है.उन्होंने कहा कि वैश्वीक स्तर पर अवसाद ग्रस्त लोगों की बढ़ती तादाद ने अंतरराष्ट्रीय स्तर के स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चिंता बढा दी है. जिस तादाद में अवसाद ग्रस्त रोगों की संख्या बढ रही है उससे साल 2020 तक दुनिया के गंभीर रोगों में अवसाद को तीसरे स्थान पर रखे जाने की संभावना है.
नेशनल इंस्टिच्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंस (बेंगलुरू) के हालिया सर्वे रिपोर्ट में देश में 11 प्रतिशत और पश्चिम बंगाल में 13.9 प्रतिशत लोग अवसाद ग्रस्त पाये गये. इनमें युवाओं की संख्या 82 प्रतिशत है. अत्यधिक अवसादग्रस्त होने वाले व्यक्तियों में अकेलापन, नशा, आत्महत्या आदि की प्रवृत्ति होती है. उन्होंने कहा कि अगर कोई व्यक्ति अवसाद से पीड़ित है तो ऐसे व्यक्ति के परिजन उनसे संपर्क कर सकते हैं. वे उनका इलाज और काउंसलिंग करेंगे.

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