राखी का हजारों साल पुराना अनसुना इतिहास, आखिर कैसे भाई-बहन के प्रेम का त्योहार बन गया रक्षाबंधन?

Raksha Bandhan News: रक्षाबंधन का त्योहार सिर्फ भाई-बहन के प्रेम तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें प्राचीन धार्मिक परंपराओं और लोक कथाओं में गहरी हैं. जानें राखी का वह अनसुना इतिहास जो इसे सदियों पुरानी एक अनूठी परंपरा बनाता है.

Raksha Bandhan News: रक्षाबंधन आते ही भाई की कलाई पर सजी रंग-बिरंगी राखी और बहन की आंखों में भाई की लंबी उम्र की दुआ याद आती है, लेकिन उत्तर प्रदेश की धरती पर इस पर्व की कहानी सिर्फ भाई-बहन के प्रेम तक सीमित नहीं रही. काशी, अयोध्या, मथुरा और प्रयागराज जैसे प्राचीन धार्मिक केंद्रों से जुड़ी परंपराओं में श्रावण पूर्णिमा का विशेष महत्व रहा है. कभी रक्षा सूत्र धार्मिक अनुष्ठानों का हिस्सा था, तो कभी इसे संकट से रक्षा और मंगलकामना के प्रतीक के रूप में देखा गया. यही वजह है कि यूपी की लोक संस्कृति में रक्षाबंधन सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि सदियों पुरानी परंपराओं और रिश्तों की कहानी भी समेटे हुए है.

यूपी के इन शहरों में रक्षाबंधन का विशेष महत्व

यूपी के इन शहरों में सदियों पुरानी है श्रावण पूर्णिमा की परंपरा

उत्तर प्रदेश के काशी, प्रयागराज, अयोध्या और मथुरा में श्रावण पूर्णिमा का धार्मिक महत्व सदियों पुरानी परंपराओं से जुड़ा है. काशी में इस दौरान शिव आराधना और गंगा स्नान, प्रयागराज में संगम स्नान, अयोध्या में धार्मिक अनुष्ठान और मथुरा में कृष्ण भक्ति से जुड़े आयोजन होते रहे हैं. इन परंपराओं के बीच रक्षा सूत्र बांधने की परंपरा भी प्रचलित रही, जिसने समय के साथ भाई-बहन के रिश्ते में खास पहचान बनाई.

जब राखी का मतलब सिर्फ भाई-बहन नहीं था

रक्षाबंधन का संस्कृत अर्थ ही ‘रक्षा का बंधन’ है. प्राचीन परंपराओं में श्रावण पूर्णिमा के दिन रक्षा सूत्र बांधने की रस्म का उल्लेख मिलता है. भविष्य पुराण के उत्तर पर्व में श्रावण पूर्णिमा पर राजा की कलाई में रक्षा बांधने की विधि बताई गई है. यानी उस दौर में यह रस्म केवल बहन द्वारा भाई को राखी बांधने तक सीमित नहीं थी, बल्कि रक्षा और आशीर्वाद से जुड़ा धार्मिक अनुष्ठान थी.

इंद्र-इंद्राणी की कहानी से जुड़ी रक्षा की परंपरा

इंद्राणी के रक्षा सूत्र से जुड़ी है राखी की प्राचीन कथा

रक्षाबंधन की प्राचीन कथाओं में देवताओं के राजा इंद्र और उनकी पत्नी इंद्राणी की कथा भी प्रमुख है. मान्यता के अनुसार देवताओं और असुरों के बीच युद्ध में इंद्र संकट में थे. तब इंद्राणी ने मंत्रों से अभिमंत्रित रक्षा सूत्र इंद्र की कलाई पर बांधा. इसके बाद इंद्र ने युद्ध में विजय हासिल की. इस कथा में राखी भाई-बहन के रिश्ते से ज्यादा संकट से रक्षा करने वाले पवित्र सूत्र के रूप में सामने आती है.

कृष्ण-द्रौपदी ने बदला रिश्ते का भाव

कृष्ण-द्रौपदी: स्नेह और रक्षा का अनोखा बंधन

राखी को भाई-बहन के स्नेह से जोड़ने वाली सबसे चर्चित कथाओं में कृष्ण और द्रौपदी की कहानी है. मान्यता है कि कृष्ण की उंगली पर चोट लगने के बाद द्रौपदी ने अपनी साड़ी का एक टुकड़ा फाड़कर उनकी उंगली पर बांध दिया था. द्रौपदी के इस स्नेह से प्रभावित होकर कृष्ण ने उनकी रक्षा का वचन दिया. यह कथा रक्षाबंधन के उस भाव को मजबूत करती है जिसमें रक्त का रिश्ता जरूरी नहीं, बल्कि स्नेह, विश्वास और रक्षा का वचन रिश्ते को खास बनाता है. हालांकि, इसे ऐतिहासिक प्रमाण के बजाय महाभारत से जुड़ी धार्मिक परंपरा और कथा के रूप में देखना चाहिए.

समय के साथ राखी बनी भाई-बहन के प्रेम का त्योहार

इतिहास और समाजशास्त्र के नजरिए से देखें तो रक्षाबंधन का मौजूदा स्वरूप धीरे-धीरे विकसित हुआ. अलग-अलग क्षेत्रों में इस दिन की लोक परंपराओं के अलग नाम और तरीके रहे हैं. खासकर उत्तर भारत के ग्रामीण समाज में यह त्योहार विवाहित बहनों के मायके से उनके रिश्ते को मजबूत करने का अवसर भी रहा. बहनें मायके आती थीं और भाई उन्हें अपने परिवार से जुड़े रहने और जरूरत के समय साथ खड़े होने का भरोसा देते थे.

राखी ने कई बार निभाई रिश्तों से भूमिका

राखी ने जोड़ा था दो शासकों का रिश्ता

राखी का इस्तेमाल सिर्फ पारिवारिक रिश्तों तक सीमित नहीं रहा. इतिहास में रानी कर्णावती और मुगल सम्राट हुमायूं से जुड़ी प्रसिद्ध कहानी भी सुनाई जाती है, जिसमें कर्णावती द्वारा हुमायूं को राखी भेजने की बात कही जाती है. हालांकि, इस घटना की ऐतिहासिक प्रमाणिकता पर इतिहासकारों के बीच मतभेद हैं, इसलिए इसे निर्विवाद इतिहास के बजाय प्रचलित ऐतिहासिक आख्यान के रूप में प्रस्तुत करना ज्यादा सही है.

आज की राखी में छिपी है सदियों पुरानी परंपरा

राखी में आज भी जिंदा है सदियों पुराना रिश्ता

आज राखी के बाजार में धागे से लेकर चांदी और सोने तक की राखियां दिखाई देती हैं, लेकिन इसके मूल में वही पुराना भाव है. किसी अपने की सुरक्षा और उसके प्रति जिम्मेदारी का संकल्प. यही वजह है कि हजारों वर्षों में इस परंपरा का स्वरूप बदलने के बावजूद इसका मूल भाव कायम रहा. आज बहन भाई की कलाई पर राखी बांधती है और भाई उसकी रक्षा का वचन देता है, लेकिन इस रिश्ते की असली ताकत केवल रक्षा नहीं, बल्कि एक-दूसरे के सुख-दुख में साथ खड़े रहने का भरोसा है.

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By खुशबू कुमारी

खुशबू कुमारी पिछले तीन वर्षों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं और वर्तमान में प्रभात खबर में डिजिटल कंटेंट राइटर के रूप में कार्यरत हैं. उन्होंने पटना विमेंस कॉलेज, से मास कम्युनिकेशन में स्नातक किया है तथा वर्तमान में इग्नू से मास्टर ऑफ आर्ट्स (मास कम्युनिकेशन एंड डिजिटल मीडिया) की पढ़ाई कर रही हैं. उन्हें जनहित से जुड़ी खबरों, डिजिटल पत्रकारिता, समाचार लेखन, फोटोग्राफी, वीडियो एडिटिंग और ग्राफिक डिजाइन में विशेष रुचि है. वे राजनीति, शिक्षा, प्रशासन, सामाजिक मुद्दों, अपराध और जनसरोकार से जुड़े विषयों पर शोधपरक, तथ्यपरक और पाठकों के लिए उपयोगी डिजिटल कंटेंट तैयार करती हैं. उनका उद्देश्य पाठकों तक विश्वसनीय, स्पष्ट और प्रभावी जानकारी पहुंचाना है, ताकि समाचार केवल सूचना का माध्यम न होकर समाज के लिए उपयोगी साबित हों.

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