UP Politics: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर सपा और कांग्रेस के बीच सीट शेयरिंग का पेंच अभी सुलझता नजर नहीं आ रहा है. कांग्रेस जल्द सीटों का बंटवारा चाहती है, जबकि समाजवादी पार्टी फिलहाल जमीनी समीकरण और उम्मीदवारों की जीतने की क्षमता का आकलन करने में जुटी है. दोनों दल अपने-अपने आंतरिक सर्वे के आधार पर सीटों पर दावा कर रहे हैं, जिससे गठबंधन में सीटों को लेकर खींचतान बढ़ गई है.
सपा 111 सीटों पर नहीं छोड़ेगी दावा
सूत्रों के मुताबिक, समाजवादी पार्टी अपनी जीती हुई 111 विधानसभा सीटों पर खुद ही चुनाव लड़ने की तैयारी में है. पार्टी के अधिकांश मौजूदा विधायकों को दोबारा मैदान में उतरने का संकेत भी दिया गया है. खास बात यह है कि पार्टी छोड़कर दूसरे दलों में गए पूर्व विधायकों के खिलाफ भी सपा कांग्रेस के सहयोग से मजबूत रणनीति बनाने की तैयारी में है.
कांग्रेस की नजर 100 से ज्यादा सीटों पर
कांग्रेस यूपी में अब पहले की तुलना में ज्यादा सीटों की मांग कर रही है. पार्टी 2024 लोकसभा चुनाव में अपने प्रदर्शन को आधार बनाकर सीटों पर दावा कर रही है. इसके अलावा कांग्रेस की कोशिश है कि राज्य के लगभग हर जिले में उसे कम से कम एक सीट मिले, ताकि संगठन की मौजूदगी मजबूत हो. पार्टी अब गठबंधन में केवल छोटे भाई की भूमिका तक सीमित नहीं रहना चाहती.
75 से 80 सीटों तक पहुंच सकता है फॉर्मूला
सपा पहले कांग्रेस को करीब 60 से कम सीटें देने के फार्मूले पर विचार कर रही थी, लेकिन बदले राजनीतिक हालात में यह संख्या बढ़कर 75 से 80 सीटों तक पहुंच सकती है. हालांकि अंतिम फैसला जातीय समीकरण, संभावित उम्मीदवार और संबंधित सीट पर जीत की संभावना को ध्यान में रखकर होने की बात कही जा रही है. यहीं पर दोनों दलों की रणनीति एक-दूसरे से टकरा रही है.
2024 का PDA फॉर्मूला अब कितनी दूर तक चलेगा
सपा-कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती 2024 लोकसभा चुनाव में मिली सफलता को विधानसभा चुनाव में दोहराने की है. उस समय PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण ने गठबंधन को फायदा पहुंचाया था, लेकिन अब राजनीतिक मुद्दे और मतदाताओं का मूड बदल चुका है. गठबंधन को Gen Z और महिला वोटरों को भी साधना होगा.
राहुल-अखिलेश की अलग-अलग तैयारियां
कांग्रेस की ओर से राहुल गांधी युवाओं, खासकर Gen Z के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं. वहीं अखिलेश यादव भी युवाओं और महिलाओं को जोड़ने के लिए अलग रणनीति पर काम कर रहे हैं. ऐसे में 2027 से पहले सीट बंटवारा केवल संख्या का खेल नहीं रहेगा, बल्कि यह तय करेगा कि सपा-कांग्रेस गठबंधन में किस दल की राजनीतिक पकड़ कितनी मजबूत है.
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