UP Politics: उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले दल-बदल की राजनीति तेज हो गई है. AIMIM के राष्ट्रीय प्रवक्ता रहे सैयद आसिम वकार के कांग्रेस में शामिल होने के बाद अब पार्टी ने उनके जाने पर प्रतिक्रिया दी है. AIMIM के प्रदेश महासचिव मोहम्मद शमीम खान ने कहा कि आसिम वकार का पार्टी छोड़ना उनका निजी फैसला है और इससे संगठन की सेहत पर कोई खास असर नहीं पड़ेगा. आसिम वकार ने 2 सितंबर को कांग्रेस का दामन थामा था. कांग्रेस में शामिल होने के बाद उन्होंने AIMIM पर विपक्षी दलों को कमजोर करने और भाजपा को राजनीतिक फायदा पहुंचाने का आरोप लगाया था. उन्होंने कहा था कि भाजपा को हराने के लिए विपक्षी दलों को आपस में लड़ने के बजाय एकजुट होना चाहिए. इसी बयान पर AIMIM के प्रदेश महासचिव मोहम्मद शमीम खान से जब पूछा गया कि चुनाव से ठीक पहले राष्ट्रीय प्रवक्ता का पार्टी छोड़कर कांग्रेस में जाना संगठन के लिए प्लस है या माइनस, तो उन्होंने इसे ज्यादा महत्व देने से इनकार किया.
‘प्रवक्ता पार्टी का आईना होता है, लेकिन संगठन बड़ा होता है’
मोहम्मद शमीम खान ने कहा कि आसिम वकार करीब एक दशक तक AIMIM में रहे और राष्ट्रीय प्रवक्ता की भूमिका निभाई. उनके मुताबिक, प्रवक्ता पार्टी का चेहरा जरूर होता है, लेकिन किसी एक व्यक्ति के जाने से पूरा संगठन प्रभावित नहीं होता. उन्होंने कहा कि पार्टी में आसिम वकार से पहले भी कई लोग आए और उनके बाद भी संगठन में लोग जुड़े हैं. इसलिए किसी एक नेता के जाने को पार्टी के लिए बड़ा नुकसान बताना सही नहीं है. शमीम खान ने यह भी दावा किया कि संगठन में आसिम वकार की कोई बड़ी भूमिका नहीं थी और उनकी पहचान मुख्य रूप से टेलीविजन बहसों के जरिए बनी.
‘टीवी पर आने वालों से नहीं, मेहनत करने वालों से फर्क पड़ता है’
आसिम वकार की लोकप्रियता और टीवी डिबेट में उनकी मौजूदगी को लेकर भी शमीम खान ने तीखा जवाब दिया. उन्होंने कहा कि किसी नेता को टीवी पर आने का मौका पार्टी के मंच से मिलता है और पार्टी की वजह से उसे राजनीतिक पहचान मिलती है. उनके मुताबिक, संगठन में जमीन पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं की भूमिका ज्यादा महत्वपूर्ण है. शमीम खान ने कहा कि “मेहनत करने वालों के जाने से फर्क पड़ता है, टीवी का शो बने हुए लोगों के जाने से पार्टी को फर्क नहीं पड़ता. हालांकि यह AIMIM प्रदेश महासचिव का राजनीतिक आकलन है. आसिम वकार लंबे समय तक पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता रहे और उत्तर प्रदेश की राजनीति में टीवी बहसों के जरिए AIMIM के प्रमुख चेहरों में उनकी पहचान बनी. मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, वह करीब 10 साल तक AIMIM से जुड़े रहे थे.
कांग्रेस में जाने के बाद वकार ने AIMIM पर लगाए थे गंभीर आरोप
आसिम वकार के कांग्रेस में शामिल होने के बाद यूपी की सियासत में इस घटनाक्रम को लेकर चर्चा तेज हुई. वकार ने आरोप लगाया था कि AIMIM भाजपा का मुकाबला करने की बात तो करती है, लेकिन चुनावी मैदान में कांग्रेस और सपा जैसी विपक्षी पार्टियों को चुनौती देकर विपक्षी वोटों को बांटने का काम करती है. उन्होंने कहा था कि यदि भाजपा को हराना लक्ष्य है तो विपक्षी दलों के बीच संघर्ष के बजाय एकजुटता होनी चाहिए. कांग्रेस में शामिल होने के दौरान उन्होंने राहुल गांधी के नेतृत्व में भाजपा के खिलाफ लड़ाई को आगे बढ़ाने की बात कही थी. यही वजह है कि वकार का कांग्रेस में जाना केवल एक नेता के दल बदलने तक सीमित नहीं माना जा रहा. इसे 2027 के चुनाव से पहले मुस्लिम मतदाताओं के बीच राजनीतिक प्रभाव और विपक्षी वोटों के समीकरण से भी जोड़कर देखा जा रहा है.
‘सपा, बसपा और कांग्रेस मुस्लिम वोट के दम पर राजनीति करते रहे’
आसिम वकार के कांग्रेस में जाने के बाद AIMIM के सामने दूसरा बड़ा सवाल गठबंधन को लेकर है. जब शमीम खान से पूछा गया कि 2027 का चुनाव सामने है, AIMIM ने गठबंधन की संभावना का संकेत भी दिया है, लेकिन अब तक किसी बड़े दल ने पार्टी के साथ गठबंधन में खुली दिलचस्पी नहीं दिखाई है, तो उन्होंने सपा, बसपा और कांग्रेस पर निशाना साधा. उन्होंने आरोप लगाया कि इन दलों ने लंबे समय तक मुस्लिम मतदाताओं के समर्थन से राजनीति की, लेकिन मुस्लिम समाज के मुद्दों और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को पर्याप्त जगह नहीं दी. शमीम खान के मुताबिक, AIMIM की राजनीति का उद्देश्य मुस्लिम समाज की राजनीतिक हिस्सेदारी और नेतृत्व के सवाल को सामने लाना है.
‘हमें पार्टी से नहीं, मुस्लिम लीडरशिप से दिक्कत’
AIMIM नेता ने विपक्षी दलों की उस राजनीति पर भी सवाल उठाया जिसमें उनकी पार्टी को अलग-अलग चुनावों में ‘बी टीम’ या अन्य तरह के राजनीतिक टैग दिए जाते हैं. शमीम खान ने कहा कि देश में कई राजनीतिक दल चुनाव लड़ते हैं, लेकिन AIMIM को लेकर ही बार-बार सवाल उठाए जाते हैं. उनके मुताबिक, इसका कारण AIMIM की चुनावी मौजूदगी से ज्यादा मुस्लिम नेतृत्व का राजनीतिक रूप से मजबूत होकर सामने आना है. उन्होंने दावा किया कि मुस्लिम समाज अब केवल किसी दल के पारंपरिक वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल नहीं होना चाहता, बल्कि सत्ता में हिस्सेदारी और अपने मुद्दों पर राजनीतिक प्रतिनिधित्व चाहता है.
2027 में AIMIM की राह आसान नहीं
उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों वाले चुनाव में AIMIM के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपना राजनीतिक प्रभाव बढ़ाने की है. 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने 96 सीटों पर चुनाव लड़ा था, लेकिन उसे किसी सीट पर जीत नहीं मिली थी. ऐसे में 2027 से पहले पार्टी के लिए संगठन विस्तार, मजबूत उम्मीदवार और संभावित गठबंधन तीनों महत्वपूर्ण होंगे. वहीं आसिम वकार के कांग्रेस में जाने से कांग्रेस को एक ऐसा चेहरा मिला है जो लंबे समय तक AIMIM की ओर से टीवी बहसों में पार्टी का पक्ष रखता रहा है. कांग्रेस की ओर से भी उनके शामिल होने को संगठन को मजबूत करने और भाजपा के खिलाफ अभियान को धार देने के रूप में पेश किया गया है.
असली सवाल- वकार के जाने का कितना असर?
आसिम वकार का जाना AIMIM के लिए संगठनात्मक रूप से कितना बड़ा नुकसान है, इसका आकलन फिलहाल राजनीतिक दावों से ज्यादा 2027 के चुनावी प्रदर्शन से होगा. AIMIM के प्रदेश महासचिव मोहम्मद शमीम खान इसे मामूली घटनाक्रम बता रहे हैं, जबकि वकार के कांग्रेस में जाने को कांग्रेस और कुछ राजनीतिक विश्लेषक AIMIM के लिए झटका मान रहे हैं. एक बात जरूर स्पष्ट है—2027 का चुनाव नजदीक आते ही यूपी में मुस्लिम वोट, विपक्षी एकता, गठबंधन और राजनीतिक प्रतिनिधित्व का सवाल और ज्यादा महत्वपूर्ण होने वाला है. आसिम वकार का कांग्रेस में जाना इसी बड़े राजनीतिक संघर्ष की एक नई कड़ी है.
