UP News: उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपनी सादगी, संघर्ष और जनसेवा के दम पर अलग पहचान बनाने वाले रसड़ा से तीन बार विधायक रहे उमाशंकर सिंह अब इस दुनिया में नहीं हैं. उनके निधन के साथ एक ऐसे जननेता का राजनीतिक सफर थम गया, जिसने छात्र राजनीति से शुरुआत कर बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के सबसे मजबूत चेहरों में अपनी जगह बनाई. 2022 के विधानसभा चुनाव में जब बसपा पूरे प्रदेश में सिर्फ एक सीट जीत सकी, तब उमाशंकर सिंह ही पार्टी के इकलौते विधायक बनकर विधानसभा पहुंचे और विपक्ष की मुखर आवाज बने.
छात्र राजनीति से मिली सियासत की पहली पहचान
बलिया जिले के खनवर गांव में जन्मे उमाशंकर सिंह ने राजनीति की पहली सीढ़ी छात्र जीवन में चढ़ी. सतीश चंद्र कॉलेज के छात्रसंघ चुनाव में जीत ने उन्हें क्षेत्र की राजनीति में पहचान दिलाई. इसके बाद उन्होंने सामाजिक सरोकारों को अपनी ताकत बनाया और धीरे-धीरे क्षेत्र के प्रभावशाली जननेता के रूप में उभरते गए.
तीन बार लगातार जीता जनता का भरोसा
वर्ष 2012 में उन्होंने पहली बार रसड़ा विधानसभा सीट से जीत दर्ज कर विधानसभा का सफर शुरू किया. इसके बाद 2017 और 2022 में भी लगातार जीत हासिल कर हैट्रिक बनाई. तीन चुनावों में लगातार मिली जीत ने साबित किया कि रसड़ा की जनता का भरोसा उनके साथ मजबूती से जुड़ा रहा.
2022 में बसपा की अकेली उम्मीद बने
2022 के विधानसभा चुनाव में बसपा का प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा और पार्टी पूरे प्रदेश में सिर्फ एक सीट जीत सकी. ऐसे समय में उमाशंकर सिंह ही बसपा के इकलौते विधायक बनकर विधानसभा पहुंचे. उन्होंने सदन में क्षेत्रीय समस्याओं, किसानों, युवाओं और आम जनता से जुड़े मुद्दों को लगातार उठाया और पार्टी की आवाज बने रहे.
गरीबों के मसीहा के रूप में बनाई अलग पहचान
उमाशंकर सिंह को उनके समर्थक सिर्फ विधायक नहीं, बल्कि गरीबों का मसीहा मानते थे. जरूरतमंदों की मदद, सामूहिक विवाह, शिक्षा और सामाजिक कार्यों में उनकी सक्रिय भागीदारी ने उन्हें जनता के बीच खास पहचान दिलाई. उनके दरवाजे पर पहुंचने वाला कोई भी व्यक्ति खाली हाथ नहीं लौटता था, यही वजह थी कि वे राजनीतिक सीमाओं से ऊपर उठकर भी सम्मान पाते रहे.
बीमारी से लड़ते रहे, जनसेवा नहीं छोड़ी
कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझने के बावजूद उन्होंने जनप्रतिनिधि की जिम्मेदारियों से दूरी नहीं बनाई. स्वास्थ्य लगातार बिगड़ने के बाद भी क्षेत्र के लोगों से उनका संपर्क बना रहा. यही समर्पण उन्हें आम नेताओं से अलग पहचान दिलाता है.
एक ऐसा जननेता, जिसकी कमी लंबे समय तक महसूस होगी
उमाशंकर सिंह का राजनीतिक जीवन इस बात का उदाहरण है कि जनता का भरोसा केवल चुनावी वादों से नहीं, बल्कि लगातार जनसेवा और जमीनी जुड़ाव से जीता जाता है. छात्र राजनीति से शुरू हुआ उनका सफर तीन बार विधायक बनने तक पहुंचा और उन्हें पूर्वांचल की राजनीति का एक मजबूत चेहरा बना गया. उनके निधन के बाद भले ही एक जननेता का सफर थम गया हो, लेकिन जनसेवा और संघर्ष की उनकी विरासत लंबे समय तक लोगों के बीच याद की जाती रहेगी.
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