यूपी के 226 शहरों में मुस्लिम आबादी 50% पार, इन इलाकों में बदल सकता है चुनावी समीकरण

UP News: उत्तर प्रदेश के 857 शहरों और कस्बों के आंकड़ों के अनुसार, लगभग 38.5% शहरी आबादी मुस्लिम है, जिसमें 226 शहर ऐसे हैं जहाँ यह आबादी 50% से अधिक है. ये आंकड़े 2027 के विधानसभा चुनावों के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं, लेकिन सिर्फ संख्याएँ ही परिणाम तय नहीं करेंगी.

UP News: उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातीय समीकरणों के साथ मुस्लिम वोट भी हमेशा चर्चा के केंद्र में रहा है. लेकिन 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले अगर शहरों और कस्बों की आबादी के आंकड़ों को देखें, तो एक अलग तस्वीर सामने आती है. यूपी के 857 शहरों और कस्बों के उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, करीब 38.5 फीसदी शहरी आबादी मुस्लिम है. इनमें 226 शहर-कस्बे ऐसे हैं, जहां मुस्लिम आबादी 50 फीसदी से ज्यादा है. यही वजह है कि चुनावी नजरिए से इन इलाकों के सामाजिक समीकरण खासे अहम माने जा सकते हैं.

आंकड़ों को समझना क्यों जरूरी है?

हालांकि, इन आंकड़ों को समझते समय एक जरूरी बात ध्यान में रखनी होगी. ये आंकड़े विधानसभा क्षेत्रों के नहीं, बल्कि शहरी इलाकों और कस्बों के हैं. इसलिए किसी शहर में मुस्लिम आबादी का प्रतिशत अधिक होने का मतलब यह नहीं है कि संबंधित विधानसभा सीट पर भी मुस्लिम मतदाताओं का अनुपात उतना ही होगा.

857 शहर-कस्बों में क्या तस्वीर सामने आती है?

आंकड़ों के मुताबिक यूपी के 857 शहरी इलाकों में करीब 1 करोड़ 75 लाख लोग रहते हैं. इनमें लगभग 67 लाख मुस्लिम आबादी है. यानी इन शहरी क्षेत्रों में मुस्लिम आबादी की हिस्सेदारी करीब 38.5 फीसदी बैठती है. अगर आबादी के अनुपात के हिसाब से देखें तो तस्वीर और दिलचस्प हो जाती है. करीब 226 शहर-कस्बों में मुस्लिम आबादी 50 फीसदी से अधिक है. वहीं 148 जगहों पर यह आंकड़ा 60 फीसदी से ऊपर पहुंच जाता है. करीब 96 कस्बों में मुस्लिम आबादी 70 फीसदी से ज्यादा है, जबकि 52 इलाके ऐसे हैं जहां मुस्लिम आबादी 80 फीसदी से भी अधिक है.

पश्चिमी यूपी और रूहेलखंड में सबसे ज्यादा असर

इन आंकड़ों में पश्चिमी उत्तर प्रदेश और रूहेलखंड के कई शहर-कस्बे खास तौर पर सामने आते हैं. यहां कुछ इलाकों में मुस्लिम आबादी का अनुपात काफी ज्यादा है.

कैराना: करीब 81 फीसदी , किरातपुर: करीब 76 फीसदी , ठाकुरद्वारा: करीब 76 फीसदी , चांदपुर: करीब 72 फीसदी, देवबंद और नजीबाबाद: 71 फीसदी से अधिक, नगीना: 70 फीसदी से अधिक, सरधना और बुढ़ाना: 64 फीसदी से अधिक

इसके अलावा अवध के लहरपुर और पूर्वांचल के मुबारकपुर, घोसी और भदोही जैसे इलाकों में भी मुस्लिम आबादी का खासा संकेंद्रण देखने को मिलता है.

सिर्फ संख्या नहीं, वोट का गठजोड़ तय करेगा खेल

2027 के चुनाव में इन आंकड़ों को सीधे सीटों के नतीजों से जोड़ना सही नहीं होगा. किसी शहर या कस्बे की आबादी और पूरी विधानसभा सीट की सामाजिक संरचना अलग हो सकती है. इसके अलावा चुनाव में मतदान प्रतिशत, उम्मीदवार, स्थानीय मुद्दे और दूसरे सामाजिक समूहों का रुख भी अहम भूमिका निभाता है. यही वजह है कि मुस्लिम आबादी की संख्या अपने आप में चुनाव का नतीजा तय नहीं करती. असली सवाल यह होगा कि मुस्लिम वोट के साथ जाट, दलित या ओबीसी जैसे दूसरे सामाजिक समूहों का कितना समर्थन जुड़ता है.

2027 में किस समीकरण पर नजर रहेगी?

उत्तर प्रदेश में चुनावी राजनीति अक्सर किसी एक समुदाय के वोट से तय नहीं होती. किसी पार्टी के लिए बड़ा फायदा तब बनता है, जब उसे मुस्लिम मतदाताओं के साथ किसी दूसरे प्रभावशाली सामाजिक समूह का भी समर्थन मिल जाए. दूसरी तरफ विरोधी वोटों का बंटवारा भी नतीजों पर बड़ा असर डाल सकता है. इस लिहाज से 857 शहरों और कस्बों का यह डेटा एक सामाजिक और जनसांख्यिकीय तस्वीर जरूर दिखाता है, लेकिन इसे सीधे 2027 की सीटों का नतीजा मानना जल्दबाजी होगी. असली सियासी तस्वीर चुनाव के दौरान मुस्लिम वोट, जाट-दलित-ओबीसी जैसे समूहों के गठजोड़ और विपक्षी वोटों के बंटवारे से तय होगी.

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By लक्की कुमारी

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